अधीर सक्सेना से नहीं संभल रही महानगर की भाजपा, गुटों में बंट गए पार्टी और कार्यकर्ता, एक नेता के हाथों की कठपुतली बने महानगर अध्यक्ष की छुट्टी तय, पढ़ें कर्मठ कार्यकर्ताओं का दर्द
नीरज सिसौदिया, बरेली
दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का बरेली महानगर में बुरा हश्र होता जा रहा है। महानगर भाजपा अध्यक्ष अधीर सक्सेना पार्टी कार्यकर्ताओं को जोड़ने और उन्हें उचित सम्मान दिलाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। कर्मठ कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के चलते वह निशाने पर आ चुके हैं। उन पर आरोप लग रहे हैं कि वो महज एक बड़े नेता के हाथों की कठपुतली मात्र बनकर रह गए हैं। एक कार्यकर्ता ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि अधीर सक्सेना इन दिनों एक प्रभावशाली नेता के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए हैं। उसी नेता के समर्थकों को महानगर अध्यक्ष तवज्जो देते हैं जो उनके आका के समर्थक होते हैं। आलम यह है कि पार्टी विधायकों के समर्थकों को भी अधीर सक्सेना पूरी तरह दरकिनार करने में लगे हैं। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि महानगर कमेटी में जूनियर लोगों को शामिल कर वरिष्ठ लोगों के ऊपर बिठा दिया गया है। जो नेता कभी मंडल अध्यक्ष के दिशा-निर्देशन में काम करते थे, अब वो अपने मंडल अध्यक्ष को ही दिशा-निर्देश देते हैं। इससे वरिष्ठ नेताओं में आक्रोश पनपता जा रहा है। आक्रोशित नेता संगठन के आगामी चुनाव का इंतजार कर रहे हैं।
अधीर सक्सेना पर आरोप यह भी लग रहे हैं कि वो गुटबाजी को खत्म करने की जगह उसे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। जाहिर तौर पर जब महानगर अध्यक्ष किसी एक नेता के हाथों की कठपुतली बन जाएगा तो पार्टी की एकजुटता को खुद ब खुद ग्रहण लग जाएगा। जैसा कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। अधीर सक्सेना पद के मद में शायद यह भूल गए हैं कि वह किसी एक नेता और उसके समर्थकों की हसरतों को पूरा करने के लिए ही इस पद पर नहीं बिठाए गए हैं बल्कि वह पूरे महानगर को एक सूत्र में पिरोने के लिए अध्यक्ष बनाए गए हैं। महानगर अध्यक्ष को किसी एक नेता का पिछलग्गू नहीं होना चाहिए बल्कि संगठन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने से लिए विरोधियों को भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधीर सक्सेना से पहले डॉ केएम अरोड़ा और पुष्पेंदु शर्मा जैसे महानगर अध्यक्ष भी हुए लेकिन वो किसी एक नेता के आगे नतमस्तक नहीं थे। उन्होंने संगठन को अपने रणनीतिक कौशल से एकजुट करने का पूरा प्रयास किया जिसका नतीजा भाजपा की एकजुटता के रूप में देखा गया। लेकिन वर्तमान हालात अंधकारमय भविष्य के संकेत दे रहे हैं। अधीर सक्सेना फिलहाल संगठन के कई कार्यकर्ताओं की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं। यही हाल रहा तो लोकसभा चुनाव में जो स्थिति भाजपा की उत्तर प्रदेश में हुई है उससे बुरा हश्र 2027 के विधानसभा चुनाव में होगा। इतिहास गवाह है कि महानगर पर भाजपा ने ही राज किया है लेकिन अधीर सक्सेना की अधीरता भाजपा के इस सुनहरे इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ सकती है।
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