नीरज सिसौदिया, बरेली
‘मस्जिदों पर जान दी, कुर्बां शिवालों पर हुए
कितने काले तजुरबे उजली किताबों पर हुए’
किसी शायर का ये शेर हिन्दुस्तान में बीते कई दशकों के दौरान हुए सांप्रदायिक भेदभाव और हिंसा के दर्द की अनकही दास्तान बयां करता है। आज भी साम्प्रदायिकता की ये आग कई प्रदेशों में दिलों की दूरियां बढ़ाने का काम कर रही है। लेकिन बरेली शहर की सबसे पुरानी एक दरगाह ऐसी भी है जो साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल बनी हुई है। इस दरगाह को लोग दरगाह शाहदाना वली के नाम से जानते हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग यहां आते हैं। वैसे तो इस दरगाह का प्रबंधन सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से मुतवल्ली अब्दुल वाजिद खां के नेतृत्व में गठित कमेटी की ओर से किया जाता है लेकिन दरगाह में समाजसेवा के जो भी कार्य होते हैं उनका आयोजन शाहदाना वली वेलफेयर सोसाइटी की ओर से किया जाता है। यह सोसाइटी नाम से भले ही आपको मुस्लिम समुदाय की लगती हो लेकिन मजहबी सियासत के इस दौर में साम्प्रदायिक सद्भाव की सबसे बड़ी मिसाल पेश कर रही है। पिछले आठ अक्टूबर को बरेली शहर के जाने-माने बाल रोग विशेषज्ञ और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉक्टर अनीस बेग को इस सोसाइटी का मुख्य संरक्षक बनाया गया है। आठ अक्टूबर को ही डॉक्टर अनीस बेग का जन्मदिन भी था। सबसे अहम बात यह है कि ये सोसाइटी मुस्लिम, हिन्दू और सिखों का एक अनूठा संगम है। मुस्लिम अनीस बेग इसके मुख्य संरक्षक हैं तो सिख समाजसेवी और धर्मगुरु ज्ञानी काले सिंह इसके संरक्षक हैं। ज्ञानी काले सिंह वो शख्सियत हैं जो पंजाबी महासभा सहित बरेली शहर के लगभग एक दर्जन से भी अधिक समाजसेवी संगठनों से जुड़े हुए हैं। बात यहीं पर खत्म नहीं होती। मॉडल टाउन हरि मंदिर कमेटी से जुड़े बरेली के जाने -माने समाजसेवी अश्विनी ओबेरॉय भी इस सोसाइटी के संरक्षक हैं। इसके अलावा अब्दुल वाजिद खां, हकीम निराले मियां, हजरत पाशा मियां निजामी भी इसके संरक्षक हैं।

इस दरगाह का अतीत लगभग पांच से सात सदी से भी अधिक पुराना है। हालांकि, इसका कोई सरकारी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। दरगाह के मुतवल्ली अब्दुल वाजिद खां और सोसाइटी के सचिव वसी अहमद वारसी बताते हैं कि शाहदाना वली सरकार बहुत पहुंचे हुए बुजुर्ग थे। उनकी प्रसिद्धि और मान्यता का आलम यह था कि खुद आला हजरत जब भी इस राह से गुजरते थे तो दरगाह के मेन गेट से कुछ दूर पहले ही अपने वाहन या जिस भी साधन से वो आते थे, उससे नीचे उतर जाते थे। वहीं अपने जूते-चप्पल उतारने के बाद फातिहा पढ़ते थे, दुआ करते थे। आला हजरत से जब अंदर न जाने की वजह पूछी गई तो उन्होंने बताया कि ये बहुत बड़े बुजुर्ग हैं और मैं इनके सामने नहीं जा सकता। यह साबित करता है कि ये इतने बड़े बुजुर्ग थे कि इनका सम्मान आला हजरत ने भी किया, उनके बाद हुजूर मुफ्ती आजम ए हिन्द (आला हजरत के पुत्र) और उनके बाद ताजुश्शरिया ने भी इनका सम्मान किया।

डॉ अनीस बेग ने बताया कि शाहदाना वली वेलफेयर सोसायटी की ओर से समाजसेवा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरे जन्मदिन पर इस अहम जिम्मेदारी को मुझे देने के लिए मैं दरगाह प्रबंधन कमेटी का शुक्रिया अदा करता हूं और दुआ करता हूं कि अल्लाह मुझे तौफीक दे कि मैं मुख्य संरक्षक की जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभा सकें।

डॉ. बेग और दरगाह के मीडिया प्रभारी वारसी ने बताया कि शाहदाना वली वेलफेयर सोसाइटी की ओर से गरीब बेटियों की शादी, हर साल 101 जरूरतमंदों की आंखों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन और 101 गरीब बच्चियों को कंप्यूटर का नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा समाजसेवा के कई अन्य काम भी किए जाते हैं।

उन्होंने बताया कि तीन साल से बेसहारा गरीब बच्चियों की शादी कराई जा रही है। पहली बार पांच बच्चियों की और दूसरे साल छह बच्चियों की शादी कराई गई थी। इस बार भी छह बच्चियों की शादी कराने जा रहे हैं। शादी समारोह का आयोजन रविवार 20 अक्टूबर को किया जा रहा है।

ज्ञानी काले सिंह ने कहा कि सोसाइटी के माध्यम से समाजसेवा के काम को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें हमारी ओर से पूरा सहयोग किया जाता है।

बता दें कि बरेली की सबसे पुरानी दरगाह यही है। यह लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। इस दरगाह में हिन्दू मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के लोग आते हैं। यहां धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है।

हर साल दरगाह पर सात रोजा सालाना उर्स का आयोजन किया जाता है जो उर्दू माह के हिसाब से पहली रब्बेसानी से लेकर सातवीं रब्बेसानी तक चलता है। इस साल यह उर्स चार अक्टूबर को शुरू हुआ था और विगत दस अक्टूबर को इसका समापन हुआ।


इसी उर्स के दौरान आठ अक्टूबर को डॉ. अनीस बेग को सोसायटी का मुख्य संरक्षक बनाया गया। वारसी ने बताया कि डॉक्टर अनीस बेग जिस तरह से समाजसेवा के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और हमेशा अग्रणी भूमिका निभाते आ रहे हैं, उनके इसी सेवा भाव को देखते हुए उन्हें सोसायटी के सबसे अहम पद का तोहफा उनके जन्मदिन के दिन दिया गया है।

उन्होंने बताया कि यहां उर्स में जो खाना दरगाह कमेटी की ओर से बनवाया जाता है वो हर धर्म के लोगों की आस्था को ध्यान में रखकर बनाया जाता है ताकि सभी धर्म के लोग एक साथ बैठकर बेझिझक इसे खा सकें।

बहरहाल, यह सोसाइटी सांप्रदायिक सद्भावना की एक अनूठी इबारत लिख रही है और डॉ. अनीस बेग जैसी शख्सियत के जुड़ने के बाद इसके सेवा कार्यों में और भी इजाफा होने की उम्मीद जताई जा रही है।






