नीरज सिसौदिया, बरेली
राजनीति में जो दिखाई देता है, वह अक्सर पूरी कहानी नहीं होता। मंच पर भाषण देने वाले नेता सुर्खियों में होते हैं, तस्वीरें छपती हैं और राजनीतिक संदेश जनता तक पहुंचता है, लेकिन उस मंच तक लोगों को लाने, कार्यक्रम की पूरी व्यवस्था करने, कार्यकर्ताओं को सूचना देने, प्रदेश नेतृत्व के निर्देशों को जमीन तक पहुंचाने और कार्यक्रम खत्म होने के बाद उसकी समीक्षा करने वाले चेहरे अक्सर कैमरे की नजर से दूर रह जाते हैं। बरेली महानगर समाजवादी पार्टी की राजनीति में ऐसे ही कुछ चेहरे हैं, जिनकी भूमिका किसी एक पद या किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है।
पंडित दीपक शर्मा, हसीब खान, शेर सिंह गंगवार, हरिओम प्रजापति और राजेश मौर्य- ये पांचों अलग-अलग पदों पर जरूर हैं, लेकिन संगठन के काम में इनकी भूमिका एक-दूसरे से जुड़ी हुई नजर आती है। कोई कार्यक्रम हो, प्रदेश नेतृत्व से कोई संदेश आया हो, किसी बड़े नेता का बरेली दौरा हो, मतदाता सूची से जुड़ा काम हो, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना हो या पार्टी कार्यालय में देर रात तक चलने वाला संगठनात्मक अभियान, इन सभी मोर्चों पर इन पांच चेहरों की सामूहिक सक्रियता दिखाई देती है।

इसी वजह से महानगर में सपा के संगठन को समझने के लिए केवल मंच पर नजर आने वाले नेताओं को देखना पर्याप्त नहीं है। पार्टी के कार्यक्रमों की तैयारियों और उनके क्रियान्वयन में पर्दे के पीछे काम करने वाली इस टीम की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जब सुबह से लेकर रात के डेढ़-दो बजे तक चलता रहा काम
इन नेताओं की सक्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण मतदाता सूची के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के दौरान देखने को मिला। जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम चल रहा था, उस समय पार्टी कार्यालय केवल दिन के समय सक्रिय रहने वाली जगह नहीं रहा। सुबह से शुरू होने वाला काम कई बार देर रात तक चलता रहा। बताया जाता है कि इन नेताओं और संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की टीम रात के डेढ़-दो बजे तक पार्टी कार्यालय में मौजूद रहकर काम करती थी।

वोट बनवाने से लेकर मतदाता सूची से जुड़ी जानकारी जुटाने, कार्यकर्ताओं को प्रक्रिया समझाने और क्षेत्र से आने वाली सूचनाओं को एक जगह जुटाने तक का काम लगातार चलता रहा। किसी इलाके में क्या स्थिति है, कहां कार्यकर्ताओं को अधिक सक्रिय करने की जरूरत है, कहां मतदाताओं से संपर्क की आवश्यकता है, इन तमाम जानकारियों को संगठन के भीतर पहुंचाने में भी इन नेताओं की भूमिका रही।
राजनीतिक दलों के लिए मतदाता सूची का काम कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनावी राजनीति में एक-एक नाम और एक-एक बूथ का महत्व होता है। ऐसे में दिन खत्म होने के बाद भी पार्टी कार्यालय में बैठकर इस काम को आगे बढ़ाना केवल औपचारिक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी का हिस्सा भी माना जाता है।
सूचना की कड़ी भी यही चेहरे
संगठन में केवल कार्यक्रम करना ही चुनौती नहीं होता। प्रदेश कार्यालय से आने वाले निर्देशों को समय पर स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना, क्षेत्र से मिलने वाली महत्वपूर्ण सूचनाओं को पार्टी के बड़े नेताओं तक पहुंचाना और दोनों स्तरों के बीच तालमेल बनाए रखना भी जरूरी होता है। बरेली महानगर में यह जिम्मेदारी भी इन पांच नेताओं की सक्रियता से जुड़ी रही है।
लखनऊ से जब पार्टी का कोई बड़ा नेता बरेली आता है तो मंच पर भाषण और राजनीतिक संदेश बाद की बात होती है। उससे पहले कई स्तरों पर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहां कार्यक्रम होगा, कितने कार्यकर्ता पहुंचेंगे, किस विधानसभा से कितने लोग आएंगे, स्वागत कैसे होगा, स्थानीय नेताओं से किस तरह समन्वय किया जाएगा और कार्यक्रम के बाद वरिष्ठ नेता किन लोगों से मिलेंगे—इन सबकी तैयारी संगठन के स्थानीय पदाधिकारियों को करनी होती है।
इन पांचों नेताओं की भूमिका ऐसे मौकों पर भी सामने आती है। बड़े नेताओं के दौरे में भीड़ जुटाने से लेकर कार्यकर्ताओं को सूचना देने, स्वागत और कार्यक्रम की व्यवस्थाओं तक इनकी सक्रियता रहती है। यही नहीं, पार्टी नेतृत्व तक स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण राजनीतिक और संगठनात्मक सूचनाएं पहुंचाने का काम भी इन्हीं संपर्क सूत्रों के जरिए आगे बढ़ता है।
इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि प्रदेश नेतृत्व के पास हर मोहल्ले, हर वार्ड और हर बूथ की जानकारी सीधे नहीं पहुंच सकती। स्थानीय संगठन के सक्रिय पदाधिकारी ही बताते हैं कि किस इलाके में क्या माहौल है, किस कार्यकर्ता की क्या भूमिका है और किस कार्यक्रम में किस तरह की तैयारी की जरूरत होगी।

कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होती जिम्मेदारी
समाजवादी पार्टी महानगर कार्यालय में होने वाली छोटी-बड़ी गोष्ठियों, जयंती और पुण्यतिथि कार्यक्रमों, जन्मदिन समारोहों या ईद के मौके पर होने वाले इफ्तार जैसे कार्यक्रमों को बाहर से देखने पर भले ही वे सामान्य राजनीतिक आयोजन लगें, लेकिन इनके पीछे संगठन की लंबी तैयारी होती है।
किसे सूचना देनी है, किस विधानसभा सीट से किसे बुलाना है, वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी कैसे सुनिश्चित करनी है, बैठने की व्यवस्था से लेकर स्वागत तक क्या होगा और कार्यक्रम के बाद संबंधित लोगों तक आगे की सूचना कैसे पहुंचानी है- ये सभी काम किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं चलते।
बरेली महानगर में इन पांच नेताओं की सामूहिक सक्रियता इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाती है। यही वजह है कि छोटे से छोटे आयोजन में भी इन चेहरों में से कोई न कोई सक्रिय दिखाई देता है। पार्टी के भीतर उनकी उपयोगिता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वे कितनी बार मंच पर बैठे, बल्कि इस बात से भी जुड़ी है कि मंच तैयार होने से पहले उन्होंने कितने लोगों से संपर्क किया।
पीडीए पंचायत से लेकर कार्यकर्ता बैठकों तक
समाजवादी पार्टी की ओर से आयोजित पीडीए पंचायतों में भी इन पांचों नेताओं की सक्रियता का यही स्वरूप दिखाई देता है। इन कार्यक्रमों का मकसद केवल भाषण या औपचारिक बैठक नहीं होता। स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं से संवाद, पार्टी की नीतियों को समझाना और क्षेत्रीय मुद्दों को संगठन तक पहुंचाना भी इसका हिस्सा है।
ऐसे कार्यक्रमों में किसी एक नेता की मौजूदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण पूरी टीम का सक्रिय होना होता है। यही वह जगह है जहां पंडित दीपक शर्मा, हसीब खान, शेर सिंह गंगवार, हरिओम प्रजापति और राजेश मौर्य जैसे नेताओं की भूमिका सामने आती है। पांचों की जिम्मेदारियां अलग हो सकती हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही रहता है—कार्यक्रम को कागज से निकालकर जमीन पर उतारना।

