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मीरगंज विधानसभा सीट : सुल्तान ने छोड़ा मैदान, डटे हैं शराफतयार खान, मीरगंज में सपा का सबसे बड़ा चेहरा हैं पूर्व विधायक शराफतयार, बरेली से रामपुर तक है दबदबा, अबकी बार बन सकते हैं  उम्मीदवार, जानिये क्यों?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की मीरगंज विधानसभा सीट इस समय समाजवादी पार्टी के लिए खास महत्व की सीट बन गई है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस सीट पर पार्टी के अंदर दावेदारों को लेकर हलचल तेज है। राजनीतिक गलियारों में इस बार पूर्व विधायक शराफतयार खां का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। फिलहाल, राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर मीरगंज में सपा का सबसे बड़ा चेहरा शराफतयार खान ही हैं। वहीं, लंबे समय से इस सीट पर चुनाव लड़ते आ रहे पूर्व विधायक सुल्तान बेग ने मीरगंज से कदम पीछे खींच लिया है और अब वह भोजीपुरा विधानसभा सीट से सपा का टिकट चाहते हैं। इन बदलते समीकरणों को समझना जरूरी है, क्योंकि इससे मीरगंज ही नहीं, बल्कि भोजीपुरा सीट की राजनीति पर भी असर पड़ेगा।
मीरगंज विधानसभा सीट पर पिछले कुछ चुनावों में मुकाबला कड़ा रहा है। यहां जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा चुनावी नतीजों को प्रभावित करते रहे हैं। मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाताओं की संख्या यहां अच्छी खासी है, जबकि ग्रामीण और कस्बाई वोटरों का भी बड़ा रोल रहता है। सपा ने इस सीट पर पहले जीत भी दर्ज की है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। खास तौर पर सुल्तान बेग लगातार दो बार चुनाव लड़ने के बावजूद हार का सामना कर चुके हैं। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह संदेश गया कि अब मीरगंज सीट पर नए चेहरे और नई रणनीति की जरूरत है।
पूर्व विधायक शराफतयार खां का नाम इस बार सबसे आगे इसलिए आ रहा है क्योंकि वह पहले इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। शराफतयार खान वर्ष 1993 इस सीट से विधायक चुने गए थे। उस वक्त यह कांवर विधानसभा सीट के नाम से जानी जाती थी।वहीं, उनके पिता मरहूम मिसिरयार खान सांसद भी रह चुके हैं। शराफतयार खां अपने नाम के अनुरूप अपनी शराफत के लिए जाने जाते हैं। यही वजह है कि समाज का हर वर्ग चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम उनके साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। शराफतयार खां का दबदबा बरेली से लेकर रामपुर तक देखने को मिलता है। दोनों जिलों में उनकी एक अलहदा पहचान बनी हुई है। स्थानीय स्तर पर उनका नेटवर्क काफी मजबूत माना जाता है। शराफतयार खां ने पिछले विधानसभा चुनाव में भी मीरगंज सीट से सपा के टिकट के लिए दावेदारी जताई थी लेकिन आजम खां ने सुल्तान बेग के परिवार का एहसान चुकाने के लिए सुल्तान बेग की पैरवी की और सपा ने सुल्तान बेग को उम्मीदवार बना दिया था लेकिन इस बार सुल्तान बेग मैदान छोड़ चुके हैं।
शराफतयार खां को लेकर यह माना जा रहा है कि वह पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ सकते हैं। साथ ही, युवाओं और नए मतदाताओं को भी साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनके समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि मीरगंज में सपा को जीत के लिए ऐसे चेहरे की जरूरत है जो न सिर्फ लोकप्रिय हो, बल्कि संगठन को भी साथ लेकर चले।
सुल्तान बेग का मीरगंज सीट से हटना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संकेत है। लगातार दो चुनावों में मिली हार के बाद यह साफ हो गया है कि पार्टी के लिए इस सीट पर उनका नाम अब उतना असरदार नहीं रहा।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बार-बार हारने से किसी भी नेता की छवि कमजोर होती है, चाहे उसका व्यक्तिगत जनाधार हो या न हो। सपा नेतृत्व भी शायद यह समझ चुका है कि अगर मीरगंज में बदलाव नहीं किया गया तो पार्टी को नुकसान हो सकता है। इसी कारण सुल्तान बेग ने अब मीरगंज की बजाय भोजीपुरा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है।
सुल्तान बेग की नजर अब भोजीपुरा विधानसभा सीट पर है। भोजीपुरा सीट भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहां भी सपा का एक मजबूत आधार रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में मुकाबला कड़ा हुआ है।
सुल्तान बेग का भोजीपुरा की ओर रुख करना यह दिखाता है कि वह अब नई जमीन तलाश रहे हैं। माना जा रहा है कि वहां उन्हें अपने समाज और समर्थकों का बेहतर समर्थन मिल सकता है। हालांकि, भोजीपुरा में पहले से ही मौजूदा विधायक शहजिल इस्लाम सहित कुछ दावेदार मौजूद हैं, ऐसे में सुल्तान बेग की एंट्री से वहां भी टिकट की लड़ाई तेज हो सकती है।
समाजवादी पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सही उम्मीदवार का चयन करे। मीरगंज में शराफतयार खां को आगे बढ़ाकर पार्टी एक संदेश दे सकती है कि वह जीतने की रणनीति पर काम कर रही है, न कि सिर्फ पुराने चेहरों पर निर्भर है।
मीरगंज सीट पर सिर्फ उम्मीदवार का नाम ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दे भी अहम भूमिका निभाते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी समस्याएं यहां के मतदाताओं के लिए प्रमुख मुद्दे हैं।
शराफतयार खां की कोशिश है कि वह इन मुद्दों को उठाकर जनता के बीच जाएं और यह दिखाएं कि वह सिर्फ एक चेहरा नहीं, बल्कि समस्याओं को समझने वाला नेता हैं।
कुल मिलाकर, मीरगंज विधानसभा सीट पर इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। शराफतयार खां का नाम सबसे आगे आना और सुल्तान बेग का मीरगंज से हटकर भोजीपुरा की ओर जाना यह दिखाता है कि सपा अब पुराने फार्मूले छोड़कर नई रणनीति अपनाने की कोशिश कर रही है।
यह बदलाव पार्टी के लिए फायदेमंद होगा या नहीं, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि मीरगंज और भोजीपुरा दोनों सीटों पर टिकट को लेकर होने वाला फैसला न सिर्फ इन क्षेत्रों की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि बरेली जिले में सपा की कुल चुनावी तस्वीर पर भी असर डालेगा।
अगर सपा सही समय पर सही उम्मीदवार उतारने में सफल होती है और संगठन को एकजुट रखती है, तो मीरगंज सीट पर उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। वहीं, भोजीपुरा में सुल्तान बेग की दावेदारी नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दे चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि आने वाले चुनावों में बरेली की राजनीति कई नए मोड़ लेने वाली है।

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