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बरेली शहर विधानसभा सीट पर बदला गणित, बढ़े मुस्लिम वोटों ने बढ़ाई सियासी हलचल, बस 8 से 10 प्रतिशत वोटों का ही रह गया खेल, सपा विधानसभा अध्यक्ष हसीव खान की संभावनाएं बढ़ीं, भाजपा से सतीश कातिब मम्मा और अतुल कपूर पर भी नजर

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली शहर विधानसभा सीट पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद सामने आए नए आंकड़ों ने यहां की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। भारतीय जनता पार्टी का मजबूत किला मानी जाने वाली इस सीट पर अब चुनावी मुकाबला पहले से कहीं अधिक दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ा बदलाव मुस्लिम मतदाताओं की संख्या में देखने को मिला है। नए आंकड़ों के अनुसार बरेली शहर विधानसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या घटकर 3 लाख 51 हजार 67 रह गई है, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से भी अधिक बताई जा रही है।
यह बदलाव आने वाले 2027 विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यही कारण है कि जहां समाजवादी पार्टी के खेमे में उत्साह का माहौल है, वहीं भाजपा के भीतर भी उम्मीदवार चयन को लेकर मंथन तेज हो गया है। अब यह सीट केवल परंपरागत वोट बैंक के भरोसे जीतने वाली नहीं रह गई है, बल्कि यहां हर वोट की अहमियत बढ़ गई है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो उस समय बरेली शहर सीट पर कुल 4 लाख 16 हजार 136 मतदाता थे। उस समय मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 35 प्रतिशत के आसपास थी। इसके बावजूद भाजपा उम्मीदवार डॉ. अरुण कुमार ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राजेश कुमार अग्रवाल को 32 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया था। उस चुनाव में अरुण कुमार को न केवल भाजपा का परंपरागत वोट मिला था, बल्कि उन्हें मुस्लिम समाज के एक हिस्से का भी समर्थन प्राप्त हुआ था। यही कारण था कि भाजपा अपेक्षाकृत आरामदायक स्थिति में रही।
लेकिन 2027 का चुनाव अलग परिस्थितियों में होने जा रहा है। भाजपा के भीतर यह चर्चा तेज है कि उम्र संबंधी कारणों के चलते इस बार डॉ. अरुण कुमार का टिकट कट सकता है। यदि ऐसा होता है तो भाजपा को ऐसा उम्मीदवार तलाशना होगा जो न केवल पार्टी के परंपरागत वोटों को संभाले, बल्कि मुस्लिम समाज और अन्य वर्गों के बीच भी अपनी स्वीकार्यता रखता हो। क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में केवल कोर वोट बैंक के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इस बदले हुए समीकरण को अपने पक्ष में मान रही है। पार्टी के नेताओं का मानना है कि यदि मुस्लिम वोटों का बिखराव रोका जा सके और परंपरागत समाजवादी वोट बैंक को एकजुट रखा जाए तो बरेली शहर सीट पर मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है। इसी वजह से पार्टी के भीतर टिकट को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इन चर्चाओं के केंद्र में सबसे अधिक नाम समाजवादी पार्टी के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान का है। पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से संगठन में सक्रिय हसीव खान लगातार बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। उनकी मेहनत का परिणाम पिछले कुछ चुनावों में देखने को मिला है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी अनिल कुमार शर्मा को यहां से सिर्फ 41 हजार 921 वोट मिले थे जबकि भाजपा के अरुण कुमार सक्सेना ने 68983 वोट हासिल कर जीत हासिल की थी। तीसरे नंबर पर रहे शेर अली जाफरी को 31113 वोट मिले थे। वहीं, 2022 के विधानसभा चुनाव में जब हसीव खान शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष थे तो उनकी मेहनत की वजह से सपा उम्मीदवार राजेश अग्रवाल को 96 हजार 694 वोट मिले थे जबकि तीसरे नंबर पर रहे ब्रह्मानंद शर्मा को महज 6982 वोट ही मिले थे। इससे पूर्व वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब हसीव खान शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष नहीं थे तब सपा-कांग्रेस गठबंधन उम्मीदवार प्रेमप्रकाश अग्रवाल 83343 वोट ही हासिल कर पाए थे और भाजपा के अरुण कुमार को एक लाख 15010 वोट मिले थे। उस वक्त हार-जीत का अंतर 30 हजार से अधिक था। यानी हसीव खान के शहर विधानसभा सीट की कमान संभालने के बाद पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शहर विधानसभा सीट से हार-जीत का अंतर महज 19 हजार ही रह गया है। यह हसीव खान की बड़ी उपलब्धि है और उनकी टिकट की दावेदारी का प्रमुख आधार भी यही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उन्होंने केवल मुस्लिम समाज के बीच ही नहीं, बल्कि विभिन्न हिंदू समुदायों के बीच भी अपनी पहचान बनाई है। सामाजिक कार्यक्रमों, जनसंपर्क अभियानों और स्थानीय मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है।
