नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी में पूर्व भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप और उनकी बेटी कीर्ति कश्यप की एंट्री के दौरान बरेली के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह की अनदेखी चर्चा का विषय बन गई। 27 अक्टूबर को लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में आयोजित सदस्यता ग्रहण कार्यक्रम में पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने धर्मेंद्र कश्यप और कीर्ति कश्यप को पार्टी की सदस्यता दिलाई। इस मौके पर बरेली से सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक और विधानसभा चुनाव के कई दावेदार भी लखनऊ पहुंचे थे, लेकिन कार्यक्रम में सभी को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिल सकी।
सूत्रों के मुताबिक, फरीदपुर के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह को कार्यक्रम के दौरान मंच पर जगह नहीं मिली, जबकि पूर्व विधायक आरके शर्मा और आशीष यादव, अगम मौर्य मंचासीन रहे। बरेली से पहुंचे कुछ अन्य पूर्व विधायकों और पूर्व मंत्रियों को भी मंच पर स्थान नहीं मिल पाया। कई नेताओं को तो उस हॉल में प्रवेश तक नहीं मिल सका, जहां सदस्यता ग्रहण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था। ऐसे में धर्मेंद्र कश्यप और उनकी बेटी के पार्टी में शामिल होने के मौके पर बरेली के नेताओं के बीच प्राथमिकता और तवज्जो को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं।

विजयपाल सिंह की अनदेखी को लेकर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग चर्चाएं हैं। हालांकि, कार्यक्रम में किस नेता को मंच पर स्थान देना है और किसे नहीं, इसके पीछे पार्टी नेतृत्व की क्या वजह रही, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसके बावजूद एक ही जिले से पहुंचे नेताओं के साथ अलग-अलग व्यवहार ने राजनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए हैं।
कार्यक्रम के दौरान बरेली से पहुंचे विधानसभा टिकट के दावेदारों को लेकर भी चर्चा रही। सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव कुछ दावेदारों के बार-बार लखनऊ पहुंचने से नाराज नजर आए। बताया जाता है कि उन्होंने दावेदारों से स्पष्ट कहा कि बार-बार लखनऊ आने से टिकट नहीं मिलेगा। बरेली एयरपोर्ट पर पहले ही मुलाकात हो चुकी है, इसलिए अब क्षेत्र में जाकर काम करने की जरूरत है।

सूत्रों के अनुसार, टिकट की उम्मीद में लखनऊ पहुंचीं एक महिला दावेदार को भी अखिलेश यादव से मुलाकात का अवसर नहीं मिल पाया। इस घटनाक्रम से उन नेताओं और दावेदारों के बीच बेचैनी बढ़ने की चर्चा है, जो लगातार पार्टी नेतृत्व तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
धर्मेंद्र कश्यप और कीर्ति कश्यप के सपा में शामिल होने का कार्यक्रम जहां पार्टी के लिए बरेली की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत माना जा रहा है, वहीं विजयपाल सिंह समेत कई पुराने नेताओं को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिलने से संगठन के भीतर प्राथमिकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अब देखना होगा कि बरेली में पार्टी नेतृत्व पुराने नेताओं और नए राजनीतिक चेहरों के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।




