यूपी

पीडीए समीकरण, किसान आधार और सियासी विरासत का संगम हैं सपा के पूर्व विधायक शराफतयार खां, मीरगंज विधानसभा सीट पर फिलहाल शराफतयार खां की दावेदारी सब पर पड़ रही भारी, जानिये क्यों?

Share now

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की मीरगंज विधानसभा सीट पर जैसे-जैसे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे समाजवादी पार्टी के भीतर संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चा तेज होती जा रही है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी किसी नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र की राजनीतिक हलचल, संगठनात्मक गतिविधियों और जनाधार के समीकरणों को देखें तो एक नाम सबसे अधिक मजबूती के साथ उभरता दिखाई दे रहा है। वह नाम है पूर्व विधायक और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शराफतयार खां का।
मीरगंज की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकारों का मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी इस सीट पर जीत की सबसे मजबूत रणनीति तलाश रही है, तो शराफतयार खां का नाम सबसे आगे दिखाई देता है। इसकी वजह केवल उनका राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि क्षेत्र में वर्षों से बना उनका सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत नेटवर्क भी है।
इन दिनों शराफतयार खां लगातार विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हैं। गांव-गांव मुलाकातों का दौर चल रहा है। कार्यकर्ताओं से संवाद हो रहा है। सामाजिक समूहों के बीच संपर्क अभियान तेज किया जा रहा है। बेटी की शादी, बच्चों का जन्मदिन या कोई दुख का पल, शराफतयार खां की मौजूदगी हर कहीं नजर आ रही है। अब वह पीडीए पंचायतों को और व्यापक स्तर पर आयोजित करने की तैयारी में जुटे हैं। राजनीतिक जानकार इसे महज संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगामी चुनाव की जमीन तैयार करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
हाल ही में उनके आवास पर समाजवादी पार्टी के नवनियुक्त जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं का भव्य स्वागत हुआ। इस आयोजन को कई नेताओं ने सामान्य शिष्टाचार मुलाकात बताया, लेकिन स्थानीय राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों का मानना है कि इससे एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी गया। संदेश यह कि संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच शराफतयार खां की स्वीकार्यता आज भी मजबूत बनी हुई है।


मीरगंज विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां केवल जातीय गणित चुनाव नहीं जिताता। यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, परिवार की साख और जनता के बीच वर्षों से बना विश्वास भी निर्णायक भूमिका निभाता है। यही वजह रही कि जब सुल्तान बेग इन पैमानों पर खरे उतरे तो जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया लेकिन जब वह इन पैमानों पर खरे नहीं उतरे तो जनता ने उन्हें एक नहीं तीन बार नकार दिया और इसी अस्वीकार्यता ने सुल्तान बेग को चुनावी लड़ाई से ही बाहर कर दिया। यही वह क्षेत्र है जहां शराफतयार खां अन्य संभावित दावेदारों से आगे निकलते दिखाई देते हैं।
शराफतयार खां का परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय रहा है। उनके पिता स्वर्गीय मिसिरयार खां अपने दौर के बड़े नेताओं में गिने जाते थे। वह तत्कालीन कांवर विधानसभा सीट से विधायक रहे और बाद में सांसद भी बने। क्षेत्र में आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। मीरगंज में मिसिरयार खां की विरासत आज भी एक प्रभावी राजनीतिक पूंजी है, जिसका लाभ शराफतयार खां को स्वाभाविक रूप से मिलता है।


लेकिन केवल विरासत के सहारे राजनीति नहीं चलती। शराफतयार खां की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक जमीन को संभालने के साथ-साथ उसे आगे बढ़ाने का भी काम किया। विधायक रहने के दौरान उनकी सक्रियता और जनता के बीच लगातार मौजूदगी ने उन्हें क्षेत्र में एक अलग पहचान दी।
मीरगंज की राजनीति में किसान हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। गन्ना, गेहूं और अन्य फसलों पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस क्षेत्र में किसान वर्ग का झुकाव जिस नेता की ओर होता है, उसका चुनावी लाभ भी स्पष्ट दिखाई देता है। शराफतयार खां लंबे समय से किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में उनकी स्वीकार्यता अन्य नेताओं की तुलना में अधिक दिखाई देती है।
इसके साथ ही दलित समाज और पिछड़े वर्गों के बीच भी उनकी सक्रियता चर्चा का विषय रहती है। समाजवादी पार्टी जिस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को लेकर आगे बढ़ रही है, उसमें शराफतयार खां का राजनीतिक प्रोफाइल पूरी तरह फिट बैठता नजर आता है। वह न केवल अल्पसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि पिछड़े और दलित वर्गों के बीच भी उनकी मजबूत पहुंच मानी जाती है।


मीरगंज में लोधी समाज को चुनावी दृष्टि से गेम चेंजर माना जाता है। मौजूदा विधायक भी इसी समाज से आते हैं। यह वर्ग चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। दिलचस्प बात यह है कि शराफतयार खां का इस समाज में भी अच्छा प्रभाव माना जाता है। उनके परिवार के पुराने राजनीतिक संबंध और व्यक्तिगत संपर्क इस प्रभाव को और मजबूत बनाते हैं। यही वह बिंदु है जो उन्हें केवल एक समुदाय का नेता नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सामाजिक समर्थन वाले नेता के रूप में स्थापित करता है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह भी महत्वपूर्ण है कि शराफतयार खां लगातार महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरते रहे हैं। वह केवल चुनावी मौसम के नेता के रूप में नहीं, बल्कि लगातार सक्रिय विपक्षी चेहरे के रूप में दिखाई देते हैं। इससे कार्यकर्ताओं के बीच भी उनका मनोबल मजबूत बना हुआ है।


सपा के अंदर भी यह चर्चा आम है कि मीरगंज जैसी महत्वपूर्ण सीट पर पार्टी ऐसा चेहरा उतारना चाहेगी जो केवल टिकट का दावेदार न हो, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता भी रखता हो। इसी कसौटी पर शराफतयार खां का नाम सबसे मजबूत माना जा रहा है। उनके पास अनुभव है, जनता का भरोसा है, राजनीतिक विरासत है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उनके पास विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़ने की क्षमता भी है।
मीरगंज में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे का मुकाबला करना होगी। ऐसे में पार्टी को ऐसे उम्मीदवार की जरूरत होगी जो बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर सके और जनता के बीच स्वाभाविक स्वीकार्यता रखता हो। इस नजरिए से देखा जाए तो शराफतयार खां की दावेदारी बाकी संभावित नामों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत दिखाई देती है।
यही कारण है कि मीरगंज की राजनीतिक गलियों से लेकर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच तक एक चर्चा तेजी से सुनाई दे रही है- यदि पार्टी जीत को प्राथमिकता देती है, तो शराफतयार खां को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। वर्तमान परिस्थितियों में वह न केवल टिकट के सबसे प्रबल दावेदार दिखाई दे रहे हैं, बल्कि ऐसे चेहरे के रूप में भी उभर रहे हैं जो मीरगंज में समाजवादी पार्टी की चुनावी उम्मीदों को नई ताकत दे सकते हैं। खास तौर पर उन उम्मीदों को जिन पर पिछले 15 साल से आजम खां के चहेते सुल्तान बेग पानी फेरते आ रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *