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फरीदपुर विधानसभा सीट : अपनों की महत्वाकांक्षा से घिरी सपा-भाजपा, टिकट की एक चूक बिगाड़ सकती है पूरा चुनावी गणित, श्याम बिहारी लाल के परिवार में बेटे और चाची के बीच विरासत की जंग, सियाराम सागर के परिवार में कल्पना और चंद्रसेन आमने-सामने; विजयपाल-रामबाबू और ननद-भाभी की सियासत ने बढ़ाई दोनों दलों की मुश्किल, जानिये कैसे?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

फरीदपुर विधानसभा सीट पर वर्ष 2027 के चुनाव की जंग अभी टिकटों तक नहीं पहुंची है, लेकिन दावेदारों के बीच सियासी टकराव ने समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। दोनों दलों के सामने चुनौती सिर्फ मजबूत उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि उन महत्वाकांक्षाओं को साधने की भी है, जो टिकट की घोषणा के साथ ही बगावत या भीतरघात का कारण बन सकती हैं। कहीं राजनीतिक विरासत पर बेटे और चाची का दावा आमने-सामने है तो कहीं पुराने सियासी परिवार में बहू और ससुर के बीच टिकट की लड़ाई है। चाचा-भतीजे की अलग-अलग दलों से दावेदारी और ननद-भाभी की प्रतिद्वंद्विता ने भी समीकरण उलझा दिए हैं। ऐसे में फरीदपुर में टिकट का फैसला दोनों दलों के लिए आसान नहीं दिख रहा।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी की चुनौती है। ऐसे में पार्टी किसी ऐसी सीट पर जोखिम नहीं लेना चाहेगी, जहां टिकट के बाद ही अंदरूनी खींचतान चुनावी नुकसान का कारण बन जाए। दूसरी ओर भाजपा भी अपनी जीती हुई सीट पर कब्जा बरकरार रखना चाहेगी। दोनों दलों के सामने सवाल है कि किस दावेदार पर भरोसा जताया जाए और किस तरह बाकी दावेदारों की नाराजगी को चुनावी नुकसान में बदलने से रोका जाए।

श्याम बिहारी लाल की विरासत पर चाची और भतीजे का दावा

फरीदपुर में भाजपा के सामने सबसे पहले पूर्व विधायक प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल के परिवार की दावेदारी का सवाल है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाले श्याम बिहारी लाल का कुछ माह पहले निधन हो गया था। अब उनकी राजनीतिक विरासत पर उनके बेटे ईशान ग्वाल और उनके भाई की पत्नी और ब्लॉक प्रमुख सोनम ग्वाल की नजर है। ईशान खुद को अपने पिता की विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते हैं, जबकि सोनम ग्वाल भी परिवार की राजनीतिक पहचान के आधार पर अपना दावा पेश कर रही हैं।

सोनम ग्वाल और ईशान ग्वाल

भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि दोनों में से किसी एक को टिकट देने पर दूसरे की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। ईशान को उम्मीदवार बनाया जाता है तो सोनम ग्वाल असंतुष्ट हो सकती हैं। वहीं, सोनम को टिकट मिलने की स्थिति में ईशान और उनके समर्थकों की नाराजगी पार्टी के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। ईशान के पास अब तक चुनावी राजनीति का अनुभव नहीं है, जबकि पार्टी को यह भी देखना होगा कि पारिवारिक विरासत का दावा चुनावी समर्थन में कितना बदल सकता है।
भाजपा के लिए यह सिर्फ परिवार के भीतर सहमति बनाने का मामला नहीं है। पार्टी को यह भी तय करना होगा कि उम्मीदवार का चयन जीत की संभावना, क्षेत्र में स्वीकार्यता और संगठनात्मक क्षमता के आधार पर कैसे किया जाए। परिवार में असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया तो उसका असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है।

सियाराम सागर की विरासत पर बहू कल्पना और चाचा ससुर चंद्रसेन आमने-सामने

समाजवादी पार्टी के सामने भी ऐसी ही, लेकिन अपने अलग राजनीतिक इतिहास वाली चुनौती है। फरीदपुर से पांच बार विधायक रहे स्वर्गीय डॉ. सियाराम सागर के परिवार में उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर दो दावेदार सामने हैं। उनके पुत्र डीके सागर की पत्नी कल्पना सागर पार्टी से टिकट की दावेदारी कर रही हैं। दूसरी ओर सियाराम सागर के छोटे भाई और दो बार ब्लॉक प्रमुख रह चुके चंद्रसेन सागर भी पूरी मजबूती से अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।

कल्पना सागर और चंद्रसेन सागर

दोनों के बीच अंतर सिर्फ पारिवारिक रिश्ते का नहीं, बल्कि राजनीतिक सक्रियता और अनुभव का भी है। कल्पना सागर की दावेदारी मुख्य रूप से परिवार की विरासत से जुड़ी है, जबकि चंद्रसेन सागर लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। वह पीडीए रथ यात्रा, समाजवादी संदेश यात्रा और छात्रों के सम्मान से जुड़े अभियानों के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। बूथ स्तर पर उनका काम सभी दावेदारों से मजबूत है। ऐसे में टिकट का फैसला करते समय सपा को पारिवारिक दावे के साथ-साथ जमीनी सक्रियता और चुनावी क्षमता का भी आकलन करना होगा।
कल्पना सागर और चंद्रसेन सागर के बीच राजनीतिक मतभेद पहले भी सामने आ चुके हैं। वर्ष 2005 में कल्पना सागर ने ब्लॉक प्रमुख पद के लिए चंद्रसेन सागर के मुकाबले टिकट मांगा था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद कल्पना सागर के विरोध के बावजूद चंद्रसेन सागर ब्लॉक प्रमुख बन गए थे। कल्पना का विरोध उनके चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं कर सका था। वर्ष 2017 में कल्पना सागर ने तत्कालीन विधायक डॉ. सियाराम सागर की उम्र और चुनाव लड़ने की क्षमता पर सवाल उठाते हुए खुद के लिए टिकट की दावेदारी पेश की थी। मामला पार्टी नेतृत्व तक पहुंचा, लेकिन अखिलेश यादव ने सियाराम सागर पर भरोसा जताया और उन्हें ही उम्मीदवार बनाया।
अब सियाराम सागर के निधन के बाद टिकट की लड़ाई फिर सामने है। यदि सपा कल्पना सागर को चुनती है तो चंद्रसेन सागर और उनके समर्थकों की नाराजगी का सवाल उठेगा। इसके विपरीत अगर पार्टी चंद्रसेन सागर को टिकट देती है, तो कल्पना सागर को उनके समर्थन में रहना पड़ेगा। कल्पना सागर के पति डीके सागर उप निबंधक हैं, जबकि चंद्रसेन सागर की बेटियां उच्च पदों पर अधिकारी (दो बेटियां आईएएस और एक बेटी आईआरएस)  हैं। ऐसे में चंद्रसेन सागर के परिवार में उच्च पदों पर अधिकारियों की मौजूदगी के कारण डीके सागर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान और लाभ मिलता है। इसलिए वह खुलकर चंद्रसेन सागर का विरोध नहीं कर पाएंगे।

वहीं,  कल्पना सागर की जनता के बीच अपनी कोई खास राजनीतिक पहचान नहीं है। उन्हें डॉ. सियाराम सागर की विरासत का लाभ भी नहीं मिल सकता, क्योंकि डॉ. सियाराम सागर ने उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था और अपनी संपत्ति दो बेटों को दे दी थी। फरीदपुर की जनता इस मामले से परिचित है।इसलिए कल्पना सागर अपने चचिया ससुर चंद्रसेन सागर का कोई नुकसान नहीं कर सकतीं। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जाता है कि पहले के चुनावी प्रसंगों में कल्पना सागर का विरोध चंद्रसेन सागर की राजनीतिक राह नहीं रोक पाया था। इस बार भी पार्टी को देखना होगा कि किस उम्मीदवार के साथ मतदाताओं का अधिक मजबूत आधार जुड़ा हुआ है।

इस परिवार का विवाद सपा के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि डॉ. सियाराम सागर की लंबे समय से बनी राजनीतिक पहचान फरीदपुर में अब भी मायने रखती है। पार्टी के सामने चुनौती इस विरासत को आगे बढ़ाने के साथ ऐसा उम्मीदवार चुनने की है, जो भाजपा को सीधी चुनौती दे सके और अंदरूनी असंतोष को सीमित रख सके।

चाचा विजयपाल सपा से तो भतीजा रामबाबू भाजपा से टिकट की दौड़ में

फरीदपुर की सियासत में पूर्व विधायक विजयपाल सिंह और उनके भतीजे रामबाबू वर्मा की दावेदारी भी दिलचस्प समीकरण बना रही है। विजयपाल सिंह समाजवादी पार्टी से टिकट मांग रहे हैं, जबकि रामबाबू वर्मा भाजपा से उम्मीदवार बनने की कोशिश में हैं। दोनों अलग-अलग दलों से दावेदारी कर रहे हैं, लेकिन परिवार के भीतर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता दोनों पार्टियों के लिए संभावित चुनौती बन सकती है।

