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दो आध्यात्मिक परंपराओं का संगम : संतों और सूफियों के सपनों वाला भारत, धर्मों की सरहदें पार कर शंकराचार्य के दरबार में पहुंचे डॉक्टर अनीस बेग, लिया आशीर्वाद, बेहद अहम हैं इस मुलाकात के मायने, जानिये क्यों?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली की सरजमीं ने एक बार फिर गंगा-जमुनी तहजीब की उस खूबसूरत तस्वीर को जीवंत होते देखा, जिसकी मिसालें देशभर में दी जाती रही हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और समाजसेवी डॉ. अनीस बेग ने जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज के दरबार में पहुंचकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। यह केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि दो आध्यात्मिक परंपराओं के बीच सम्मान, प्रेम और विश्वास का ऐसा संगम था, जिसने उपस्थित लोगों के हृदय को छू लिया।

इस अवसर पर समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव और महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी भी मौजूद रहे। तीनों नेताओं ने शंकराचार्य जी से मुलाकात कर समाज में सद्भाव, शांति और भाईचारे के मूल्यों को मजबूत करने का संकल्प दोहराया।

डॉ. अनीस बेग का व्यक्तित्व स्वयं में भारतीय संस्कृति की उस आत्मा का प्रतीक है, जिसमें अपनी आस्था के प्रति अटूट निष्ठा और दूसरी आस्थाओं के प्रति सम्मान साथ-साथ चलता है। वे इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं, उमरा की पवित्र यात्रा कर चुके हैं और अपने धार्मिक कर्तव्यों का पूरी श्रद्धा के साथ पालन करते हैं। लेकिन इसके साथ ही वे यह भी मानते हैं कि इंसानियत, प्रेम और सेवा ही हर धर्म का मूल संदेश है।

शायद यही वजह है कि जब वे सनातन परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक पर विराजमान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समक्ष पहुंचे, तो वहां कोई दीवार नहीं थी, कोई दूरी नहीं थी—सिर्फ अपनापन था, सम्मान था और मनुष्यता की वह सुगंध थी जो हर मजहब से ऊपर होती है।

मुलाकात का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने कर-कमलों से उपस्थित सभी लोगों को पुष्प भेंट किए। वह एक साधारण फूल नहीं था, बल्कि मानो सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति का संदेश था कि प्रेम बांटने से बढ़ता है और आस्था का सम्मान करने से समाज मजबूत होता है।

 

सनातन धर्म के शीर्ष संत का यह स्नेहिल व्यवहार उपस्थित लोगों के लिए अविस्मरणीय बन गया। उनके चेहरे पर वही सहज मुस्कान और वात्सल्य था, जो यह बताता है कि सच्चा अध्यात्म सीमाएं नहीं खींचता, बल्कि दिलों को जोड़ता है।

डॉ. अनीस बेग ने इस अवसर पर कहा कि सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और प्रेम का प्रसार है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है और जब हम एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करते हैं, तभी सच्चे अर्थों में राष्ट्र मजबूत होता है।

उन्होंने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जैसे संत केवल सनातन समाज के मार्गदर्शक नहीं हैं, बल्कि वे पूरे समाज को सद्भाव और नैतिकता का संदेश देने वाले आध्यात्मिक व्यक्तित्व हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करना अपने आप में सौभाग्य की बात है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे समय में, जब समाज को धर्म और जाति के आधार पर बांटने की कोशिशें होती रहती हैं, तब डॉ. अनीस बेग जैसे नेताओं की पहल एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। एक मुसलमान नेता का अपनी धार्मिक पहचान को पूरी गरिमा के साथ जीते हुए शंकराचार्य के चरणों में पहुंचना इस बात का संदेश है कि भारतीयता किसी एक पहचान का नाम नहीं, बल्कि सभी पहचानों के सम्मान का नाम है।

समाजवादी पार्टी लंबे समय से सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की राजनीति का दावा करती रही है। डॉ. अनीस बेग की यह पहल उन मूल्यों को व्यवहारिक रूप में सामने लाती दिखाई देती है। उनके साथ शुभलेश यादव और शमीम खां सुल्तानी की मौजूदगी ने इस संदेश को और अधिक मजबूत किया कि समाज को जोड़ने की राजनीति ही भविष्य का रास्ता है।

अनीस बेग ने कहा कि भारत की संस्कृति हमेशा से संतों, सूफियों और फकीरों की संस्कृति रही है। यहां प्रेम और भाईचारा सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का स्नेह और आशीर्वाद समाज को एक नई दिशा देने का काम करेगा।

उन्होंने कहा कि बरेली की पहचान उसकी साझा विरासत है। यहां मंदिरों की घंटियों और मस्जिदों की अजान के बीच जो आत्मीय रिश्ता है, वही इस शहर की असली पूंजी है। डॉ. अनीस बेग की यह मुलाकात उसी विरासत को आगे बढ़ाने वाली है।

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आस्था बदल सकती है, पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन प्रेम, सम्मान और इंसानियत का धर्म सबको एक सूत्र में बांधता है। उमरा कर चुके डॉ. अनीस बेग का शंकराचार्य के दरबार में पहुंचकर आशीर्वाद लेना केवल एक व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जिसकी कल्पना संतों, सूफियों और महापुरुषों ने की थी।

आज जब समाज को नफरत नहीं, बल्कि संवाद और सद्भाव की आवश्यकता है, तब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और डॉ. अनीस बेग की यह मुलाकात एक संदेश बनकर उभरती है—कि मोहब्बत की कोई जाति नहीं होती, इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता और आशीर्वाद पाने के लिए केवल एक सच्चे दिल की जरूरत होती है।

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