नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं, जो वक्त के साथ और मजबूत होते चले जाते हैं। जिनका असर केवल चुनावी नतीजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी सियासी दिशा तय करता है। ऐसे ही नेताओं में एक नाम है समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल सिंह यादव। बरेली की सियासत में सिर्फ दो ही नेताओं को ‘पितामह’ का दर्जा दिया गया है। इनमें वीरपाल सिंह के अलावा हैं भाजपा नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार।
वीरपाल सिंह यादव को यूं ही ‘पितामह’ नहीं कहा जाता। अनुभव, संगठन की समझ और जमीनी पकड़, तीनों का ऐसा मेल बहुत कम नेताओं में देखने को मिलता है।
इन दिनों वीरपाल सिंह यादव एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वजह है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)। लगभग एक माह पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें बरेली और पीलीभीत जिले का एसआईआर प्रभारी बनाया। यह जिम्मेदारी मिलते ही वीरपाल सिंह यादव ने किसी औपचारिकता में समय नहीं गंवाया, बल्कि पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर गए।

जिम्मेदारी मिलने के अगले ही दिन उन्होंने बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) की समीक्षा बैठक बुलाई और साफ निर्देश दिए कि हर बूथ पर सक्रिय बीएलए नियुक्त किए जाएं। संदेश स्पष्ट था- मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी काम ढिलाई से नहीं होगा। यही वजह रही कि महज एक महीने के भीतर बरेली जिले में बीएलए की टीम खड़ी हो गई।

बीएलए तैयार होते ही वीरपाल सिंह यादव ने अगला कदम उठाया- सम्मेलनों सह प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन। जिलेभर में बीएलए सम्मेलनों की झड़ी लग गई। सोमवार को बरेली के आईएमए हॉल में बरेली कैंट विधानसभा क्षेत्र का बीएलए सम्मेलन आयोजित किया गया। इससे पहले फरीदपुर में सम्मेलन हुआ, मीरगंज में भी आयोजन किया जा चुका है। आगामी चार जनवरी को शहर विधानसभा सीट के बीएलए सम्मेलन का प्रस्ताव है। केवल बरेली ही नहीं, बल्कि पीलीभीत जिले में भी इसी तरह के सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं।
इन सम्मेलनों का असर सिर्फ संख्या तक सीमित नहीं है। इनका सबसे बड़ा प्रभाव समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा है। लंबे समय से हाशिये पर महसूस कर रहे कार्यकर्ता एक बार फिर खुद को राजनीति के केंद्र में महसूस करने लगे हैं।
कार्यकर्ताओं में लौटा आत्मविश्वास
पिछले कुछ वर्षों में बरेली में समाजवादी पार्टी नेतृत्व के अभाव से जूझती नजर आ रही थी। कार्यकर्ताओं में निराशा थी, दिशा का अभाव था और संगठन ढीला पड़ता जा रहा था। लेकिन वीरपाल सिंह यादव की सक्रियता ने इस खालीपन को काफी हद तक भर दिया है। पुराने कार्यकर्ता हों या युवा चेहरे, सबमें नया उत्साह दिखाई दे रहा है।
खास बात यह है कि वीरपाल सिंह यादव केवल बैठकों तक सीमित नहीं हैं। वे खुद हर स्तर पर संवाद कर रहे हैं, समस्याएं सुन रहे हैं और समाधान सुझा रहे हैं। यही कारण है कि बरेली में समाजवादी पार्टी एक बार फिर उसी मुकाम की ओर बढ़ती दिख रही है, जहां वह उन दिनों थी, जब वीरपाल सिंह यादव खुद पार्टी के जिला अध्यक्ष हुआ करते थे।

भाषणों में वही पुराना तेवर
बीएलए सम्मेलनों में वीरपाल सिंह यादव के भाषणों ने खासा ध्यान खींचा है। उनके शब्दों में वही गहराई, वही आक्रोश और वही बेबाकी नजर आई, जिसके लिए वे जाने जाते रहे हैं। उन्होंने भाजपा सरकार पर खुलकर हमला बोला और बिना किसी झिझक के चुनौती दी। यह निडरता और स्पष्टता लंबे समय से समाजवादी पार्टी के मंचों से गायब सी हो गई थी।
इन सम्मेलनों ने यह भी साबित कर दिया कि वीरपाल सिंह यादव का विकल्प फिलहाल कोई और नहीं है। संगठन, रणनीति और जनभावनाओं की समझ का जो संतुलन उनमें है, वह बरेली के अन्य नेताओं में फिलहाल देखने को नहीं मिलता।

यादव वोट बैंक पर मजबूत पकड़
वीरपाल सिंह यादव की सबसे बड़ी ताकत उनकी सामाजिक पकड़ है। बरेली जिले में यादव मतदाता कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बिथरी चैनपुर, फरीदपुर और आंवला जैसी यादव बहुल सीटों पर वीरपाल सिंह का प्रभाव साफ दिखता है। इसके अलावा मीरगंज, बहेड़ी और भोजीपुरा में भी यादव मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। छिटपुट यादव बरेली कैंट, नवाबगंज और शहर विधानसभा सीट पर भी हैं।
वीरपाल सिंह यादव बरेली के ऐसे इकलौते यादव नेता माने जाते हैं, जिनके नाम पर आज भी पूरे जिले का यादव समाज एकजुट नजर आता है। यही वजह है कि उनकी सक्रियता का सीधा असर सियासी समीकरणों पर पड़ता है।

भाजपा की बढ़ती चिंता
वीरपाल सिंह यादव की दमदार वापसी और समाजवादी पार्टी की सक्रियता ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। एक ओर भाजपा खुद आंतरिक खींचतान से जूझ रही है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी का संगठन अचानक मजबूत होता दिखाई दे रहा है। बीएलए सम्मेलनों की सफलता और कार्यकर्ताओं में बढ़ता उत्साह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नए साल में बरेली की राजनीति में नए समीकरण उभर सकते हैं। अगर वीरपाल सिंह यादव इसी तरह संगठन को मजबूत करते रहे, तो आने वाले चुनावों में मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।

नए साल में नई रणनीति
फिलहाल वीरपाल सिंह यादव का फोकस संगठन और मतदाता सूची पर है, लेकिन उनके कदम भविष्य की राजनीति की ओर इशारा कर रहे हैं। एसआईआर के जरिए बूथ स्तर तक पकड़ मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और सामाजिक समीकरणों को साधना, यह सब किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बरेली की राजनीति में लंबे समय से जो ठहराव था, वह टूटता दिख रहा है। वीरपाल सिंह यादव एक बार फिर साबित कर रहे हैं कि अनुभव और जमीन से जुड़ाव अगर साथ हो, तो राजनीति में वापसी मुश्किल नहीं होती।





