नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति में पिछले कई महीनों से एक चर्चा लगातार तैर रही है। चर्चा यह कि आंवला के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप जल्द ही भारतीय जनता पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। इतना ही नहीं, यह भी कहा जा रहा है कि उनकी पुत्री कीर्ति कश्यप को दातागंज या बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी उम्मीदवार बना सकती है।
लेकिन अगर मौजूदा राजनीतिक हालात, भाजपा की अंदरूनी रणनीति, जातीय समीकरण और सत्ता के तौर-तरीकों को ध्यान से देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेजी से होने लगी है कि धर्मेंद्र कश्यप के समाजवादी पार्टी में जाने की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है। हाल ही में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और धर्मेंद्र कश्यप की मुलाकात को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व ने समय रहते नाराजगी को संभाल लिया है और अब धर्मेंद्र कश्यप किसी भी कीमत पर सपा में जाने का जोखिम नहीं उठाएंगे।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत धर्मेंद्र कश्यप के एक इंटरव्यू से हुई थी। उस इंटरव्यू में उन्होंने खुलकर कहा था कि जिन लोगों ने उन्हें लोकसभा चुनाव में हराने का काम किया है, वह उन लोगों को विधानसभा तक नहीं पहुंचने देंगे।
उनके इस बयान ने भाजपा के भीतर की खींचतान को सार्वजनिक कर दिया था। जब उनसे पूछा गया कि अगर वह पार्टी में रहकर ऐसा करेंगे तो क्या भाजपा उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी, तब उन्होंने बेहद तल्ख अंदाज में जवाब दिया था कि जब उनके विरोधियों के खिलाफ पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की तो उनके खिलाफ भी क्या करेगी।
बस यहीं से सियासी अटकलों का बाजार गर्म हो गया। क्योंकि धर्मेंद्र कश्यप पहले समाजवादी पार्टी से विधायक रह चुके हैं, इसलिए सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने यह मानना शुरू कर दिया कि वह “घर वापसी” कर सकते हैं। धीरे-धीरे यह चर्चा इतनी आगे बढ़ गई कि उनकी पुत्री कीर्ति कश्यप के चुनाव लड़ने तक की बातें होने लगीं।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद धर्मेंद्र कश्यप के समर्थकों ने खुलकर आरोप लगाए थे कि भाजपा के भीतर ही कुछ नेताओं ने उन्हें हराने का काम किया।
सबसे ज्यादा चर्चा बिथरी चैनपुर, फरीदपुर और दातागंज विधानसभा क्षेत्रों को लेकर हुई। धर्मेंद्र समर्थकों का मानना था कि इन इलाकों में पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं ने पूरी ताकत नहीं लगाई।
बिथरी क्षेत्र में पूर्व विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल और पूर्व सांसद सर्वराज सिंह के समर्थकों पर अंदरखाने विरोध करने के आरोप लगाए गए। वहीं दातागंज को लेकर भी स्थानीय स्तर पर नाराजगी की बातें सामने आती रहीं।
इसी कारण राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मानना शुरू किया कि धर्मेंद्र कश्यप भाजपा पर दबाव बनाने के लिए सपा का विकल्प खुला रखना चाहते हैं। लेकिन राजनीति में दबाव बनाने और वास्तव में पार्टी छोड़ने में बहुत बड़ा फर्क होता है।
इसी बीच बरेली दौरे पर आए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का धर्मेंद्र कश्यप से मिलना अचानक राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गया।
