नीरज सिसौदिया, बरेली
फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट को लेकर दावेदारी के बीच एक ऐसा पारिवारिक समीकरण चर्चा में है, जिसकी जड़ें केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं हैं। सगी ननद शालिनी सिंह और भाभी पूनम सेन के बीच वर्षों पुरानी नाराजगी अब सियासी मैदान में भी दिखाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से टिकट की दावेदारी कर रही हैं। ऐसे में फरीदपुर की राजनीति में सवाल केवल टिकट मिलने या न मिलने का नहीं, बल्कि यह भी है कि पारिवारिक टकराव के बीच दोनों अपनी अलग-अलग राजनीतिक जमीन किस तरह तैयार करेंगी।
सूत्रों के मुताबिक, दोनों परिवारों के बीच विवाद आज का नहीं, बल्कि वर्षों पुराना है। इस नाराजगी की वजह परिवार की संपत्ति को लेकर बताई जाती है। पूनम सेन के ससुर बाबू राम भुता थाना क्षेत्र के नवादा ब्रह्ममान गांव के निवासी थे। उनके पुत्र भीमसेन वर्ष 1996 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं। शालिनी सिंह उनकी बहन हैं और इस लिहाज से पूनम सेन की सगी ननद हैं। शालिनी के पति केपी सिंह हरदोई में जिला आबकारी अधिकारी हैं।
बताया जाता है कि बाबू राम के नाम पर खरीदी गई संपत्ति को लेकर परिवार में विवाद पैदा हुआ। सूत्रों का कहना है कि भीमसेन ने अपनी कमाई से पिता के नाम पर संपत्ति खरीदी थी, जिसकी कीमत बढ़कर करोड़ों रुपये हो गई। परिवार के अन्य पुत्र-पुत्रियों को इस संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलने की बात भी सामने आती रही है। हालांकि, संपत्ति के स्वामित्व, खरीद में इस्तेमाल किए गए धन और परिवार के सदस्यों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे विवाद का एक पक्ष ही माना जाना चाहिए। इतना जरूर है कि दोनों परिवारों के बीच लंबे समय से चली आ रही तल्खी अब राजनीतिक दावेदारी के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बन गई है।
इस पारिवारिक विवाद का राजनीतिक पहलू वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सामने आया था, जब पूनम सेन और शालिनी सिंह दोनों फरीदपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरी थीं। उस समय पूनम सेन ने राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था, जबकि शालिनी सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में थीं। दोनों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पूनम सेन को महज 3,075 वोट मिले, जबकि शालिनी सिंह 1,927 वोटों तक सिमट गईं।
इन नतीजों से यह स्पष्ट हुआ कि उस चुनाव में दोनों अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उन्हें सीमित समर्थन मिला। हालांकि, दोनों के बीच पारिवारिक रिश्तों में खटास का चुनावी प्रदर्शन पर कितना असर पड़ा, इसका कोई प्रत्यक्ष आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए दोनों के कम मतों को केवल आपसी विवाद का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। फिर भी, एक ही विधानसभा सीट पर ननद और भाभी का अलग-अलग प्रत्याशी बनना इस परिवार की राजनीतिक कहानी को सामान्य टिकट दावेदारी से अलग बनाता है।
2017 के बाद पूनम सेन कुछ समय तक सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर रहीं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा, जबकि शालिनी सिंह ने टिकट न मिलने के बाद बहुजन समाज पार्टी का रुख किया और उसके टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं। इस चुनाव में उन्हें 14 हजार से अधिक वोट मिले। वर्ष 2017 के मुकाबले उनका मत प्रतिशत और समर्थन बढ़ा, जिससे उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक अलग अध्याय सामने आया। यह प्रदर्शन अपने आप में उनकी राजनीतिक यात्रा का संकेत है, हालांकि इससे आगामी चुनाव में उनकी संभावनाओं का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अब परिस्थितियां फिर बदल रही हैं। शालिनी सिंह समाजवादी पार्टी में लौट आई हैं और फरीदपुर सीट से टिकट की दावेदारी कर रही हैं। दूसरी ओर, पूनम सेन भी इसी पार्टी से चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं। इस तरह दोनों के बीच मुकाबला केवल परिवार के भीतर की पुरानी नाराजगी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी के टिकट चयन की प्रक्रिया से भी जुड़ गया है। सपा नेतृत्व के सामने ऐसी स्थिति में उम्मीदवारों के संगठनात्मक काम, क्षेत्र में सक्रियता, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ संबंध और जनाधार जैसे पहलुओं को परखने की चुनौती होगी।