टिकट की दावेदारी के बीच संगठन नहीं हुआ पीछे
इन पांच चेहरों में पंडित दीपक शर्मा और हसीब खान की विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर दावेदारी भी चर्चा में है। दीपक शर्मा कैंट विधानसभा सीट से तो हसीब खान शहर विधानसभा सीट से अपनी दावेदारी जता रहे हैं। लेकिन दिलचस्प पहलू यह है कि व्यक्तिगत राजनीतिक दावेदारी के बावजूद संगठनात्मक गतिविधियों में उनकी सक्रियता प्रभावित नहीं हुई।
यही किसी राजनीतिक संगठन के लिए महत्वपूर्ण बात होती है। टिकट मांगना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है, लेकिन टिकट की दावेदारी के दौरान संगठन के काम से दूरी बन जाना पार्टी के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। बरेली महानगर में इन दोनों नेताओं के बारे में यह बात कही जा सकती है कि अपनी राजनीतिक संभावनाओं के साथ-साथ उन्होंने संगठन की जिम्मेदारियों को भी जारी रखा।
दरअसल, पार्टी के भीतर किसी नेता की स्वीकार्यता केवल इस आधार पर नहीं बनती कि वह चुनाव लड़ना चाहता है। लंबे समय तक कार्यकर्ताओं के बीच मौजूद रहना, कार्यक्रमों में समय देना और संगठन के कठिन समय में उपलब्ध रहना भी राजनीतिक पूंजी का काम करता है।
महानगर अध्यक्ष की योजना, पांच चेहरों की मेहनत
महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी की ओर से तैयार की जाने वाली संगठनात्मक कार्ययोजना को जमीन पर लागू करने में भी इन पांच नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी भी संगठन में शीर्ष स्तर पर योजना बनाना पहला चरण होता है। असली परीक्षा तब होती है, जब वही योजना वार्ड, बूथ और विधानसभा स्तर तक पहुंचानी होती है।
90 फीसदी आयोजनों में किसी न किसी की मौजूदगी
महानगर में पार्टी के टिकट दावेदारों और दूसरे नेताओं की ओर से होने वाले छोटे-बड़े आयोजनों में भी इन पांच चेहरों में से किसी न किसी की मौजूदगी आम बात मानी जाती है। यह सक्रियता बताती है कि संगठन में इन नेताओं की भूमिका किसी एक गुट या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है।
राजनीतिक दल में ऐसे नेता अक्सर ‘थैंकलेस जॉब’ करते हैं। कार्यक्रम सफल हुआ तो मंच पर बैठे नेताओं को श्रेय मिलता है, लेकिन व्यवस्था में छोटी सी कमी रह गई तो सवाल सबसे पहले संगठन पर उठता है। इसके बावजूद लगातार कार्यक्रमों में सक्रिय रहना, देर रात तक काम करना और कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क बनाए रखना आसान काम नहीं है।

बरेली की चुनावी राजनीति में इस टीम की असली परीक्षा आगे
आने वाला विधानसभा चुनाव बरेली की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। समाजवादी पार्टी के लिए भी यह समय केवल टिकट तय करने का नहीं, बल्कि संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने का है। पिछले चुनावों में पार्टी ने बरेली महानगर में अपनी मौजूदगी को जिस तरह बनाए रखा है, उसके पीछे केवल चुनाव के समय की सक्रियता नहीं, बल्कि सालभर चलने वाला संगठनात्मक काम भी है।
यही कारण है कि पंडित दीपक शर्मा, हसीब खान, शेर सिंह गंगवार, हरिओम प्रजापति और राजेश मौर्य को केवल पांच अलग-अलग पदों पर बैठे नेताओं के रूप में देखना तस्वीर को छोटा कर देता है। इनकी वास्तविक भूमिका उस संगठनात्मक तंत्र में है जो मंच और मैदान के बीच पुल का काम करता है।
एक तरफ पार्टी के बड़े नेता राजनीतिक संदेश देते हैं, दूसरी तरफ इन जैसे नेता उस संदेश को कार्यकर्ता तक और कार्यकर्ता की आवाज को नेतृत्व तक पहुंचाते हैं। एक तरफ चुनावी रणनीति बनती है, दूसरी तरफ मतदाता सूची, बूथ, कार्यकर्ता संपर्क और कार्यक्रमों के जरिए उसे जमीन पर उतारने की कोशिश होती है।
यही वजह है कि बरेली महानगर में सपा की सियासी ताकत की चर्चा करते समय इन पांच चेहरों को केवल ‘पर्दे के पीछे रहने वाले नेता’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। ये वे संगठनात्मक सूत्रधार हैं, जिनकी मेहनत मंच की चमक को जमीन की ताकत में बदलने का काम करती है।




