यूपी

जब चेहरों से ज़्यादा नेतृत्व जरूरी हो, तब बरेली में याद आते हैं वीरपाल यादव, गुटों में उलझी समाजवादी पार्टी और एक सवाल, क्या वापसी कर पाएंगे वीरपाल? पढ़ें बरेली में सात सीटों पर जीत का रिकॉर्ड बनाने वाली सपा के पतन की कहानी

Share now

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति में अगर समाजवादी पार्टी के उतार-चढ़ाव को किसी एक नाम से समझना हो, तो वह नाम है वीरपाल सिंह यादव। यह कोई भावनाओं में कही गई बात नहीं है, बल्कि चुनावी नतीजों से साबित हुई सच्चाई है। करीब ढाई दशक तक बरेली के जिला अध्यक्ष रहे वीरपाल सिंह यादव के दौर में समाजवादी पार्टी न सिर्फ संगठित थी, बल्कि हर चुनाव में मजबूत दावेदार के रूप में खड़ी रहती थी।
उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने बरेली में जो राजनीतिक जमीन बनाई, वह जमीन उनके हटते ही धीरे-धीरे खिसकने लगी। पार्टी गुटों में बंटती चली गई। एक गुट अता उर रहमान का बना, दूसरा भगवत सरन गंगवार का और तीसरा इस्लाम साबिर का। शुरुआत में यह लड़ाई बड़े नेताओं के वर्चस्व तक सीमित थी, लेकिन जब इनके समर्थकों के अलग-अलग गुट बनने लगे तो पार्टी की हालत बिगड़ती चली गई। हालात ऐसे हो गए कि समाजवादी पार्टी बरेली में कमजोर होती गई और एक समय तो राजनीतिक अस्तित्व बचाने की स्थिति में पहुंच गई।
वीरपाल सिंह यादव के दौर में समाजवादी पार्टी सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं थी, बल्कि एक भरोसे का नाम थी। कार्यकर्ताओं को भरोसा रहता था कि संगठन उनके साथ है। उम्मीदवारों को यकीन होता था कि पार्टी मुश्किल वक्त में उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगी। वहीं आम मतदाता मानता था कि अगर सपा सत्ता में आएगी तो उसकी आवाज सुनी जाएगी। यही वजह थी कि वीरपाल सिंह यादव के कार्यकाल में कोई भी ऐसा विधानसभा चुनाव नहीं हुआ, जिसमें समाजवादी पार्टी तीन सीटों से कम पर सिमटी हो।
इस पूरे दौर की सबसे बड़ी मिसाल 1993 का विधानसभा चुनाव है। उस चुनाव में वीरपाल सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में से सात सीटों पर जीत दर्ज कर इतिहास बना दिया। उस समय कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों के बीच कड़ा मुकाबला होता था, इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने लगभग पूरे जिले में अपना परचम लहराया।
वीरपाल सिंह यादव खुद बताते हैं कि 1993 का चुनाव और भी ऐतिहासिक हो सकता था। उनके मुताबिक अगर बरेली शहर सीट पर पार्टी के ही उम्मीदवार ने धोखा न दिया होता, तो समाजवादी पार्टी आठ सीटें जीत सकती थी। उनका कहना है कि बरेली शहर से सपा उम्मीदवार उमेश चंद्र सक्सेना ने कांग्रेस उम्मीदवार बब्बू से अंदरखाने में समझौता कर लिया था। मतदान से कुछ दिन पहले ही वह अचानक गायब हो गए। नामांकन हो चुका था, इसलिए नया उम्मीदवार उतारना संभव नहीं था। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी बहुत कम वोटों से चुनाव हारी और कांग्रेस उम्मीदवार तीसरे नंबर पर पहुंच गया। वीरपाल सिंह यादव मानते हैं कि अगर यह धोखा न हुआ होता तो 1993 में बरेली की राजनीति की तस्वीर कुछ और होती।
उस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जिन सात सीटों पर जीत दर्ज की थी, वे आज भी मिसाल मानी जाती हैं। फरीदपुर से सियाराम सागर, बरेली कैंट से प्रवीण सिंह ऐरन, भोजीपुरा से हरीश कुमार गंगवार, कांवर (अब मीरगंज) से शराफत यार खान, बहेड़ी से मंजूर अहमद और सनहा से कुंवर सर्वराज सिंह जीते थे। नवाबगंज सीट से भाजपा के भगवत सरन गंगवार विजयी हुए थे, जो बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और मंत्री भी बने। बरेली शहर सीट से राजेश अग्रवाल ने जीत दर्ज की थी।