दोनों नेताओं के बीच बंद कमरे में लंबी बातचीत हुई। आधिकारिक तौर पर भले ही किसी ने कुछ नहीं बताया, लेकिन भाजपा गलियारों में चर्चा है कि धर्मेंद्र कश्यप की नाराजगी काफी हद तक दूर कर दी गई है।
सूत्रों की मानें तो उन्हें भरोसा दिया गया है कि उनकी राजनीतिक उपेक्षा नहीं होने दी जाएगी और भविष्य में उनके परिवार को भी उचित राजनीतिक सम्मान मिलेगा। यही कारण है कि अब भाजपा खेमे में यह माना जा रहा है कि उनकी पुत्री कीर्ति कश्यप भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ सकती हैं।
राजनीति में संकेत बहुत मायने रखते हैं। अगर भाजपा नेतृत्व वास्तव में धर्मेंद्र कश्यप को किनारे करना चाहता तो डिप्टी सीएम स्तर का नेता उनसे मिलने नहीं जाता। यही मुलाकात अब उन तमाम अटकलों पर विराम मानी जा रही है जिनमें उन्हें सपा में जाते हुए दिखाया जा रहा था।
राजनीति सिर्फ भावनाओं से नहीं चलती, बल्कि ताकत, सुरक्षा, भविष्य और सत्ता के संतुलन से चलती है। यही वजह है कि धर्मेंद्र कश्यप जैसे अनुभवी नेता हर कदम बहुत सोच-समझकर उठाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वह भाजपा छोड़कर सपा में क्यों जाएंगे, जबकि ऐसा करना उनके लिए राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों स्तर पर भारी पड़ सकता है?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है। विरोधी लंबे समय से धर्मेंद्र कश्यप पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगाते रहे हैं। मरघट की जमीन पर मकान बनाने जैसी चर्चाएं भी समय-समय पर उठती रही हैं।
हालांकि इन आरोपों का कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीति में अक्सर धारणा ही सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।
ऐसे में अगर धर्मेंद्र कश्यप भाजपा छोड़कर सपा में जाते हैं तो यह माना जा रहा है कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियां सक्रिय हो सकती हैं। भाजपा विरोधी खेमे में जाने के बाद ईडी या अन्य एजेंसियों का दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कई प्रदेशों की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं जहां दल बदलते ही नेताओं की मुश्किलें बढ़ गईं। इसलिए धर्मेंद्र कश्यप जैसा नेता शायद ही ऐसा जोखिम लेना चाहेगा।
इसके अलावा अगर धर्मेंद्र कश्यप की पुत्री को बिथरी चैनपुर से सपा उम्मीदवार बनाया जाता है तो वहां का चुनावी गणित उनके पक्ष में नहीं दिखाई देता।
बिथरी सीट पर ब्राह्मण और ठाकुर वोट निर्णायक भूमिका में रहते हैं। पूर्व सांसद सर्वराज सिंह और पप्पू भरतौल का प्रभाव आज भी क्षेत्र में मजबूत माना जाता है। हो सकता है कि इस बार पप्पू भरतौल खुद बिथरी से मैदान में उतर जाएं। ऐसे में ब्राह्मण और क्षत्रिय वोटों का बड़ा हिस्सा धर्मेंद्र कश्यप के साथ जाने की संभावना बेहद कम है।
इसके अलावा धर्मेंद्र कश्यप के कुछ पुराने बयानों को लेकर ठाकुर समाज में नाराजगी की चर्चा भी लंबे समय से होती रही है। ऐसे में ठाकुर वोटों का सपा उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट होना मुश्किल माना जा रहा है जो वैसे भी बिथरी में भाजपा का कोर वोटर माना जाता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कश्यप समाज का एक बड़ा हिस्सा भाजपा का स्थायी वोट बैंक बन चुका है।
ऐसे में सिर्फ धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने से पूरा वोट बैंक शिफ्ट हो जाएगा, ऐसा मानना वास्तविकता से दूर माना जा रहा है। भाजपा संगठन भी इस वर्ग में लगातार काम कर रहा है।
