नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में से एक मीरगंज विधानसभा सीट हमेशा से ही सुर्खियां बटोरती रही है। इस सीट पर ब्राह्मण, ठाकुर, मुस्लिम और पंजाबियों के बाद अब पिछड़ों का दौर आया है। कभी सवर्णों के दबदबे वाली इस सीट पर आज पिछड़ों की सियासत दबदबा बना चुकी है। आलम यह है कि मजबूत मुस्लिम नेता यहां से लड़ना नहीं चाहते और सवर्णों को बड़े दल लड़ाना नहीं चाहते। मौजूदा समय में इस सीट पर लोधी और कुर्मी समाज हावी हो चुका है। खासतौर से जब से डीसी वर्मा ने जब से इस सीट पर कदम रखा उसी वक्त से यहां बदलाव की शुरुआत होने लगी। अपने नेता के पक्ष में लोधी समाज एकजुट हुआ तो उसे अपनी ताकत का अहसास हुआ।
वर्ष 2012 में सबसे पहले भाजपा ने इस सीट से लोधी समाज के डीसी वर्मा को मैदान में उतारने की हिम्मत जुटाई। मीरगंज (पूर्व में कावर विधानसभा सीट) के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका था जब कोई लोधी भाजपा जैसी पार्टी से मैदान में उतारा गया था। वो भी लगातार दो चुनाव जीतकर आ रहे विधायक सुल्तान बेग के मुकाबले। लोधी समाज इस चुनाव में उतना एकजुट नहीं हो पाया और डीसी वर्मा चुनाव हार गए। इस चुनाव में सुल्तान बेग ने 31% वोट हासिल किए तो डीसी वर्मा को लगभग 26% वोट मिले। अगले चुनाव में समीकरण पूरी तरह बदल गए। वर्ष 2017 में डीसी वर्मा ने लगभग दोगुने यानि 52% वोट हासिल किए। बस यही से मीरगंज में लोधी समाज का उदय हुआ और एक लोधी ने मीरगंज की सियासत की पूरी दिशा ही बदलकर रख दी। अब इस सीट से पिछड़ों के कई नेता सामने आने लगे हैं। समाजवादी पार्टी की बात करें तो लोधी साधना सिंह राजपूत, लोधी महेंद्र सिंह राजपूत तेजी से आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। वहीं, अन्य जाति के पिछड़े नेताओं में सुरेश गंगवार, मनोहर पटेल जैसे नेता सामने आने लगे हैं। मुस्लिम नेता सुल्तान बेग अब मीरगंज की जगह भोजीपुरा से लड़ना चाहते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि मुस्लिम नेता के लिए मीरगंज सीट अब सुरक्षित नहीं रही।
लोधी साधना सिंह राजपूत ने पिछले विधानसभा चुनाव में भी सपा के टिकट के लिए पूरी दमदारी से दावेदारी की थी लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस बार जब बात पीडीए की हो रही है तो साधना सिंह राजपूत एक बार फिर से मजबूती के साथ दावेदारी की तैयारी में जुट गई हैं। लोधी राजनीति इस समय मीरगंज में उफान पर है और जीत भी वही हासिल कर सकता है जो लोधी वोट हासिल कर सके। ऐसा तभी संभव है जब चुनावी मैदान में दो लोधी एक साथ उतरें। या फिर कुर्मी वोट एकतरफा किसी पार्टी के हिस्से में आए तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। बहरहाल, भाजपा में डीसी वर्मा और सपा में साधना सिंह राजपूत को छोड़कर कोई भी मजबूत लोधी नेता यहां नजर नहीं आता।
इतिहास गवाह है कि यहां पहले कांग्रेस के ब्राह्मण नेता धर्मदत्त शर्मा वैद्य, क्षत्रिय कुंवर महेंद्र प्रताप सिंह और कुंवर सुरेंद्र प्रताप सिंह, मुस्लिम नेता मिसिरयार खां, शराफतयार खां और सुल्तान बेग और पंजाबी जयवीर बरार ही काबिज रहे हैं। लेकिन अब यहां लोधियों का वर्चस्व कायम होता जा रहा है और सवर्ण हिन्दुओं से लगभग सभी प्रमुख दलों ने किनारा कर लिया है। बहरहाल, संभव है कि आगामी विधानसभा के चुनावी रण में सपा और भाजपा दोनों ही दल लोधी उम्मीदवार उतार दें।

मीरगंज विधानसभा सीट : कांग्रेस का राज खत्म हुआ तो मुस्लिम काबिज रहे, लोधी की एंट्री ने बदल दिए सारे समीकरण, अब पिछड़ों की हो चुकी है विधानसभा सीट, पढ़ें क्या कहते हैं राजनीतिक समीकरण?




