नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी ने बरेली जिले में अपनी सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। रविवार को पार्टी ने बिथरी चैनपुर और आंवला विधानसभा सीटों पर प्रभारी घोषित कर दिए। बिथरी चैनपुर की जिम्मेदारी पूर्व भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप को सौंपी गई है, जबकि आंवला विधानसभा सीट का प्रभारी पूर्व राज्यसभा सांसद और सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव को बनाया गया है। इन दोनों घोषणाओं को आगामी विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बिथरी चैनपुर से कीर्ति कश्यप और आंवला से वीरपाल सिंह यादव के पुत्र डॉ. देवेंद्र यादव की उम्मीदवारी की राह काफी हद तक साफ हो गई है। हालांकि, पार्टी की ओर से अभी दोनों सीटों पर उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
देखने में ये सिर्फ दो नियुक्तियां हैं, लेकिन इसके पीछे की कहानी 7 महीने पुरानी है। कहानी 10 मार्च की है, कहानी इफको गेस्ट हाउस की है और कहानी वीरपाल सिंह यादव के परिवार की है।
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरी पटकथा के सूत्रधार बने बरेली के एक प्रमुख दलित नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख, जिन्होंने 10 मार्च को शिवपाल सिंह यादव को वो फॉर्मूला दिया था, जिसे रविवार को अखिलेश यादव ने हरी झंडी दे दी है।
दरअसल, 10 मार्च को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव आंवला के रामनगर इलाके में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए थे। कार्यक्रम से पहले वे आंवला स्थित इफको के गेस्ट हाउस में ठहरे थे।
उसी दौरान बरेली के एक प्रभावशाली दलित नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख, जो शिवपाल यादव के सबसे करीबी लोगों में से एक हैं और उनकी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में भी उनके साथ थे, सुबह 7 से 8 बजे के बीच गेस्ट हाउस में उनसे मिलने पहुंचे।
बंद कमरे में हुई इस मुलाकात में शिवपाल यादव ने सीधा और सटीक सवाल पूछा – “आंवला विधानसभा सीट कैसे जीती जा सकती है? बरेली की 9 में से 9 सीटें कैसे जिताएंगे?”
इस सवाल पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख ने जो जवाब दिया, उसने पूरे जिले के सियासी समीकरण को बदलकर रख दिया।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख ने शिवपाल को बताया कि आंवला और बिथरी चैनपुर दोनों सीटों की चाबी दो लोगों के पास है – पूर्व जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव और उनके समधी पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव।
उन्होंने कहा, “इन दोनों सीटों पर किसी भी दल के उम्मीदवार की हार-जीत में वीरपाल और महिपाल के समर्थकों की सबसे अहम भूमिका होती है। इनके बिना कोई नहीं जीत सकता।”
इसके पीछे उन्होंने रिश्तेदारी और स्थानीय राजनीतिक संबंधों का हवाला दिया था।
इसके बाद जो प्रस्ताव रखा, वह एक तीर से चार निशाने साधने वाला था।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख और दलित नेता ने प्रस्ताव रखा कि– वीरपाल सिंह यादव के पुत्र डॉ. देवेंद्र यादव को आंवला सीट से उम्मीदवार बना दिया जाए।
इसके पीछे के तर्क भी उन्होंने गिनाए। कहा कि
देवेंद्र यादव पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव के दामाद हैं, इसलिए महिपाल गुट उनका कभी विरोध नहीं करेगा।
इसके अलावा पिछली बार सपा से बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले एक बड़े नेता डॉ. देवेंद्र के बहनोई हैं। उनके उम्मीदवार बनने से उस परिवार की बगावत और नाराजगी दोनों खत्म हो जाएगी।
वहीं, वीरपाल सिंह के समर्थक बिथरी में नाराज चल रहे थे। पिछले चुनावों में उनमें अगम मौर्य को सपा उम्मीदवार बनाने पर नाराजगी थी। अब अगर वीरपाल सिंह यादव बेटे को आंवला से टिकट मिलता है तो वे बिथरी में भी पार्टी उम्मीदवार के लिए जी-जान लगा देंगे।
इस तरह आंवला तो जीती ही जाएगी, साथ में बिथरी भी जीतने की स्थिति में आ जाएगी।
शिवपाल से अखिलेश तक पहुंची बात, फिर कश्यप फैक्टर
बताया जाता है कि पूर्व ब्लॉक प्रमुख का यह ‘वीरपाल फॉर्मूला’ शिवपाल सिंह यादव को बेहद पसंद आया। शिवपाल ने तुरंत इस फीडबैक को लखनऊ में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंचाया।
इसी बीच दूसरा समीकरण भी चल रहा था। पूर्व भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप अपनी बेटी कीर्ति कश्यप के लिए बिथरी चैनपुर सीट चाहते थे। कश्यप समाज का बड़ा वोट बैंक आंवला और बिथरी दोनों जगह है।
अखिलेश यादव ने दोनों समीकरणों को एक साथ साधने का फैसला किया। उन्होंने वीरपाल सिंह यादव को आंवला का प्रभारी बनाकर यह साफ कर दिया कि आंवला से उम्मीदवार उनके पुत्र डॉ. देवेंद्र यादव ही होंगे। और बिथरी की कमान धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप को सौंपकर कश्यप वोट बैंक को भी साध लिया।
इस तरह 10 मार्च को गेस्ट हाउस में शुरू हुई बात 12 अक्टूबर को प्रभारी की घोषणा में बदल गई।
अब आंवला में सपा की दोहरी ताकत
इस घोषणा के बाद आंवला में समाजवादी पार्टी की स्थिति बेहद मजबूत हो गई है।
पहली ताकत है वीरपाल सिंह यादव का कुनबा। वीरपाल, उनके समधी महिपाल और उनके बहनोई – तीनों का एक साथ आना मतलब हजारों यादव और लोधी वोटों का एकजुट होना। पिछले चुनाव में बिखरा हुआ परिवार ही हार का कारण बना था, अब वही परिवार जीत का कारण बनेगा।
दूसरी ताकत है धर्मेंद्र कश्यप के रूप में कश्यप वोट बैंक। आंवला और बिथरी में कश्यप मतदाता निर्णायक हैं। कीर्ति कश्यप के बिथरी प्रभारी बनने से यह संदेश गया है कि कश्यप समाज का सम्मान सपा में है। इसका सीधा फायदा आंवला में डॉ. देवेंद्र को भी मिलेगा।
यानी यादव वोट बैंक + कश्यप वोट बैंक + बागी परिवार की एकजुटता = आंवला में सपा की निश्चित जीत।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 10 मार्च को इफको गेस्ट हाउस में जो लकीर खींची गई थी, वह अब नक्शे पर साफ दिख रही है। यह सिर्फ एक टिकट का फैसला नहीं, बल्कि बरेली की दो सीटों को एक परिवार से जोड़ने का मास्टरस्ट्रोक है, जिसकी नींव वीरपाल सिंह यादव के नाम पर रखी गई है।