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दोनों की दावेदारी के बीच समाजवादी पार्टी किस आधार पर फैसला करेगी। टिकट के लिए केवल पुराना राजनीतिक परिचय या परिवार की पृष्ठभूमि पर्याप्त नहीं होती। चुनाव क्षेत्र में लगातार मौजूदगी, बूथ स्तर पर संगठन की मजबूती, मतदाताओं से संपर्क और पार्टी के कार्यक्रमों में भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में दोनों दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता और स्थानीय स्तर पर उनके समर्थन का आकलन टिकट चयन में अहम हो सकता है।
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पूनम सेन का नाम जिले से लखनऊ भेजा गया है। यदि यह जानकारी सही है, तो उनकी दावेदारी को पार्टी स्तर पर आगे बढ़ने का संकेत माना जा सकता है। हालांकि, नाम भेजे जाने और अंतिम टिकट घोषित होने के बीच अंतर है। समाजवादी पार्टी की ओर से आधिकारिक घोषणा होने तक किसी एक दावेदार का टिकट तय मानना जल्दबाजी होगी।
पूनम सेन की दावेदारी के संदर्भ में उनकी हालिया राजनीतिक सक्रियता भी चर्चा में है। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि चुनाव से कुछ समय पहले सक्रिय होने के बजाय उन्होंने पिछले वर्षों में क्षेत्र में अपनी मौजूदगी कितनी बनाए रखी। विशेष रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल किए जा रहे हैं। यदि वह इस प्रक्रिया के दौरान सक्रिय नहीं थीं, तो उन्हें क्षेत्र में मतदाताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, शालिनी सिंह की वर्ष 2022 की चुनावी सक्रियता और 14 हजार से अधिक मत हासिल करने का रिकॉर्ड उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, पांच वर्ष पुराने चुनावी प्रदर्शन को वर्तमान जनसमर्थन का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फरीदपुर सीट पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच संभावित मुकाबले के लिहाज से भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। यदि सपा टिकट की दावेदारी पारिवारिक खींचतान और आपसी प्रतिस्पर्धा में उलझती है, तो पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती होगी। टिकट मिलने के बाद दूसरे दावेदार और उनके समर्थक किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, यह भी चुनावी तैयारी को प्रभावित कर सकता है। लेकिन यह मान लेना कि ननद-भाभी के विवाद के कारण भाजपा को सीधे तौर पर वॉकओवर मिल जाएगा, अभी एक अनुमान ही होगा। चुनावी नतीजे अनेक कारकों पर निर्भर करते हैं।
इस पूरे मामले का राजनीतिक संदेश साफ है। पारिवारिक विवाद जब चुनावी महत्वाकांक्षा से जुड़ता है, तो वह निजी रिश्तों की सीमा पार करके संगठन और टिकट की राजनीति तक पहुंच सकता है। पूनम सेन और शालिनी सिंह के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। दोनों का लक्ष्य एक ही पार्टी से एक ही विधानसभा सीट का टिकट हासिल करना है, जबकि उनके पारिवारिक रिश्तों में पहले से तल्खी बताई जाती है। ऐसे में टिकट की लड़ाई में व्यक्तिगत नाराजगी और राजनीतिक रणनीति के बीच अंतर बनाए रखना दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि फरीदपुर में सपा टिकट की चर्चा केवल उम्मीदवारों की सूची तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में एक ऐसा पारिवारिक टकराव भी है, जिसकी पुरानी परतें अब चुनावी राजनीति के साथ जुड़ गई हैं।




