यूपी

सपा के राजेश अग्रवाल ने शिक्षक सम्मान के बहाने साधा सियासी समीकरण, संघ से जुड़े स्कूलों तक पहुंची पकड़, 5 सितंबर से 5 अक्टूबर तक चलाया शिक्षक सम्मान माह, हर धर्म और विचारधारा से जुड़े स्कूलों में पहुंचे; कैंट टिकट की दावेदारी के बीच बढ़ाया जनसंपर्क का दायरा

Share now

नीरज सिसौदिया, बरेली

समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और बरेली कैंट विधानसभा सीट से पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार राजेश अग्रवाल ने एक महीने तक चलाए गए शिक्षक सम्मान अभियान के जरिए अपनी राजनीतिक पहुंच और सामाजिक संपर्क का एक अलग चेहरा सामने रखा है।

5 सितंबर से 5 अक्टूबर तक चले शिक्षक सम्मान माह के दौरान राजेश अग्रवाल महानगर के अलग-अलग स्कूलों में पहुंचे और शिक्षकों को शॉल ओढ़ाकर तथा प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया। खास बात यह रही कि उनका यह अभियान किसी एक समुदाय या विचारधारा तक सीमित नहीं रहा।

राजेश अग्रवाल मुस्लिम, सिख, ईसाई और हिंदू समाज से जुड़े स्कूलों में पहुंचे। इनमें मुस्लिम समाज से जुड़े खलील हायर सेकेंड्री स्कूल, सिख समाज से जुड़े गुरुनानक खालसा इंटर कॉलेज, ईसाई समुदाय से जुड़े बिशप मंडल तथा हिंदू समाज से जुड़े लायंस विद्या मंदिर, श्री वैदेही बाल विद्या मंदिर, साहू गोपीनाथ कन्या इंटर कॉलेज, संत रविदास सरस्वती शिशु मंदिर, स्वदेश भूषण गर्ल्स इंटर कॉलेज, राम भरोसे लाल गर्ल्स इंटर कॉलेज और रामानुज दयाल अग्रवाल सरस्वती शिशु मंदिर सहित अन्य शिक्षण संस्थान शामिल रहे।

इस पूरे अभियान की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि राजेश अग्रवाल समाजवादी पार्टी से जुड़े नेता हैं और जिन स्कूलों तक वह पहुंचे, उनमें कुछ ऐसे संस्थान भी हैं जहां किसी समाजवादी नेता की नियमित राजनीतिक पहुंच आसान नहीं मानी जाती। खासतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन विद्या भारती से जुड़े स्कूलों में उनकी मौजूदगी ने उनके व्यापक व्यक्तिगत संपर्कों को चर्चा में ला दिया है।

संत रविदास सरस्वती शिशु मंदिर और रामानुज दयाल अग्रवाल सरस्वती शिशु मंदिर विद्या भारती से संचालित संस्थान हैं। इनमें रामानुज दयाल अग्रवाल सरस्वती शिशु मंदिर में तो राजेश अग्रवाल को एक आधिकारिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित कर सम्मानित भी किया गया। यह स्थिति उनके लिए इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वह समाजवादी पार्टी के नेता हैं, जबकि इन संस्थानों की वैचारिक पृष्ठभूमि संघ परिवार से जुड़ी है।

राजेश अग्रवाल के समर्थक इसे उनकी 31 वर्ष की जनसेवा और लंबे समय से बनाए गए व्यक्तिगत संपर्कों का परिणाम बता रहे हैं। उनका कहना है कि राजेश अग्रवाल ने राजनीति को केवल दलगत दायरे तक सीमित नहीं रखा और अलग-अलग वर्गों के लोगों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाए। यही वजह है कि राजनीतिक रूप से अलग विचारधारा रखने वाले लोगों के बीच भी उनकी स्वीकार्यता दिखाई देती है।

राजेश अग्रवाल की राजनीतिक शैली का एक और उदाहरण स्थानीय निकाय चुनाव में देखने को मिला था, जब वह भाजपा विधायक के बूथ से भी पार्षद का चुनाव जीतने में सफल रहे थे। अब शिक्षक सम्मान अभियान के दौरान संघ से जुड़े शिक्षण संस्थानों तक उनकी पहुंच सामने आने के बाद कैंट विधानसभा सीट की राजनीति में उनके सामाजिक आधार को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

राजेश अग्रवाल ने शिक्षक सम्मान माह का आयोजन ऐसे समय किया, जब शिक्षक एमएलसी चुनाव भी राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में है। ऐसे में एक महीने तक शिक्षकों के बीच जाकर उन्हें सम्मानित करने के अभियान को महज सामाजिक कार्यक्रम के बजाय राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस अभियान से समाजवादी पार्टी के शिक्षक एमएलसी प्रत्याशी दानिश अख्तर को भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।

खास बात यह है कि शिक्षक सम्मान के इस अभियान में राजेश अग्रवाल ने पार्टी की राजनीति से आगे बढ़कर व्यक्तिगत संपर्कों को प्राथमिकता दी। उन्होंने शिक्षकों को सम्मानित करने के साथ स्वयं भी कई स्थानों पर सम्मान प्राप्त किया। इससे शिक्षकों के बीच उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को मजबूती मिली है।

कैंट विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर सपा में टिकट के संभावित दावेदारों के बीच गतिविधियां तेज हो रही हैं। ऐसे में राजेश अग्रवाल का एक महीने तक अलग-अलग समुदायों और विचारधाराओं से जुड़े स्कूलों में पहुंचना उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उनका संदेश साफ दिखाई देता है कि कैंट की राजनीति केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं होगी, बल्कि व्यक्तिगत संपर्क, सामाजिक स्वीकार्यता और विभिन्न वर्गों के बीच पहुंच भी टिकट और चुनावी संभावनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

राजेश अग्रवाल के इस अभियान की खासियत यही रही कि उन्होंने शिक्षक सम्मान को किसी एक समुदाय या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं रखा। मुस्लिम, सिख, ईसाई और हिंदू समाज से जुड़े शिक्षण संस्थानों में पहुंच बनाकर उन्होंने व्यापक सामाजिक संपर्क का संदेश दिया। अब देखना यह होगा कि शिक्षक समाज के बीच बना यह व्यक्तिगत जुड़ाव आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी राजनीतिक दावेदारी को कितना मजबूत करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *