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बरेली कैंट विधानसभा सीट : सिर्फ दावों तक सीमित नहीं है राजेश अग्रवाल की दावेदारी, भाजपाई खेमे में मची खलबली, जनआंदोलनों, पीडीए अभियान और लगातार जनसंपर्क ने बढ़ाई ताकत, जानिये क्यों भाजपाइयों की आंखों में खटकने लगे हैं सपा नेता राजेश अग्रवाल?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी ने अभी उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है, फिर भी संभावित दावेदारों को लेकर संगठन और राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो चुकी है। इन चर्चाओं में सबसे प्रमुख नाम वरिष्ठ पार्षद, बरेली विकास प्राधिकरण के सदस्य और समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल का है। इसकी वजह केवल उनका लंबा राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि पिछले तीन दशकों से जनहित के मुद्दों पर लगातार संघर्ष, आंदोलनों का नेतृत्व और चुनावी मौसम से इतर भी जनता के बीच बनी उनकी सक्रिय मौजूदगी है।


कैंट विधानसभा का चुनाव केवल पार्टी की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत विश्वसनीयता, सामाजिक स्वीकार्यता और जमीनी सक्रियता से भी प्रभावित होगा। ऐसे में राजेश अग्रवाल ने पिछले कुछ महीनों में जिस तरह अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज की हैं, उसने उनकी दावेदारी को और मजबूत किया है। राजेश अग्रवाल की चुनावी तैयारियों ने भाजपाई खेमे में खलबली मचा दी है। भाजपा नहीं चाहती कि उसका मुकाबला आगामी विधानसभा चुनाव में राजेश अग्रवाल जैसे आंदोलनकारी और संघर्ष से अपनी अलहदा पहचान बनाने वाले हिन्दू नेता के साथ हो। यही वजह है कि भाजपा नेता और कार्यकर्ता समाजवादी पार्टी के टिकट के मुस्लिम दावेदारों का अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार करने में जुट गए हैं। सूत्रों की मानें तो वह चाहते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी या तो किसी मुस्लिम चेहरे को मैदान में उतारे या फिर टिकट न मिलने से नाराज सपा का मुस्लिम दावेदार बसपा या किसी अन्य दल से चुनावी मैदान में उतर जाए और मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो जाए।
राजेश अग्रवाल को जानने वाले लोग बताते हैं कि उन्होंने अपनी राजनीति को केवल ज्ञापन, कंबल-भोजन पॉलिटिक्स तक ही सीमित नहीं रखा है। शहर में जब भी कोई बड़ा जनहित का मुद्दा सामने आया, वह सड़क पर उतरकर आंदोलन का नेतृत्व करते दिखाई दिए। यही वजह है कि उन्हें कैंट विधानसभा से समाजवादी पार्टी का एकमात्र ऐसा प्रमुख दावेदार माना जा रहा है, जिसकी पहचान धरना-प्रदर्शन और जनसंघर्ष से जुड़ी है।
चौपला फ्लाईओवर की मरम्मत में हो रही देरी का मुद्दा हो, चौपला-बदायूं रोड रेल अंडरपास की मांग हो, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं पर सवाल हों या शहर में नागरिक सुविधाओं की कमी- राजेश अग्रवाल लगातार इन मुद्दों को उठाते रहे हैं। चौपला फ्लाईओवर के मामले में प्रशासन पर लगातार दबाव बनाने के बाद निर्धारित समय से पहले कार्य पूरा हुआ। इसके बाद चौपला अंडरपास की मांग को लेकर भी संघर्ष समिति के संयोजक के रूप में उन्होंने अभियान को नई गति दी। समर्थकों का कहना है कि उनकी राजनीति का उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि समाधान तक पहुंचना रहा है। यही कारण है कि विपक्ष में होने के बावजूद उनके आंदोलनों को प्रशासन भी गंभीरता से लेता है।

परिवर्तन की बात नहीं, परिवर्तन का भरोसा भी हैं राजेश अग्रवाल

राजनीति में लगभग हर नेता बदलाव की बात करता है, लेकिन जनता उसी पर भरोसा करती है जिसने वर्षों तक उसके बीच रहकर संघर्ष किया हो। बरेली कैंट में राजेश अग्रवाल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यही मानी जा रही है। पिछले करीब तीस वर्षों से उन्होंने सड़क, नाला, यातायात, जलभराव, फ्लाईओवर, अंडरपास, स्मार्ट सिटी, विकास योजनाओं और नगर निगम से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया है। वे केवल यह नहीं जानते कि जनता की समस्या क्या है, बल्कि यह भी जानते हैं कि उस समस्या को किस मंच पर और किस प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाया जाए। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि उनके उठाए गए मुद्दों को केवल जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक अधिकारी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी गंभीरता से लेते हैं। कई मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई और निर्णय भी देखने को मिले हैं। यही कारण है कि कैंट विधानसभा क्षेत्र में उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी है, जो केवल वादे नहीं करता, सिर्फ भाषण नहीं देता बल्कि मुद्दों को अंजाम तक पहुंचाने की क्षमता भी रखता है।

सिर्फ आंदोलन नहीं, समाज से भी मजबूत जुड़ाव

पिछले कुछ दिनों की उनकी गतिविधियां बताती हैं कि राजेश अग्रवाल केवल राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं हैं। अमरनाथ यात्रा के लिए रवाना होने वाले भंडारे के पहले वाहन को विदा करना, श्रद्धालुओं की सेवा से जुड़े आयोजनों में भाग लेना, नेकपुर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होना, ज्येष्ठ मंगल और अन्य धार्मिक आयोजनों में सक्रिय रहना—इन सभी कार्यक्रमों ने उनकी सामाजिक स्वीकार्यता को और मजबूत किया है।
सुभाष नगर स्थित मनोकामना मंदिर में आयोजित शरबत वितरण कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को स्थानीय लोगों ने सराहा। उनके समर्थकों का कहना है कि चुनावी मौसम से पहले ही लोगों का छोटे-छोटे सामाजिक कार्यक्रमों में उन्हें स्वयं आमंत्रित करना उनके जनसंपर्क की मजबूती का संकेत है। खासतौर पर तब जबकि टिकट के अन्य दावेदार अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए लाखों रुपए खर्च करके कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

पीडीए अभियान से संगठन में भी बढ़ी सक्रियता

समाजवादी पार्टी पूरे प्रदेश में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की राजनीति को नई धार देने में जुटी है। कैंट विधानसभा में इस अभियान को जमीन पर उतारने में भी राजेश अग्रवाल सक्रिय भूमिका निभाते दिखाई दिए। वह घर-घर जाकर पीडीए गोष्ठियां कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में आयोजित ‘अधिकार लेने की पीडीए पंचायत’ में पार्टी के जिला अध्यक्ष, महानगर अध्यक्ष सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, व्यापारी और स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। इसके बाद भी उन्होंने जनसंपर्क अभियान को लगातार जारी रखा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में संगठन के लगभग हर बड़े कार्यक्रम में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता और मजबूत की है।

टिकट की दौड़ में बढ़ता दबदबा

सियासी गलियारों में चर्चा है कि राजेश अग्रवाल की लगातार बढ़ती सक्रियता ने कैंट विधानसभा सीट पर टिकट की दौड़ को काफी रोचक बना दिया है। जिस तरह वे लगातार जनआंदोलन, पीडीए पंचायत, जनसंपर्क अभियान और सामाजिक-धार्मिक आयोजनों में सक्रिय रहे हैं, उससे अन्य दावेदारों पर स्वाभाविक दबाव बढ़ा है। चर्चा यह भी है कि संगठन के भीतर उनकी बढ़ती सक्रियता और जनता के बीच बढ़ती स्वीकार्यता ने उन्हें टिकट की दौड़ में अलग स्थान दिला दिया है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर उनका नाम सबसे गंभीर दावेदारों में लिया जा रहा है।

हिंदू चेहरे के तौर पर भी चर्चा

कैंट विधानसभा का सामाजिक समीकरण हमेशा से बहुआयामी रहा है। यहां व्यापारी वर्ग, मध्यम वर्ग, कर्मचारी, युवा और विभिन्न सामाजिक समुदाय चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। ऐसे क्षेत्र में यदि समाजवादी पार्टी ऐसे उम्मीदवार पर दांव लगाती है जिसकी हिंदू समाज में भी व्यापक स्वीकार्यता हो और जो लंबे समय से जनसंघर्ष की राजनीति करता रहा हो, तो मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता है।
इसी संदर्भ में राजेश अग्रवाल का नाम चर्चा में है। सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी तथा विभिन्न वर्गों के बीच उनकी पहुंच को उनके समर्थक उनकी अतिरिक्त राजनीतिक ताकत मानते हैं।

क्यों माने जा रहे सबसे विश्वसनीय चेहरा?

राजनीति में विश्वसनीयता एक दिन में नहीं बनती। इसके लिए वर्षों तक जनता के बीच रहना पड़ता है। राजेश अग्रवाल का राजनीतिक सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है। नगर निगम से लेकर विकास प्राधिकरण तक की जिम्मेदारियां निभाने के दौरान उन्होंने लगातार जनसमस्याओं को प्राथमिकता दी। चुनाव जीतें या हारें, उन्होंने अपने जनसंपर्क और आंदोलनों की गति कभी कम नहीं होने दी। कैंट विधानसभा में उनकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि जनता उन्हें चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे पांच साल अपने बीच देखती रही है। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान एक विश्वसनीय और संघर्षशील नेता के रूप में स्थापित हुई है।

अंतिम फैसला नेतृत्व का, लेकिन संकेत स्पष्ट
समाजवादी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अंततः किसे उम्मीदवार बनाता है, इसका फैसला समय आने पर होगा। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और **जमीनी गतिविधियों को देखें तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि राजेश अग्रवाल ने अपनी दावेदारी को केवल दावों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि लगातार सक्रिय रहकर उसे मजबूत आधार दिया है। जनहित के आंदोलनों से लेकर प्रशासनिक मुद्दों पर संघर्ष, पीडीए अभियान से लेकर व्यापक जनसंपर्क और सामाजिक-धार्मिक आयोजनों में निरंतर भागीदारी ने उन्हें कैंट विधानसभा की राजनीति में अलग पहचान दी है। यदि समाजवादी पार्टी जमीनी संघर्ष, जनविश्वास, संगठनात्मक सक्रियता और जीतने की क्षमता को टिकट का आधार बनाती है, तो राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में राजेश अग्रवाल का नाम उन नेताओं में शामिल है, जिन्हें नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। पिछले तीन दशकों में अर्जित जनता का भरोसा ही आज उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बनकर सामने आ रहा है।

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