नीरज सिसौदिया, बरेली
शिक्षक दिवस पर किसी सभागार में शिक्षकों की भीड़ जुटाकर सम्मान करने की परंपरा से अलग समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और बरेली कैंट विधानसभा सीट से 2027 के लिए टिकट के प्रमुख दावेदारों में शामिल राजेश अग्रवाल ने इस बार शिक्षक सम्मान को एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं रखा है। उन्होंने पांच सितंबर से पांच अक्टूबर तक पूरे एक महीने को ‘शिक्षक सम्मान माह’ के रूप में मनाने का अभियान शुरू किया है। इस अभियान की खास बात यह है कि राजेश अग्रवाल किसी एक मंच पर शिक्षकों को बुलाने के बजाय खुद स्कूल-स्कूल पहुंच रहे हैं और वहीं बच्चों तथा शिक्षकों के बीच सम्मान समारोह आयोजित कर रहे हैं।
अभियान शुरू हुए करीब ढाई सप्ताह का समय बीत चुका है और राजेश अग्रवाल अब तक 70 से अधिक स्कूलों में जाकर शिक्षकों को सम्मानित कर चुके हैं। उनका कार्यक्रम पांच अक्टूबर तक जारी रहने वाला है। इस दौरान वह रोजाना तीन से चार स्कूलों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। स्कूल में पहुंचकर शिक्षकों से व्यक्तिगत संवाद करना, उन्हें सम्मानित करना और शिक्षा तथा समाज से जुड़े विषयों पर बातचीत करना इस अभियान का हिस्सा है। साथ ही वह समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की नीतियों को भी शिक्षकों के बीच रखते नजर आ रहे हैं।
राजेश अग्रवाल के इस अभियान को केवल शिक्षक दिवस के कार्यक्रमों की सामान्य कड़ी के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसकी वजह अभियान का स्वरूप है। सामान्य तौर पर शिक्षक दिवस पर एक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित कर बड़ी संख्या में शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है और कार्यक्रम समाप्त होने के साथ ही आयोजन भी समाप्त हो जाता है। राजेश अग्रवाल ने इसी स्थापित शैली से अलग रास्ता चुना है। उन्होंने शिक्षक को भीड़ में शामिल करने के बजाय शिक्षक के कार्यस्थल तक पहुंचने की रणनीति अपनाई है।
राजेश अग्रवाल का कहना है कि शिक्षक केवल एक पेशे से जुड़े व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि समाज और व्यक्ति के निर्माण में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए उनका सम्मान केवल एक दिन नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, शिक्षक दिवस पर शिक्षकों की भीड़ जुटाकर उन्हें मंच पर सम्मानित करना पर्याप्त नहीं है। यदि शिक्षक वास्तव में समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं तो उनके पास जाना चाहिए, उनके स्कूल में जाना चाहिए और उन बच्चों के बीच उनका सम्मान किया जाना चाहिए, जिनके भविष्य को गढ़ने में शिक्षक अपनी भूमिका निभाते हैं।


इसी सोच के साथ उन्होंने इस बार एक महीने का अभियान शुरू किया है। उनका कहना है कि शिक्षक किसी राजनीतिक या सामाजिक कार्यक्रम में भीड़ का हिस्सा नहीं हैं। वे समाज के सबसे महत्वपूर्ण वर्गों में शामिल हैं और इसलिए उनका सम्मान भी उसी तरह विशेष होना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने प्रत्येक स्कूल तक पहुंचने और वहां मौजूद शिक्षकों को व्यक्तिगत रूप से सम्मानित करने का फैसला किया।
इस अभियान के दौरान राजेश अग्रवाल जिन स्कूलों तक पहुंच चुके हैं, उनमें गुरुनानक खालसा इंटर कॉलेज, सुभाष नगर, वैदेही बाल विद्या मंदिर, कालीबाड़ी, इस्लामिया इंटर कॉलेज, रामभरोसे लाल गर्ल्स इंटर कॉलेज, लायंस विद्या मंदिर, मकरंदपुर सरकार, बिशप मंडल इंटर कॉलेज, खलील हायर सेकेंडरी स्कूल, सुदेश भूषण गर्ल्स इंटर कॉलेज, मढ़ीनाथ और वीके एजुकेशनल एकेडमी, मढ़ीनाथ सहित कई शिक्षण संस्थान शामिल हैं।


अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजेश अग्रवाल केवल सम्मान करने के लिए स्कूल पहुंचते हैं, बल्कि शिक्षकों से सीधे संवाद भी कर रहे हैं। स्कूल के वातावरण में होने वाला यह संवाद किसी सार्वजनिक मंच पर होने वाली औपचारिक मुलाकात से अलग है। शिक्षक अपने स्कूल में रहते हैं, उनके सामने विद्यार्थी होते हैं और उसी माहौल में उन्हें सम्मानित किया जाता है। इससे अभियान का सामाजिक संदेश भी अलग तरीके से सामने आता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस अभियान ने राजेश अग्रवाल की सक्रियता को एक अलग दिशा दी है। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी में कई दावेदार सक्रिय हैं। राजेश अग्रवाल पहले भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और मौजूदा समय में कैंट सीट से सपा टिकट के प्रमुख दावेदारों में उनका नाम लिया जा रहा है। हाल के महीनों में वह अलग-अलग सामाजिक वर्गों के कार्यक्रमों में सक्रिय नजर आए हैं। गृह कर ब्याज माफी योजना को लेकर उन्होंने नगर निगम में भी मुद्दा उठाया और उसे अंजाम तक पहुंचाया।


‘शिक्षक सम्मान माह’ इसी सक्रियता का एक नया विस्तार दिखाई देता है। हालांकि इस अभियान का घोषित उद्देश्य शिक्षकों का सम्मान है, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव से भी इनकार नहीं किया जा सकता। प्रत्येक स्कूल तक पहुंचने का मतलब है कि राजेश अग्रवाल को अलग-अलग शिक्षकों, कर्मचारियों और स्थानीय सामाजिक समूहों से संवाद का अवसर मिल रहा है। स्कूलों में मौजूद विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच भी उनकी मौजूदगी दर्ज हो रही है। इस तरह एक सामाजिक अभियान राजनीतिक जनसंपर्क का माध्यम भी बन रहा है।
खास बात यह है कि शिक्षक समाज का ऐसा वर्ग हैं, जिसकी सामाजिक पहुंच केवल स्कूल परिसर तक सीमित नहीं होती। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के परिवारों और स्थानीय समाज के साथ भी लगातार संपर्क में रहते हैं। ऐसे में किसी राजनीतिक दावेदार का स्कूल-स्कूल जाकर शिक्षकों से संवाद करना उसे व्यापक सामाजिक नेटवर्क तक पहुंचने का अवसर देता है। यही वजह है कि ‘शिक्षक सम्मान माह’ को राजेश अग्रवाल की राजनीतिक सक्रियता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण अभियान माना जा रहा है।


इस अभियान का एक दूसरा पहलू यह है कि राजेश अग्रवाल उन शिक्षकों तक भी पहुंच बना रहे हैं जिनकी राजनीतिक पसंद अलग हो सकती है। उनके लिए किसी शिक्षक का राजनीतिक समर्थन किस दल के साथ है, यह अभियान की घोषित शर्त नहीं है। स्कूल में जाकर सम्मान करने की उनकी रणनीति का आधार शिक्षक होना है। इससे उन्हें उन शिक्षकों से भी संवाद का अवसर मिल रहा है जो समाजवादी पार्टी की राजनीति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े नहीं हैं।
यही बात इस अभियान को सामान्य पार्टी कार्यक्रमों से अलग करती है। किसी पार्टी कार्यालय, पार्टी सम्मेलन या राजनीतिक सभा में आम तौर पर वही लोग पहुंचते हैं जो पहले से राजनीतिक रूप से सक्रिय होते हैं। इसके विपरीत स्कूलों तक पहुंचने पर राजनीतिक रूप से अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों से संपर्क बनता है। राजेश अग्रवाल के लिए यह एक ऐसा सामाजिक संपर्क क्षेत्र है, जहां पार्टी की पारंपरिक सीमाओं से बाहर जाकर संवाद किया जा सकता है।