समाजवादी पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि पार्टी बरेली शहर सीट से मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो मुस्लिम वोटों के बिखराव की संभावना काफी हद तक कम हो सकती है। हसीव खान के समर्थक इसी तर्क को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय कई छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा बंट जाता है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है। लेकिन यदि समाजवादी पार्टी ऐसा चेहरा मैदान में उतारती है जिसकी स्वीकार्यता व्यापक हो, तो यह बिखराव रोका जा सकता है।
हसीव खान की दावेदारी को मजबूत बनाने वाली एक और बात उनकी साफ-सुथरी छवि मानी जा रही है। स्थानीय स्तर पर उन्हें समाजसेवी और संगठनात्मक कार्यकर्ता के रूप में देखा जाता है। पिछले कई वर्षों में उन्होंने पार्टी के बूथ नेटवर्क को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के भीतर उनका नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है।
हालांकि भाजपा भी इस बदले हुए राजनीतिक समीकरण को समझ रही है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे उम्मीदवार का चयन करना है जो अपने प्रभाव से अतिरिक्त वोट जुटा सके। भाजपा के संभावित दावेदारों में वरिष्ठ पार्षद सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। चार दशक से स्थानीय राजनीति में सक्रिय मम्मा के संबंध विभिन्न समुदायों में बताए जाते हैं। खासतौर पर मुस्लिम समाज के लोगों के बीच भी उनकी पहचान और संपर्क होने की चर्चा रहती है।
इसी तरह नगर निगम के पूर्व उपसभापति अतुल कपूर का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल है। अतुल कपूर की राजनीतिक पृष्ठभूमि और स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है। मुस्लिम बहुल इलाकों से उनका पुराना जुड़ाव भी उनकी राजनीतिक ताकत माना जाता है। यही वजह है कि भाजपा के भीतर उनका नाम भी गंभीरता से लिया जा रहा है।
पत्रकारिता से राजनीति में आए डॉ. पवन सक्सेना का नाम भी चर्चाओं में है। विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच उनकी पहुंच और लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में सक्रियता उन्हें एक अलग पहचान देती है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वह भी ऐसे नेता हैं जो अपने व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर हजारों वोटों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
फिर भी मौजूदा राजनीतिक चर्चा का केंद्र समाजवादी पार्टी और हसीव खान की संभावित दावेदारी ही बनी हुई है। इसकी वजह केवल मुस्लिम वोटों का बढ़ा हुआ प्रतिशत नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर उनकी सक्रिय भूमिका भी है। पार्टी कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि यदि समाजवादी पार्टी को बरेली शहर सीट पर गंभीर चुनौती पेश करनी है तो उसे ऐसा उम्मीदवार देना होगा जो संगठन और समाज दोनों में मजबूत पकड़ रखता हो।
कुल मिलाकर बरेली शहर विधानसभा सीट पर मतदाता सूची के नए आंकड़ों ने चुनावी गणित को पूरी तरह बदल दिया है। मुस्लिम मतदाताओं की बढ़ी हिस्सेदारी ने इस सीट को भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। भाजपा जहां ऐसा चेहरा तलाश रही है जो सभी वर्गों में स्वीकार्य हो, वहीं समाजवादी पार्टी के भीतर हसीव खान की दावेदारी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। आने वाले महीनों में टिकट को लेकर होने वाले फैसले यह तय करेंगे कि बरेली शहर की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ती है, लेकिन इतना तय है कि 2027 का मुकाबला 2022 की तुलना में कहीं अधिक रोचक और कांटे का होने वाला है।

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