नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट की सियासत में धोबी समाज की मौजूदगी एक लंबे अरसे से लगभग गायब रही है। इस समाज से अब तक संभवत: केवल दिवंगत नंदराम दिवाकर ही ऐसे नेता रहे हैं, जो इस सीट से विधायक बन सके। उनके बाद दशकों तक न तो भारतीय जनता पार्टी और न ही समाजवादी पार्टी ने धोबी समाज के किसी नेता को विधानसभा तक पहुंचाने की गंभीर कोशिश की। लेकिन अब एक बार फिर फरीदपुर की राजनीति में हलचल है। सर्वजन आम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर धोबी समाज की आवाज बनकर उभरे हैं और इससे समाज में एक नई उम्मीद जगी है।
फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र की सियासत को समझने के लिए इसके इतिहास में जाना जरूरी है। इस सीट पर पहला चुनाव वर्ष 1956 में हुआ था। धोबी समाज के नंदराम दिवाकर ने इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। वे कुल तीन बार विधायक बने और अलग-अलग राजनीतिक दौर के साक्षी रहे। नंदराम पहली बार जून 1980 में आठवीं विधानसभा के लिए चुने गए थे। उस समय वे भाजपा के टिकट पर जीते थे। इसके बाद कांग्रेस के नत्थू लाल ने 1985 और 1989 में लगातार दो बार जीत दर्ज की।
राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और वर्ष 1991 में एक बार फिर नंदराम दिवाकर भाजपा के टिकट पर विधायक बने। हालांकि इस बार उनका कार्यकाल केवल 533 दिन का रहा। इसके बाद 1993 में समाजवादी पार्टी के सियाराम सागर विधायक बने। लेकिन फरीदपुर की राजनीति का सबसे रोचक मोड़ 1996 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला।
दरअसल, 1993 में सपा से विधायक बने सियाराम सागर ने 1996 के चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ दी और भाजपा से टिकट ले लिया। इससे समाजवादी पार्टी असमंजस में पड़ गई, क्योंकि उसके पास फरीदपुर से चुनाव लड़ाने के लिए कोई प्रत्याशी नहीं बचा था। उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बरेली के तत्कालीन जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव के बीच लंबी चर्चा हुई। काफी विचार-विमर्श के बाद फैसला हुआ कि भाजपा से टिकट मांग रहे नंदराम दिवाकर को सपा का उम्मीदवार बनाया जाए।
उस दौर में संचार के साधन सीमित थे। नंदराम दिवाकर को इसकी जानकारी तत्काल नहीं मिल सकी। बताया जाता है कि भाजपा से टिकट कटने के बाद वे मायूस होकर घर में सो रहे थे। उसी रात वीरपाल सिंह यादव उनके घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। उन्होंने नंदराम को बताया कि नेताजी ने उन्हें सपा का चुनाव चिन्ह भेज दिया है और वे सपा के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। पहले तो नंदराम भाजपा छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन रात में ही कार्यकर्ताओं की भीड़ जुट गई। अंततः उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया।

1996 का चुनाव फरीदपुर की राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया। सियाराम सागर भाजपा से मैदान में थे और नंदराम दिवाकर सपा से। नतीजा चौंकाने वाला रहा। नंदराम ने सियाराम सागर को बड़े अंतर से हराकर जीत दर्ज की। यह जीत धोबी समाज के लिए गर्व का क्षण थी। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं सकी।
**2002 के विधानसभा चुनाव** में सियासी समीकरण फिर पलट गए। सियाराम सागर दोबारा समाजवादी पार्टी में लौट आए, जबकि नंदराम दिवाकर भाजपा में चले गए। इस बार चुनाव सियाराम सागर जीत गए और विधायक बने। इस राजनीतिक उठापटक ने मतदाताओं को भी हैरान कर दिया। इसके बाद फरीदपुर की सियासत में धोबी समाज का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया।
नंदराम दिवाकर के बाद भाजपा ने भी धोबी समाज के किसी नेता को आगे नहीं बढ़ाया और न ही समाजवादी पार्टी ने इस समाज को प्रतिनिधित्व देने को प्राथमिकता दी। फरीदपुर की राजनीति अन्य जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही। धोबी समाज, जो संख्या के लिहाज से कमजोर नहीं है, खुद को राजनीतिक हाशिये पर महसूस करता रहा।
अब एक बार फिर परिस्थितियां बदलती दिख रही हैं। **सर्वजन आम पार्टी** के राष्ट्रीय अध्यक्ष **जयप्रकाश भास्कर** फरीदपुर में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वे खुद दलित समाज से आते हैं और धोबी समाज के मुद्दों को खुलकर उठा रहे हैं। यही वजह है कि उन्हें धोबी समाज का एक संभावित चेहरा माना जा रहा है, जो विधानसभा तक पहुंच सकता है।
जयप्रकाश भास्कर की सबसे बड़ी ताकत उनका **सामाजिक दायरा** माना जा रहा है। उन्हें फरीदपुर के मुस्लिम समाज का भी समर्थन मिल रहा है। पिछड़े वर्ग में भी उनकी स्वीकार्यता बताई जाती है। यादव समाज में उनकी अच्छी पैठ होने की चर्चा है, जो इस क्षेत्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। दलित समाज से आने के कारण उनका अपना सामाजिक आधार भी मजबूत है।
फरीदपुर की राजनीति जातीय समीकरणों पर काफी हद तक निर्भर रही है। यहां जीत उसी की होती है, जो अलग-अलग समाजों को साथ लेकर चल सके। जयप्रकाश भास्कर इसी रणनीति पर काम करते नजर आ रहे हैं। वे केवल धोबी समाज तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि खुद को एक व्यापक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं।
हालांकि उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। फरीदपुर में भाजपा और सपा जैसी बड़ी पार्टियों का मजबूत संगठन है। संसाधनों और चुनावी अनुभव के मामले में सर्वजन आम पार्टी अभी नई मानी जाती है। ऐसे में भास्कर के लिए यह राह आसान नहीं होगी। लेकिन राजनीति में इतिहास गवाह है कि जब सामाजिक असंतोष और नई उम्मीदें एक साथ उभरती हैं, तो बड़े उलटफेर भी हो जाते हैं।
अब सवाल यही है कि क्या फरीदपुर की जनता जयप्रकाश भास्कर को वही सम्मान देगी, जो कभी स्वर्गीय नंदराम दिवाकर को मिला था? क्या धोबी समाज को सत्ता तक पहुंचने का यह मौका सफल होगा, या उसे अभी और इंतजार करना पड़ेगा? इसका जवाब आने वाला चुनाव ही देगा। लेकिन इतना तय है कि फरीदपुर की सियासत में धोबी समाज की चर्चा एक बार फिर केंद्र में आ गई है, और यही अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।





