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अखिलेश के ऐलान के बाद एक्टिव हुए सपा के दावेदार, अपनी कर रहे ब्रांडिंग, न वोट बनवा रहे, न पीडीए की मीटिंग बुला रहे, न बूथों पर फोकस, ऐसे तो नहीं जीतेंगे कैंट

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नीरज सिसौदिया, बरेली
लोकसभा चुनाव में बरेली सीट पर मिली हार के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बरेली जिले के पदाधिकारियों की एक समीक्षा बैठक बुलाई थी। इस समीक्षा बैठक में सपा सुप्रीमो ने यह ऐलान कर दिया था कि बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी अपना ही उम्मीदवार उतारेगी। इंडिया गठबंधन अगर प्रदेश में मिलकर चुनाव लड़ता है तो भी सपा कैंट सीट अपने ही पास रखेगी। अखिलेश यादव के इस ऐलान के बाद इस सीट से न सिर्फ समाजवादी पार्टी बल्कि भाजपा के भी कुछ दिग्गज नेता (जो सपा में सियासी भविष्य तलाश रहे हैं) अपनी-अपनी दावेदारी को मजबूती देने में जुट गए हैं। ये नेता जोर-शोर से अपनी-अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं लेकिन इनकी ब्रांडिंग पार्टी के काम आती नजर नहीं आ रही है।
दरअसल, अखिलेश यादव ने जो मंत्र समीक्षा बैठक में दिया था उस मंत्र पर ये दावेदार काम नहीं कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने जो पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा दिया था उस पर एक-दो दावेदारों को छोड़कर कोई भी अमल नहीं कर रहा। बाकी के दावेदार सिर्फ हवा-हवाई प्रचार में जुटे हुए हैं। ये लोग न तो पीडीए की बैठक कर रहे हैं और न ही नए वोट बनवाने का काम कर रहे हैं।
पिछले विधानसभा चुनावों और हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो कैंट विधानसभा सीट पर हार-जीत का अंतर विधानसभा में लगभग दस हजार और लोकसभा में लगभग तीन हजार वोटों का रहा था। कैंट विधानसभा सीट पर पिछले चुनावों के मुकाबले सपा का यह प्रदर्शन काफी बेहतर कहा जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐन वक्त पर कांग्रेस से सपा में आकर चुनाव लड़ने वाले प्रवीन सिंह ऐरन और उनकी पत्नी सुप्रिया ऐरन यूं ही कैंट सीट पर महज तीन हजार और दस हजार वोटों के अंतर से नहीं हारे बल्कि इसके पीछे पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी जताने वाले दावेदारों की मेहनत भी थी। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट के दावेदारों ने हजारों की संख्या में नए वोट बनवाए थे, हर गली-मोहल्ले में जाकर पार्टी के पक्ष में प्रचार किया था, जिसका लाभ उन दावेदारों को तो नहीं मिला लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से इंपोर्टेड सपा उम्मीदवारों को जरूर मिला। लेकिन इस बार दावेदारों ने अभी तक जो प्रचार किया है उसका लाभ सिर्फ दावेदारों को ही मिला है। पार्टी को इसका कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। हालांकि, डॉ. अनीस बेग ने दलितों को जोड़ने के लिए दलितों के मसीहा कहे जाने वाले स्व. कांशीराम की पुण्यतिथि पर एक विशेष आयोजन कर एक शुरुआत करने की कोशिश जरूर की है जिसमें समाजवादी पार्टी अंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मिठाईलाल भारती मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे। शेष किसी भी दावेदार ने ऐसा नहीं किया।
बहरहाल, पार्टी उम्मीदवारों की सेल्फ ब्रांडिंग पार्टी के लिए कोई उम्मीद जगाती नजर नहीं आ रही है।
वहीं, बात अगर अखिलेश यादव की ओर से समीक्षा बैठक के दौरान की गई घोषणा की करें तो इसमें भी बरेली के समाजवादी नेता बंटे हुए नजर आ रहे हैं। एक घोषणा को वो सही मानते हैं तो दूसरी घोषणा पर यकीन ही नहीं करते। अब जरा जान लेते हैं कि वो दोनों घोषणाएं क्या हैं। पहली घोषणा जिसे हर विधायक सही मान रहा है वह यह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी बरेली के किसी भी सिटिंग विधायक का टिकट नहीं काटेगी। मौजूदा विधायकों को ही दोबारा मैदान में उतारा जाएगा। अखिलेश की इस घोषणा का प्रचार पूरे जोर-शोर से किया जा रहा है। वहीं, इसके विपरीत अखिलेश यादव ने कैंट विधानसभा सीट से भी एक मुस्लिम नेता को टिकट देने की घोषणा कर दी थी लेकिन अखिलेश यादव की इस घोषणा पर किसी को भी यकीन नहीं हो रहा। हर कोई यही कह रहा है कि इन नेताजी को अखिलेश यादव ने पिछली बार भी यही कहा था लेकिन बाद में टिकट किसी और को दे दिया था। इस बार भी अखिलेश ने नेता जी को बस यूं ही तसल्ली दी है ताकि चुनाव तक नेताजी का भरपूर इस्तेमाल पार्टी के कामों में किया जा सके और ऐन वक्त पर बाजी कोई और ही मार ले जाएगा। राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि अखिलेश यादव के समक्ष जो भी नेता टिकट के लिए अपनी दावेदारी जताता है, अखिलेश यादव उसे क्षेत्र में जाकर तैयारी करने के लिए बोल देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब अखिलेश यादव की एक घोषणा पर पूरा भरोसा जताया जा रहा है तो फिर दूसरी घोषणा पर क्यों नहीं? बहरहाल, अखिलेश के वादों में कितनी सच्चाई है, इसका फैसला तो आने वाला वक्त ही करेगा।

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