नीरज सिसौदिया
त्रिपुरा में भगवा ब्रिगेड की जीत ने जहां कांग्रेस हाईकमान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं वहीं पंजाब में लगातार पार्टी की शान बढ़ाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। गत दिवस त्रिपुरा मेघालय और नागालैंड के चुनावी नतीजों ने भाजपा को जश्न मनाने की एक और वजह दे दी है। त्रिपुरा में वह हुआ जो पिछले 25 सालों में नहीं हो सका था। अब महज गिने चुने राज्यों में ही कांग्रेस प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में है।
इनमें सबसे अच्छा प्रदर्शन कांग्रेस पंजाब में कर रही है। हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनाव में पंजाब में कांग्रेस ने अपना परचम लहराया है। यहां भाजपा मरणासन्न स्थिति में पहुंच गई है। वहीं, उसके सहयोगी दल अकाली दल की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। लेकिन असली परीक्षा तो वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में होगी। कैप्टन अमरिंदर सरकार के लिए लोकसभा चुनाव में सीटें जीतना आसान नहीं होगा। पूर्वोत्तर की जीत के बाद भाजपा और उत्साहित है। स्थानीय निकाय चुनाव की बात करें तो वह स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं लेकिन जब बात पूरे देश की हो तो फिर स्थानीय मुद्दे हवा हो जाते हैं। इसलिए पंजाब के स्थानीय निकाय चुनाव में मिली जीत पर कांग्रेस को इतराने की जरूरत नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में अभी लगभग 1 साल से भी अधिक का समय शेष है। कांग्रेस ने सूबे में सत्ता तो हथिया ली मगर जमीनी स्तर पर उसके वादों पर अमल नहीं हो सका है। भाजपा और अन्य विपक्षी दल पूरे जोर-शोर से कांग्रेस विरोधी प्रचार में लगे हुए हैं। वहीं कैप्टन और उनके मंत्रियों का आपसी तालमेल भी गड़बड़ाया हुआ है। पार्टी में बड़े स्तर पर गुटबाजी भी हावी हो रही है। सरकार का खजाना खाली है और जनता वादे पूरे होने का इंतजार कर रही है। स्थानीय मुद्दे हो या प्रदेश स्तरीय वादे कैप्टन सरकार फिलहाल हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। इतना ही नहीं विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र के काम कराने तक में नाकामयाब साबित हो रहे हैं। बात अगर स्थानीय मुद्दों की ही करें तो अब तक कांग्रेस नगर निगम अकाली दल और भाजपा गठबंधन के हाथों में होने का बहाना करती आ रही थी। लेकिन अब कांग्रेस की यह शिकायत भी दूर हो चुकी है। चुनावी भाषणों से पहले भूमिका तैयार करने में जुटे कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके मंत्रियों ने ताबड़तोड़ घोषणाएं तो कर दी लेकिन उन घोषणाओं पर अमल के लिए बजट कहां से आएगा इसकी कोई रूपरेखा कैप्टन सरकार तय नहीं कर पाई। नतीजा यह कि जालंधर नगर निगम जैसे विभिन्न संंस्थानों में सैलरी का संकट उपजने लगा है। इतना ही नहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भी अपनी ही पार्टी से मोह भंग होने लगा है। सत्ता में आने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उम्मीदों को पंख लगने की जो आस लगी थी वह अब कुंद पड़ती जा रही है।
यहां कांग्रेस की लड़ाई सिर्फ भाजपा और अकाली दल से ही नहीं है बल्कि आम आदमी पार्टी की मौजूदगी को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। वहीं पूर्वोत्तर की जीत के बाद मोदी फैक्टर एक बार फिर कारगर साबित हुआ है। अगर इस साल के अंत में कर्नाटक समेत तीन राज्यों में होने वाले चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होता है तो निश्चित तौर पर 2019 में पंजाब में मोदी का विजय रथ रोकना कैप्टन के लिए आसान नहीं होगा। अभी वक्त है, अगर कांग्रेस एकजुट हो जाए और जनता की 15 फ़ीसदी उम्मीदों को भी पूरा कर दे तो भी आगामी लोकसभा चुनाव में पंजाब का जनादेश कांग्रेस की झोली में आ सकता है। वहीं अगर वक्त रहते कांग्रेस ने खुद को नहीं संभाला तो त्रिपुरा जैसा हाल पंजाब में भी हो सकता है।

पूर्वोत्तर में भाजपा की जीत से पंजाब में बढ़ेंगी कैप्टन की चुनौतियां