राजेश अग्रवाल के समर्थक इस अभियान को उनके अब तक के सबसे अलग सामाजिक अभियानों में गिन रहे हैं। उनका तर्क है कि बरेली कैंट जैसी शहरी और विविध सामाजिक संरचना वाली विधानसभा सीट में केवल पारंपरिक राजनीतिक कार्यक्रमों से व्यापक संपर्क बनाना आसान नहीं है। अलग-अलग स्कूलों में पहुंचने से समाज के ऐसे हिस्सों तक संपर्क बनता है जहां राजनीतिक दलों के सामान्य कार्यक्रम हमेशा नहीं पहुंच पाते।
बरेली कैंट विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास भी इसे महत्वपूर्ण बनाता है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार इस सीट पर पिछले वर्षों में भाजपा का मजबूत प्रदर्शन रहा है, जबकि समाजवादी पार्टी भी यहां अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास करती रही है। 2022 में भाजपा के संजीव अग्रवाल ने सपा की सुप्रिया ऐरन को 10,768 मतों से हराया था।


ऐसे राजनीतिक माहौल में किसी दावेदार की गतिविधियां केवल पार्टी कार्यकर्ताओं तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंचने लगें तो उसका महत्व बढ़ जाता है। राजेश अग्रवाल का ‘शिक्षक सम्मान माह’ इसी व्यापक संपर्क की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
राजेश अग्रवाल की राजनीति में सामाजिक संपर्क कोई नया प्रयोग नहीं है। हाल के समय में वह धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में भी सक्रिय रहे हैं। उनके बारे में प्रकाशित रिपोर्टों में विभिन्न समुदायों के कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी का उल्लेख किया गया है। उनके हालिया बयानों में भी वह लंबे समय से जनता के बीच सक्रिय रहने और अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने को अपनी राजनीतिक शैली का हिस्सा बताते रहे हैं।


‘शिक्षक सम्मान माह’ इस रणनीति को एक नए क्षेत्र में ले जाता है। यहां राजनीतिक सभा की जगह स्कूल है, भाषण की जगह व्यक्तिगत संवाद है और भीड़ की जगह शिक्षक केंद्र में हैं। यही इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बनकर सामने आ रही है।
राजेश अग्रवाल के लिए पांच अक्टूबर तक चलने वाला यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हर दिन तीन से चार स्कूलों तक पहुंचने की योजना के साथ महीने भर में बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य रखा गया है। 70 से अधिक स्कूलों में पहुंचने के बाद अभियान अभी जारी है। यानी पांच अक्टूबर तक यह संख्या और बढ़ सकती है।


इस अभियान से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि राजेश अग्रवाल अपनी दावेदारी को केवल टिकट मांगने तक सीमित रखने के बजाय लगातार जमीन पर सक्रियता के जरिए मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सामने सपा के अन्य दावेदार भी अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में ‘शिक्षक सम्मान माह’ उनके अभियान को एक अलग पहचान दे रहा है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षक सम्मान को राजनीतिक प्रचार के साथ जोड़ते हुए भी राजेश अग्रवाल ने अभियान का मूल केंद्र शिक्षक को बनाया है। स्कूल में शिक्षक को सम्मानित करना, उनसे बातचीत करना और फिर पार्टी की नीतियों को सामने रखना उनकी रणनीति का हिस्सा है। इस लिहाज से अभियान में सामाजिक सम्मान और राजनीतिक जनसंपर्क दोनों पहलू साथ-साथ दिखाई देते हैं।
पांच अक्टूबर को जब यह अभियान समाप्त होगा, तब इसके तहत कितने स्कूलों तक राजेश अग्रवाल पहुंचे, कितने शिक्षकों से सीधा संवाद हुआ और इस पहल का सामाजिक असर कितना रहा, यह अलग से आकलन का विषय होगा। लेकिन फिलहाल ‘शिक्षक सम्मान माह’ ने बरेली कैंट की राजनीति में एक ऐसा प्रयोग जरूर सामने रखा है, जिसमें शिक्षक दिवस को एक दिन के कार्यक्रम से निकालकर पूरे महीने के जनसंपर्क अभियान में बदल दिया गया है।

राजेश अग्रवाल का संदेश साफ है—शिक्षक सम्मान के लिए शिक्षक को मंच तक बुलाने के बजाय मंच को शिक्षक के स्कूल तक ले जाना चाहिए। इसी विचार के साथ स्कूल-स्कूल पहुंच रहा यह अभियान अब 2027 की राजनीतिक तैयारियों के बीच राजेश अग्रवाल की सार्वजनिक सक्रियता का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है।




