नीरज सिसौदिया, बरेली
रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले जब पूरा देश भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का त्योहार मनाने की तैयारियों में जुटा था, बरेली में एक ऐसा कार्यक्रम मातम में बदल गया, जहां मेयर को राखी बांधने और साड़ी लेने पहुंची महिलाओं के बीच अचानक अफरा-तफरी और धक्का-मुक्की मच गई। इस घटना में चंद्रगुप्तपुरम निवासी पूर्व सैनिक की पत्नी करीब 45 वर्षीय मधु सिंह की मौत हो गई। मधु भाजपा के पूर्वी मंडल अध्यक्ष राजा तोमर की मामी हैं। परिवार और प्रत्यक्षदर्शियों के आरोपों के मुताबिक वह राखी बांधने और उपहार में साड़ी लेने कार्यक्रम में पहुंची थीं, लेकिन वापस घर नहीं लौट सकीं। वहीं, परिवार को सांत्वना देना तो दूर मीडिया को दिए बयान में उमेश गौतम यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि उनके कार्यक्रम में कोई भगदड़ भी हुई। हैरानी की बात तो यह है कि कार्यक्रम की प्रशासन से कोई अनुमति भी नहीं ली गई थी। बिना पुलिस-प्रशासन की अनुमति के इतना बड़ा कार्यक्रम कैसे आयोजित कर दिया गया। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मातृ शक्ति के सशक्तिकरण की बात करते हैं, वहीं उन्हीं की पार्टी के उमेश गौतम जैसे नेता पीएम और सीएम के दावों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। सीएम योगी यूपी की बेटियों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं वहीं, दूसरी ओर लापरवाह नेताओं द्वारा बेटियों की जान जोखिम में डाली जा रही है।

सवाल सिर्फ एक महिला की मौत का नहीं है। सवाल यह है कि अगर हजारों की भीड़ जुटने की आशंका थी तो भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था कहां थी? पुलिस और प्रशासन को कार्यक्रम की पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई थी? आयोजकों ने सुरक्षा और प्रशासनिक इंतजाम क्यों नहीं किए? और यदि कार्यक्रम में अव्यवस्था हुई तो उसकी जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा?
कार्यक्रम मेयर उमेश गौतम और उनके पुत्र पार्थ गौतम से जुड़े पार्थ फाउंडेशन की ओर से आयोजित किया गया था। मेयर उमेश गौतम और उनके समर्थकों की ओर से कार्यक्रम में करीब 20 हजार महिलाओं के पहुंचने का दावा किया जा रहा है। यदि यह दावा सही है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इतनी बड़ी भीड़ के लिए सुरक्षा, प्रवेश-निकास, बैरिकेडिंग, मेडिकल सहायता और भीड़ प्रबंधन की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं दिखाई दी? मेयर ने लापरवाही क्यों बरती?

एसएसपी बोले—पुलिस को कार्यक्रम की पूर्व सूचना नहीं थी
मामले को और गंभीर बनाता है वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य का मीडिया को दिया गया बयान। एसएसपी के मुताबिक पुलिस को कार्यक्रम की पूर्व सूचना नहीं थी। भीड़ की जानकारी मिलने के बाद क्षेत्राधिकारी प्रथम, थाना पुलिस और यातायात पुलिस को मौके पर भेजा गया।
यही बयान अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्याें इतने बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम के आयोजकों ने प्रशासन को पहले से सूचना नहीं दी थी? हजारों लोगों की भीड़ वाले कार्यक्रम में सुरक्षा व्यवस्था किसके भरोसे छोड़ी गई थी?

पुलिस ने किसी महिला या बच्चे की मौत की पुष्टि नहीं की है। पुलिस के अनुसार एक-दो महिलाओं के बेहोश होने की सूचना मिली थी और किसी गंभीर चोट की जानकारी नहीं थी। दूसरी ओर, प्रत्यक्षदर्शियों की ओर से कई महिलाओं के बेहोश होने की बात कही गई। एक महिला ने तो करीब सात महिलाओं के बेहोश होने का दावा किया।
यानी घटना को लेकर प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पुलिस के आधिकारिक बयान में अंतर दिखाई दे रहा है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि प्रशासन मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराए और यह स्पष्ट करे कि वास्तव में कार्यक्रम स्थल पर हुआ क्या था।

मधु की मौत का दावा, लेकिन आधिकारिक पुष्टि पर सवाल
मृतका के परिजनों और स्थानीय लोगों के मुताबिक मधु की जान कार्यक्रम के दौरान बिगड़ी स्थिति के बीच गई। भाजपा मंडल अध्यक्ष राजा तोमर के एक निजी न्यूज चैनल को दिए गए बयान का भी हवाला दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने अपनी मामी मधु की मौत को कार्यक्रम की अव्यवस्था से जोड़ते हुए नाराजगी जताई।
यदि यह दावा सही है तो मामला बेहद गंभीर है।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि कार्यक्रम सफल रहा या नहीं। सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक या सामाजिक आयोजन की सफलता का पैमाना भीड़ की संख्या है या वहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा?
अगर किसी महिला की जान चली गई, कई लोग बेहोश हुए और लोग धक्का-मुक्की से परेशान हुए, तो फिर ऐसे आयोजन को सिर्फ भीड़ जुटने के आधार पर सफल बताना संवेदनहीनता से कम नहीं कहा जा सकता।

साड़ी के लिए निकली थी, कफन में लौटने की बात ने झकझोर दिया
मधु की कहानी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दर्दनाक पहलू है।
रक्षाबंधन के मौके पर घर-परिवार की खुशियों के लिए साड़ी लेने निकली एक महिला के परिवार को यदि उसके शव का इंतजार करना पड़ा, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह बड़े आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल है।
क्या गरीब और सामान्य परिवारों से आने वाली महिलाओं की जान की कीमत सिर्फ इतनी है कि घटना के बाद कहा जाए—कुछ महिलाएं बेहोश हुई थीं?
क्या प्रशासन इस बात की तह तक जाएगा कि मधु की मौत किन परिस्थितियों में हुई? क्या पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आएगी? क्या कार्यक्रम स्थल के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित किए जाएंगे? क्या प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज होंगे? क्या आयोजकों से अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े दस्तावेज मांगे जाएंगे?
इन सवालों का जवाब जरूरी है।
अगर पुलिस को जानकारी नहीं थी तो इतनी बड़ी भीड़ कैसे जुटी?
यह पूरे मामले का सबसे अहम प्रशासनिक सवाल है।
एक ओर कार्यक्रम में हजारों महिलाओं के पहुंचने का दावा किया जा रहा है, दूसरी ओर एसएसपी का कहना है कि पुलिस को कार्यक्रम की पूर्व सूचना नहीं थी। ऐसे में प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इतने बड़े आयोजन के लिए आयोजकों ने किन विभागों से अनुमति या समन्वय किया था।

यदि अनुमति नहीं ली गई थी तो जिम्मेदारी किसकी है?
यदि अनुमति ली गई थी तो पुलिस को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?
यदि अनुमति की जरूरत नहीं थी, तब भी भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था किसकी जिम्मेदारी थी?
और सबसे बड़ा सवाल—यदि किसी की मौत वास्तव में भीड़ की अव्यवस्था के कारण हुई है तो उसकी जवाबदेही तय करने में पुलिस को किस बात का इंतजार है?
राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन या जनसुरक्षा से समझौता?
बरेली की राजनीति में मेयर उमेश गौतम की सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उनके नाम की राजनीतिक चर्चाएं भी होती रही हैं। ऐसे में उनके समर्थकों की ओर से बड़े कार्यक्रम और भारी भीड़ को राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के तौर पर देखा जाना स्वाभाविक है।
लेकिन राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की होड़ में जनसुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
यदि आयोजन में अपेक्षा से कहीं ज्यादा भीड़ पहुंच गई थी तो आयोजकों को तत्काल भीड़ को नियंत्रित करने, प्रवेश रोकने, वैकल्पिक रास्ते बनाने और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए थी।
सिर्फ भीड़ जुटा लेना उपलब्धि नहीं है।
भीड़ को सुरक्षित वापस घर भेजना ही किसी बड़े आयोजन की असली सफलता है।
अब पुलिस के सामने सबसे कठिन सवाल
इस घटना के बाद पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव और समाजवादी अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर अनीस अहमद खां, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी के मृतका के घर पहुंचने की बात सामने आई है। स्थानीय लोग भी परिवार के साथ खड़े नजर आए।
राजनीतिक दलों का मौके पर पहुंचना अपनी जगह है, लेकिन असली परीक्षा अब प्रशासन की है।
क्या पुलिस मधु की मौत की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच करेगी?
क्या कार्यक्रम की अनुमति और सुरक्षा इंतजामों की जांच होगी?
क्या आयोजकों से पूछताछ की जाएगी? उनके खिलाफ किन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाएगा?
क्या सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जुटाए जाएंगे?
क्या लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी?
और यदि जांच में आपराधिक लापरवाही या किसी अन्य अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो क्या पुलिस कानून के मुताबिक आयोजकों सहित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगी?
यहां किसी को पहले से दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। लेकिन किसी प्रभावशाली व्यक्ति या राजनीतिक पद से जुड़े आयोजक को सिर्फ इसलिए जांच से बाहर रखना भी कानून के शासन के खिलाफ होगा।
मधु को न्याय तभी मिलेगा जब सवालों के जवाब मिलेंगे
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे जरूरी है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर निष्पक्ष जांच हो।
मधु की मौत हुई या नहीं—इसका अंतिम और आधिकारिक उत्तर मेडिकल जांच और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया से सामने आना चाहिए। यदि मौत हुई है तो उसका कारण क्या था, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। यदि कार्यक्रम की अव्यवस्था ने उनकी जान ली तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि आयोजकों की कोई गलती नहीं थी तो जांच उन्हें भी स्पष्ट रूप से निर्दोष बताए।
लेकिन चुप्पी किसी समस्या का समाधान नहीं है।
एक महिला त्योहार की खुशियों के बीच घर से निकली थी। यदि वह वापस नहीं लौटी तो उसके परिवार को सिर्फ संवेदना नहीं, सच और न्याय चाहिए।
रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर हुई इस घटना ने बरेली के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या बड़े आयोजनों में भीड़ जुटाना ही मकसद है या लोगों की जान की सुरक्षा भी किसी की जिम्मेदारी है?
और यदि लापरवाही साबित होती है तो क्या कानून का हाथ आयोजक की हैसियत देखकर रुकेगा, या फिर सचमुच हर जिम्मेदार व्यक्ति तक पहुंचेगा?
मधु के परिवार को इसका जवाब चाहिए।
बरेली को इसका जवाब चाहिए।
और अब पुलिस-प्रशासन को भी इसका जवाब देना होगा।




