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सिर्फ कपड़े नहीं, सम्मान भी बांट रहे, ठंड को हराने साथियों के साथ निकले अतुल कपूर, न माइक और न कोई मंच, 200 लोगों का सहारा बनी अरुणा फाउंडेशन, जानिये कैसे?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में जब कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है, तब लंबी रातें और सर्द हवाएं सबसे ज्यादा उन लोगों को चुभती हैं जिनके पास सिर ढकने या सर्दी से बचने के साधन नहीं होते, तब कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जो इस ठंड को केवल मौसम नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम है- अतुल कपूर, पूर्व उपसभापति, नगर निगम बरेली और अरुणा फाउंडेशन के अध्यक्ष।
हर साल की तरह इस वर्ष भी अरुणा फाउंडेशन ने ठंड के मौसम में जरूरतमंदों के बीच पहुंचकर सेवा का वह काम किया, जो अक्सर फाइलों, भाषणों और औपचारिकताओं से परे होता है। जैकेट, स्वेटर, मोजे और गर्म टोपियों के साथ जब फाउंडेशन की टीम शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंची, तो यह सिर्फ वस्त्र वितरण नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए भरोसे और अपनापन का संदेश था, जो सर्द रातों में खुद को अक्सर अकेला महसूस करते हैं।
अतुल कपूर कहते हैं कि सेवा उनके लिए कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन का स्वभाव है। उनके शब्दों में, “अरुणा फाउंडेशन हर साल की तरह इस बार भी ठंड के मौसम में जरूरतमंद लोगों के बीच पहुंचा है। हमने बरेली के विभिन्न इलाकों में लगभग 200 जरूरतमंद लोगों को गर्म वस्त्र वितरित किए। हमारा प्रयास रहता है कि कोई भी व्यक्ति केवल साधनों की कमी के कारण ठंड में ठिठुरता न रहे।”
उनकी बातों में कोई दिखावा नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदना की सादगी झलकती है। नगर निगम में लंबे समय तक सक्रिय भूमिका निभाने के बाद भी अतुल कपूर की पहचान केवल एक पूर्व पदाधिकारी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने सामाजिक जीवन में यह साबित किया है कि असली राजनीति और असली नेतृत्व वही है, जो आम आदमी के दुख-सुख में साथ खड़ा हो।


अरुणा फाउंडेशन की उपाध्यक्ष वंदिता शर्मा बताती हैं कि यह कार्यक्रम किसी अचानक लिए गए फैसले का नतीजा नहीं था। उन्होंने कहा, “जैसे ही ठंड बढ़नी शुरू हुई, संस्था के सभी सदस्यों ने आपस में चर्चा की और तय किया कि इस बार खास तौर पर जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों पर ध्यान दिया जाएगा। महिलाओं के लिए स्वेटर, बच्चों के लिए जैकेट, टोपी और मोजे जुटाए गए, ताकि ठंड से उन्हें कुछ राहत मिल सके।”
जब ऊनी वस्त्र बच्चों और महिलाओं को दिए गए, तो उनके चेहरों पर जो मुस्कान थी, वही इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी सफलता थी। कई बच्चों ने वहीं अपनी जैकेट पहनकर देखा, किसी ने टोपी सिर पर रखी और किसी ने मोजे हाथ में पकड़कर अपने माता-पिता को दिखाए। यह दृश्य सिर्फ सहायता का नहीं, बल्कि सम्मान और मानवीय गरिमा का भी था।
फाउंडेशन के सदस्यों ने बच्चों के माता-पिता से भी बातचीत की। कई माता-पिता भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हर साल अरुणा फाउंडेशन की टीम ठंड में उनके पास पहुंचती है और उन्हें यह एहसास दिलाती है कि वे इस शहर में अकेले नहीं हैं।


इस पूरे कार्यक्रम में जिस बात ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था न कोई मंच, न कोई माइक, न कोई बड़ी घोषणा, बस जरूरतमंदों के बीच खड़े होकर उनसे बात करना, बच्चों के सिर पर हाथ फेरना, सिर्फ सहायता करना और बुजुर्गों से हालचाल पूछना। यही वह जज्बा है, जो उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता से आगे एक संवेदनशील इंसान बनाता है।
कार्यक्रम में अरुणा फाउंडेशन के कई सहयोगी साथी भी सक्रिय रूप से शामिल रहे। शैफाली खंडेलवाल, मीतू अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, पार्षद सोनिया अतुल कपूर, लक्की सरपाल, मन्नू विग, काके भाई, धर्मपाल अरोड़ा, अंशिका गर्ग, वंदिता शर्मा, रीना गर्ग, प्रवेश उपाध्याय, मीनू उपाध्याय, अंश कपूर सहित अन्य सदस्यों ने न केवल वस्त्र वितरण में सहयोग किया, बल्कि जरूरतमंदों तक पहुंचने में भी पूरी तत्परता दिखाई।


इन सभी के लिए यह कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक साझा जिम्मेदारी थी। हर कोई अपने स्तर पर यह महसूस कर रहा था कि समाज का सबसे कमजोर वर्ग अगर सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी पाए, तभी किसी शहर की असली तरक्की मानी जा सकती है।


अतुल कपूर के लिए अरुणा फाउंडेशन सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार है- ऐसा विचार जिसमें सेवा, करुणा और निरंतरता शामिल है। वे मानते हैं कि मदद वही सार्थक होती है, जो समय पर और सही व्यक्ति तक पहुंचे। ठंड के मौसम में गरम कपड़े देना शायद किसी के लिए छोटा काम हो, लेकिन जिसके पास कुछ भी न हो, उसके लिए यह किसी वरदान से कम नहीं होता।

अतुल कपूर और अरुणा फाउंडेशन का यह प्रयास उसी मानवीय गर्माहट की मिसाल है, जो समाज को जोड़ती है और यह याद दिलाती है कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

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