नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अब अधिक समय शेष नहीं रह गया है। बरेली जिले की मीरगंज विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है। जिले की अन्य सीटों पर जहां संभावित उम्मीदवारों के नाम लगभग तय माने जा रहे हैं, वहीं मीरगंज एक ऐसी सीट बन गई है जहां पार्टी संगठन खुद असमंजस में दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि यहां मौजूदा दावेदारों की बजाय किसी “चौंकाने वाले चेहरे” की तलाश शुरू हो चुकी है।
दिलचस्प बात यह है कि यह तलाश केवल किसी नए नेता की नहीं, बल्कि ऐसे सामाजिक समीकरण की भी है जो भाजपा के मजबूत चुनावी ढांचे को चुनौती दे सके। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मीरगंज में समाजवादी पार्टी अब पारंपरिक राजनीति से हटकर नया प्रयोग करने के मूड में दिखाई दे रही है।
मीरगंज की राजनीति को सबसे बड़ा झटका उस समय लगा जब तीन बार विधायक रह चुके सुल्तान बेग ने मीरगंज की बजाय भोजीपुरा विधानसभा सीट पर अपनी दावेदारी मजबूत करनी शुरू कर दी। सुल्तान बेग का यह फैसला कोई सामान्य राजनीतिक कदम नहीं माना जा रहा।
दरअसल, पिछले कई चुनावों में लगातार हार का सामना करने के बाद सुल्तान बेग सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में मीरगंज से कोई मुस्लिम उम्मीदवार समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव नहीं जीत सकता, इसलिए वह भोजीपुरा सीट से दावेदारी जता रहे हैं। उनके इस बयान को केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि क्षेत्र की राजनीतिक हकीकत के रूप में देखा गया।
सुल्तान बेग की यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह खुद इस सीट पर तीन बार विधायक रह चुके हैं और क्षेत्र की सामाजिक संरचना को अच्छी तरह समझते हैं। जब इतना बड़ा नेता यह मान ले कि उसके लिए चुनाव जीतना मुश्किल है, तो इसका सीधा असर अन्य मुस्लिम दावेदारों की दावेदारी पर भी पड़ना स्वाभाविक है।
समाजवादी पार्टी को पारंपरिक रूप से मुस्लिम वोटों का बड़ा आधार माना जाता है। लेकिन मीरगंज में हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि पार्टी संगठन भी अब इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि यदि चुनाव का माहौल इसी तरह हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के आधार पर आगे बढ़ता है तो मुस्लिम चेहरे को टिकट देना राजनीतिक जोखिम साबित हो सकता है।
यही वजह है कि पूर्व विधायक शराफतयार खां जैसे बड़े नाम होने के बावजूद उनकी दावेदारी को लेकर संगठन के भीतर उत्साह दिखाई नहीं दे रहा। शराफतयार खां की राजनीतिक पहचान मजबूत है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती उनका धर्म माना जा रहा है।
समाजवादी पार्टी इस समय जीतने योग्य उम्मीदवार की तलाश में है, न कि केवल परंपरागत वोट बैंक को खुश करने की रणनीति पर चल रही है। यही कारण है कि मुस्लिम दावेदारों की सक्रियता के बावजूद पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें लेकर आश्वस्त दिखाई नहीं देता।
मीरगंज सीट पर साधना सिंह लोधी और मनोहर पटेल जैसे नाम भी चर्चा में हैं। लेकिन पार्टी के भीतर इन नेताओं को लेकर वैसा उत्साह नहीं दिख रहा जैसा किसी संभावित उम्मीदवार को लेकर होना चाहिए।
संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि इन नेताओं की अपनी अलग राजनीतिक पहचान अभी इतनी मजबूत नहीं है कि वे भाजपा के मजबूत चुनावी ढांचे का मुकाबला कर सकें। यही वजह है कि इनकी सक्रियता के बावजूद टिकट को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो रही।