वीरपाल सिंह यादव बताते हैं कि उनके पूरे कार्यकाल में पार्टी का प्रदर्शन कभी कमजोर नहीं पड़ा। कभी छह तो कभी सात सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी हमेशा बरेली की राजनीति में निर्णायक भूमिका में रही। यहां तक कि 1996 का चुनाव, जिसे उनके दौर का सबसे कमजोर चुनाव माना जाता है, उसमें भी पार्टी ने तीन सीटें जीतीं। यह साफ दिखाता है कि वीरपाल सिंह यादव के रहते समाजवादी पार्टी कभी पूरी तरह बिखरी नहीं।
हालांकि उनके दौर में भी गुटबाजी की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन उनके सख्त रवैये और मजबूत नेतृत्व के कारण गुटबाजी पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचा पाती थी। बाद में जब अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच दरार बढ़ी, तो वीरपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी से दूरी बना ली। इसके बाद गुटबाजी खुलकर सामने आ गई।
अता उर रहमान मुस्लिम राजनीति के बड़े चेहरे बन गए, तो दूसरी ओर इस्लाम साबिर और उनके बेटे शहजिल इस्लाम का अलग खेमा खड़ा हो गया। जो गुट पहले पर्दे के पीछे सक्रिय थे, वे खुलकर सामने आ गए। वीरपाल सिंह यादव के समय तक महानगर अध्यक्ष भी उनकी सहमति से तय होते थे, इसलिए जिला और महानगर के बीच टकराव की गुंजाइश नहीं रहती थी। लेकिन समय के साथ हालात बदले। नए-नए जिला अध्यक्ष बने और महानगर इकाई ने खुद को अलग ताकत के रूप में स्थापित कर लिया।
शमीम खां सुल्तानी के महानगर अध्यक्ष बनने के बाद यह टकराव खुलकर सामने आ गया। एक समय ऐसा आया जब जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप और महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी की लड़ाई सड़क तक पहुंच गई और शमीम खां सुल्तानी शिवचरण कश्यप पर भारी पड़ गए। नतीजतन शिवचरण कश्यप की जिला अध्यक्ष पद से ही छुट्टी हो गई। यह वही स्थिति थी, जिसकी वीरपाल सिंह यादव के दौर में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
आज एक बार फिर समाजवादी पार्टी बरेली में नए जिला अध्यक्ष की तलाश में है। पार्टी के भीतर यह माना जा रहा है कि अगर आज भी बिखरी हुई समाजवादी पार्टी और बिखरे हुए नेताओं पर कोई लगाम लगा सकता है, तो वह वीरपाल सिंह यादव ही हैं। इसका संकेत तब भी मिला, जब अखिलेश यादव ने उन्हें बरेली जिले का एसआईआर प्रभारी बनाया था। उस दौरान कई बागी तेवर अपने-आप ठंडे पड़ते नजर आए।
फिलहाल वीरपाल सिंह यादव जिला अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन पार्टी ने उनकी राजनीतिक क्षमता को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया है। साथ ही लखीमपुर और पीलीभीत में दूसरे चरण का एसआईआर प्रभारी भी नियुक्त किया गया है। यह जिम्मेदारी सीधे तौर पर आने वाले चुनावों की तैयारी से जुड़ी हुई है।
वीरपाल सिंह यादव मानते हैं कि एसआईआर का यह दौर बेहद अहम है। उनका कहना है कि अगर निष्पक्षता बनी रही और वोटों की कोई हेराफेरी नहीं हुई, तो समाजवादी पार्टी बरेली जिले की सभी विधानसभा सीटें जीत सकती है। उनका यह भरोसा सिर्फ आत्मविश्वास नहीं, बल्कि लंबे राजनीतिक अनुभव का नतीजा लगता है।
बरेली की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग भी मानते हैं कि समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत दौर वही था, जब संगठन की कमान वीरपाल सिंह यादव के हाथ में थी। उनके बाद चेहरे बदले, पद बदले, लेकिन पार्टी का जनाधार लगातार कमजोर होता चला गया। अगर पार्टी एक बार फिर उन्हें निर्णायक भूमिका देती है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि समाजवादी पार्टी बरेली में दोबारा मजबूती के साथ खड़ी हो सकती है।
कुल मिलाकर बरेली की सियासत यही सिखाती है कि जब नेतृत्व मजबूत होता है, तो पार्टी मजबूत रहती है। और जब नेतृत्व कमजोर पड़ता है, तो बड़ी से बड़ी पार्टी भी जमीन खो देती है। वीरपाल सिंह यादव का राजनीतिक सफर इसी सच्चाई की सबसे बड़ी मिसाल बन चुका है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *