नीरज सिसौदिया, बरेली
यूपी के चाचा-भतीजे की जोड़ी अंदरखाने एक हो चुकी है लेकिन फिलहाल एक सुनियोजित एजेंडे के तहत इसका खुलासा नहीं किया जा रहा है. पार्टी से जुड़े सूत्र इसकी पुष्टि करते हैं. बताया यह भी जाता है कि दोनों नेता जल्द ही एक मंच पर आकर विशाल सभा करने की तैयारी कर रहे हैं. इस पर उनकी बात भी आगे बढ़ चुकी है. जल्द ही यह सभा कानपुर या बुंदेलखंड के किसी शहर में की जा सकती है. बताया जाता है कि अखिलेश यादव फिलहाल विभिन्न दलों के नेताओं को अपने पाले में लाना चाहते हैं. इनमें कुछ ऐसे नेता भी हैं जो शिवपाल यादव या उनकी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की वजह से सपा से दूरी बनाए हुए हैं. उन्हें यह डर है कि अगर शिवपाल यादव से सपा का गठबंधन होता है तो उनका टिकट कटना सौ फीसदी तय है. यही वजह है कि वे चाचा की वापसी का इंतजार कर रहे थे. ऐसे में अखिलेश ने बीच का रास्ता निकाला और चाचा को न तो सार्वजनिक मंच पर पूरी तरह नकारा और न ही उनको पूरी तरह अपनाया. अपने हर साक्षात्कार में अखिलेश अब तक यही कहते नजर आए हैं कि चाचा को भी साथ लेकर चलेंगे और हमने चाचा के लिए जसवंत नगर की सीट छोड़ दी है. सियासी जानकारों का कहना है कि अखिलेश अपने इस बयान के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि चाचा हमारे साथ हैं लेकिन उनकी पार्टी को हम सिर्फ एक सीट ही दे रहे हैं. ऐसे में बसपा और कांग्रेस जैसे दलों को छोड़कर आने वाले नेता आश्वस्त हैं कि अगर वे अपना दल छोड़कर सपा में शामिल होते हैं तो उनके टिकट पर कोई संकट नहीं आने वाला. लेकिन राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि बुंदेलखंड और कानपुर का किला भेदने के लिए अखिलेश को चाचा की जरूरत है. इसीलिए उन्होंने चाचा से उनकी पार्टी के उन नेताओं की लिस्ट भी ले ली है जिनका अपने विधानसभा क्षेत्र में काफी दबदबा है लेकिन सपा वहां मजबूत स्थिति में नहीं है. बताया जाता है कि दोनों के बीच मुलाकातों का सिलसिला शुरू नहीं हुआ है लेकिन फोन पर बातचीत का सिलसिला काफी आगे तक बढ़ चुका है. सूत्र यह भी बताते हैं कि चाचा की पार्टी के साथ गठबंधन के मुद्दे पर अखिलेश यादव नवंबर तक सार्वजनिक रूप से सामने आएंगे..तब तक वह बसपा और कांग्रेस नेताओं को पार्टी में शामिल करवाने का अभियान चलाएंगे. चूंकि नवंबर तक तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी और बसपा एवं कांग्रेस छोड़कर सपा में आने वाले नेताओं के पास वापसी का विकल्प भी नहीं रहेगा इसलिए अखिलेश को उस वक्त अपनी नीतियों का खुलासा करने में कोई नुकसान भी नहीं होगा. बहरहाल, चाचा और भतीजे की बढ़ती नजदीकियां भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं. चाचा की वापसी से समाजवादी पार्टी को मजबूती मिलेगी. अखिलेश के युवा जोश और शिवपाल के अनुभव के बूते भाजपा को मात देकर सत्ता हासिल करना उतना मुश्किल नहीं होगा जितना कि वर्तमान में नजर आ रहा है. बहरहाल, दोनों दलों के नेताओं को अखिलेश यादव के फैसले का बेसब्री से इंतजार है. फिलहाल उन्हें दो महीने और इंतजार करना होगा. अगर दोनों दलों का गठबंधन हो जाता है तो बरेली की दो विधानसभा सीटों पर इसका असर जरूर पड़ेगा. पहली बिथरी विधानसभा सीट और दूसरी कैंट विधानसभा सीट. एक सीट पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुख्य महासचिव वीरपाल सिंह यादव तो कैंट सीट पर प्रसपा के महानगर अध्यक्ष डा. मो. खालिद का आना तय माना जा रहा है क्योंकि दोनों ही नेता शिवपाल के बेहद करीबी हैं और बुरे वक्त में भी उन्होंने शिवपाल के प्रति पूरी ईमानदारी से वफादारी निभाई है. ऐसे में वफादारी के ईनाम के भी हकदार ये दोनों नेता बन चुके हैं.

चाचा-भतीजे की बन चुकी है बात, भतीजे ने मांगी है चाचा के दावेदारों की सूची, जल्द एक मंच पर आएंगे दोनों, होगी विशाल जनसभा