असल में समाजवादी पार्टी को डर है कि यदि कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारा गया तो चुनाव शुरू होने से पहले ही मुकाबला एकतरफा हो सकता है। इसलिए संगठन फिलहाल किसी भी दावेदार को स्पष्ट संकेत देने से बच रहा है।
मीरगंज की राजनीति में इस समय सबसे अधिक चर्चा जिस संभावना की हो रही है, वह है लोधी बिरादरी से किसी मजबूत चेहरे को मैदान में उतारने की।
इसके पीछे सीधा राजनीतिक गणित है। बरेली और आसपास के क्षेत्रों में लोधी समाज का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक माना जाता है। भाजपा लंबे समय से इस वर्ग में मजबूत पकड़ बनाए हुए है। ऐसे में यदि समाजवादी पार्टी किसी प्रभावशाली लोधी नेता को अपने साथ जोड़ने में सफल होती है तो चुनावी मुकाबला रोचक हो सकता है। क्योंकि मौजूदा भाजपा विधायक भी इसी बिरादरी से आते हैं।
सूत्रों का दावा है कि पार्टी केवल अपने संगठन के भीतर ही नहीं, बल्कि दूसरे दलों में भी ऐसे चेहरे तलाश रही है जिनकी सामाजिक स्वीकार्यता हो, जिनका अपना वोट बैंक हो और जो भाजपा के परंपरागत वोटों में सेंध लगा सकें।
यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि मीरगंज से टिकट किसी ऐसे चेहरे को मिल सकता है जिसका नाम अभी तक सार्वजनिक रूप से चर्चा में भी नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि जिन नेताओं की दावेदारी कमजोर मानी जा रही है, उन्हें भी पार्टी पूरी तरह निराश नहीं कर रही। इसके पीछे भी एक राजनीतिक रणनीति बताई जा रही है। संगठन चाहता है कि मीरगंज में पार्टी की गतिविधियां लगातार जारी रहें। यदि अभी से किसी को टिकट न मिलने का संकेत दे दिया गया तो अधिकांश दावेदार सक्रिय राजनीति से दूरी बना सकते हैं। इससे पार्टी का स्थानीय ढांचा कमजोर पड़ सकता है।
यही कारण है कि अलग-अलग नेताओं को समय-समय पर मंच दिया जा रहा है, बैठकों में बुलाया जा रहा है, बड़े नेता उनके घर भी जा रहे हैं और उन्हें यह एहसास कराया जा रहा है कि टिकट की दौड़ अभी खुली हुई है।
समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि बरेली जिले में मीरगंज उनकी सबसे चुनौतीपूर्ण सीटों में से एक है। यहां भाजपा का संगठन मजबूत है और पिछले कुछ वर्षों में उसका सामाजिक आधार भी व्यापक हुआ है।
यही वजह है कि पार्टी इस सीट पर कोई सामान्य प्रयोग करने के मूड में नहीं है। संगठन का मानना है कि यदि मीरगंज में मजबूत और सामाजिक रूप से स्वीकार्य चेहरा नहीं उतारा गया तो चुनावी परिणाम पहले से तय माने जा सकते हैं।
फिलहाल मीरगंज की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुराने समीकरण टूटते दिखाई दे रहे हैं, लेकिन नए समीकरण अभी बने नहीं हैं। सुल्तान बेग का मीरगंज से दूरी बनाना, मुस्लिम दावेदारों की कमजोर होती स्थिति और लोधी चेहरे की तलाश- ये तीनों संकेत बताते हैं कि समाजवादी पार्टी यहां बड़ा राजनीतिक प्रयोग करने की तैयारी में है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पार्टी किसी दूसरे दल से प्रभावशाली नेता को लाकर सबको चौंकाएगी, या फिर मौजूदा दावेदारों में से किसी को अंतिम समय पर मौका मिलेगा? लेकिन एक बात लगभग तय मानी जा रही है कि मीरगंज में समाजवादी पार्टी का टिकट इस बार केवल निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि जीत की संभावना के आधार पर तय होगा। और यही कारण है कि पार्टी आज भी उस “चौंकाने वाले चेहरे” की तलाश में है जो **मीरगंज की जमी हुई राजनीतिक बिसात को पलट सके।