वहीं समाजवादी पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप का भी कश्यप वोटों पर असर माना जाता है। वह खुद भी बिथरी विधानसभा सीट से सपा के टिकट के दावेदार हैं और दो-ढाई हजार कश्यप वोट उनके अपने परिवार और रिश्तेदारों के ही हैं जो शिवचरण को टिकट न मिलने पर सपा के विरोध में एकजुट हो सकते हैं। ऐसे में सपा के भीतर भी वोटों का पूरा ध्रुवीकरण धर्मेंद्र कश्यप के पक्ष में होना आसान नहीं होगा।
राजनीति में बाहरी विरोध से ज्यादा खतरनाक अंदरूनी विरोध होता है। यही स्थिति धर्मेंद्र कश्यप के साथ सपा में बन सकती है।
बरेली की राजनीति में समाजवादी पार्टी के कई नेता पहले से ही विधानसभा टिकट की दौड़ में लगे हुए हैं। बिथरी सीट पर कई यादव नेता लंबे समय से तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में अगर अचानक धर्मेंद्र कश्यप की पुत्री को टिकट दिया जाता है तो अंदरखाने असंतोष बढ़ना तय माना जा रहा है।
इसके अलावा सपा सांसद नीरज मौर्य भी शायद ही यह चाहेंगे कि पार्टी के भीतर धर्मेंद्र कश्यप जैसा मजबूत समानांतर शक्ति केंद्र खड़ा हो जाए। राजनीतिक तौर पर कोई भी नेता अपने ही क्षेत्र में भविष्य का प्रतिद्वंद्वी मजबूत नहीं करना चाहता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कहीं थोड़ी संभावना बन भी सकती थी तो वह दातागंज सीट हो सकती थी। वहां स्थानीय समीकरण कुछ अलग हैं। लेकिन वहां भी भाजपा की संगठनात्मक ताकत और सत्ता का प्रभाव बड़ा फैक्टर रहेगा।
इसके अलावा अगर भाजपा पूरी ताकत से चुनाव लड़ती है तो किसी नए समीकरण को स्थापित करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि सपा में जाने का फायदा जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा नुकसान का खतरा नजर आता है।
धर्मेंद्र कश्यप लंबे समय से भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं। पार्टी संगठन, सत्ता और प्रशासनिक ढांचे में उनकी पकड़ मानी जाती है।
ऐसे में भाजपा छोड़ना सिर्फ पार्टी बदलना नहीं होगा, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र से दूरी बनाने जैसा होगा। यही कारण है कि अनुभवी नेता अक्सर आखिरी समय तक सत्ता पक्ष में बने रहने की कोशिश करते हैं।
राजनीति में यह भी माना जाता है कि अगर कोई नेता अपनी राजनीतिक जमीन पूरी तरह सुरक्षित किए बिना दल बदलता है तो उसका भविष्य अनिश्चित हो जाता है। धर्मेंद्र कश्यप शायद इस खतरे को अच्छी तरह समझते हैं।
समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से यह उम्मीद दिखाई दे रही थी कि धर्मेंद्र कश्यप के आने से भाजपा को बड़ा नुकसान होगा। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए ऐसा होता नजर नहीं आ रहा।
राजनीतिक संकेत साफ बता रहे हैं कि भाजपा नेतृत्व धर्मेंद्र कश्यप को खोना नहीं चाहता और धर्मेंद्र कश्यप भी भाजपा छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहते।
ऐसे में समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अब सिर्फ अटकलों के सहारे राजनीति करने की बजाय संगठन मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। चुनावी जीत किसी एक बड़े चेहरे के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर की तैयारी और मजबूत संगठन से मिलती है।
फिलहाल बरेली की राजनीति में यही संदेश साफ दिखाई दे रहा है कि धर्मेंद्र कश्यप को लेकर जो सियासी हवा बनाई जा रही थी, वह जमीन पर उतनी मजबूत नहीं है जितनी दिखाई जा रही थी। इसलिए सपाइयों को अब “मुंगेरी लाल के हसीन सपनों” से बाहर निकलकर वास्तविक राजनीतिक लड़ाई पर ध्यान देना होगा।