विजयपाल सिंह और रामबाबू।

यदि सपा विजयपाल सिंह को टिकट देती है और भाजपा रामबाबू वर्मा को उम्मीदवार नहीं बनाती, तो सपा को उन वोटों का लाभ नहीं मिल पाएगा जो रामबाबू की नाराजगी के कारण सपा के किसी और उम्मीदवार को मिल सकता है। दूसरी ओर यदि भाजपा रामबाबू पर दांव लगाती है और सपा विजयपाल सिंह को टिकट नहीं देती, तो भाजपा को उन वोटों का लाभ नहीं मिल पाएगा जो विजयपाल के समर्थकों की नाराजगी के चलते किसी और भाजपा उम्मीदवार को मिल सकता है।
विजयपाल सिंह के सामने एक और चुनौती है। उन्हें सियाराम सागर के परिवार की राजनीतिक विरासत से जुड़े विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है। साथ ही यादव पहले से ही विजयपाल से नाराज बैठा है। यही वजह है कि विजयपाल सिंह फरीदपुर में हार की हैट्रिक लगा चुके हैं। इस बार हार का चौका भी जड़ सकते हैं। पिछले तीन चुनावों में लगातार मिली हार के बाद इस बार उनके लिए टिकट हासिल करने के साथ-साथ व्यापक समर्थन जुटाना भी अहम होगा।

दलबदलू ननद शालिनी-भाभी पूनम की लड़ाई भी किसी से कम नहीं

समाजवादी पार्टी के सामने एक और उलझन पूनम सेन और शालिनी सिंह की दावेदारी है। दोनों के बीच ननद-भाभी का रिश्ता है। पूनम सेन के पति भीमसेन वन विभाग में अधिकारी हैं, जबकि शालिनी सिंह उनकी सगी बहन हैं। दोनों के बीच संपत्ति से जुड़ा विवाद होने की बात कही जाती है और राजनीतिक स्तर पर भी उनकी प्रतिद्वंद्विता पुरानी है।

पूनम सेन और शालिनी सिंह।

वर्ष 2017 में दोनों विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं और हार चुकी हैं। दोनों का क्षेत्र में कोई खास व्यक्तिगत जनाधार भी नहीं है। वर्ष 2022 में शालिनी सिंह ने सपा से अलग होकर बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सकीं। बाद में वह फिर सपा में लौट आईं। पूनम सेन भी भाजपा से सपा में आ चुकी हैं और राष्ट्रीय लोकदल में भी रह चुकी हैं।
अब सपा के सामने सवाल है कि दोनों में से किस पर भरोसा किया जाए। शालिनी सिंह को टिकट मिलता है तो पूनम सेन की नाराजगी सामने आ सकती है। पूनम सेन को उम्मीदवार बनाया जाता है तो शालिनी सिंह की प्रतिक्रिया पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि और पुराने मतभेदों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व को टिकट के साथ-साथ चुनावी एकजुटता पर भी विचार करना होगा।

टिकट का फैसला ही नहीं, नाराजगी संभालना भी होगी चुनौती

फरीदपुर में सपा और भाजपा के सामने चुनौती केवल दावेदारों की लंबी सूची से किसी एक नाम पर मुहर लगाने की नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि टिकट की घोषणा के बाद पार्टी अपने समर्थकों और असंतुष्ट नेताओं को किस तरह एकजुट रखती है। श्याम बिहारी लाल के परिवार में विरासत की दावेदारी भाजपा के लिए अहम है, जबकि सियाराम सागर के परिवार में कल्पना सागर और चंद्रसेन सागर के बीच मुकाबला सपा के फैसले को जटिल बना रहा है। विजयपाल सिंह-रामबाबू वर्मा और पूनम सेन-शालिनी सिंह के समीकरण इस चुनौती को और बढ़ाते हैं।
भाजपा के लिए श्याम बिहारी लाल की राजनीतिक विरासत को साधना महत्वपूर्ण हो सकता है, वहीं सपा के लिए सियाराम सागर के परिवार की भूमिका और चंद्रसेन सागर जैसे सक्रिय दावेदार की स्थिति पर फैसला अहम होगा।

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