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मुस्लिम, यादव ही नहीं जाटव भी बना रहे हैं पूर्व सपा प्रत्याशी विजयपाल से दूरी इसलिए करना पड़ रहा है जाटव समाज का सम्मेलन, पिछले चुनाव में हजारों जाटवों ने बसपा को दिया था वोट, इस बार और बुरे हो चुके हैं हालात, जानिये क्या कहते हैं विजयपाल के बिगड़े हुए समीकरण?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी विजयपाल सिंह की राजनीतिक जमीन पूरी तरह उनके पैरों तले से निकल चुकी है। मुस्लिम और यादवों की ओर से खुलकर नाराजगी जाहिर करने के बाद अब जाटव समाज के लोग भी उनके खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे हैं। इससे घबराए विजयपाल सिंह ने 27 जून को जाटव समाज का एक सम्मेलन बुलाया है। इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए शनिवार को एक बैठक आयोजित की गई थी। यह सम्मेलन इस बात का संकेत है कि विजयपाल सिंह फरीदपुर में अपनी ही जाति का भरोसा खो चुके हैं।
दरअसल, विजयपाल सिंह खुद भी जाटव समाज से ही आते हैं लेकिन वर्ष 2007 के बाद कभी भी जाटवों ने उन पर भरोसा नहीं जताया जिस कारण वह वर्ष 2012, 2017 और 2022 में हुए विधानसभा चुनावों में से एक भी चुनाव नहीं जीत पाए और हार की हैट्रिक लगा बैठे। पिछले विधानसभा चुनाव में यादव और मुस्लिम वोट तो समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार होने की वजह से उन्हें मिल गए लेकिन उनकी अपनी बिरादरी जाटवों ने ही उनका साथ नहीं दिया और बसपा को लगभग 14 हजार से भी अधिक वोट पड़ गए जिसमें करीब 10 हजार वोट जाटवों के ही बताए जाते हैं। वहीं, कुछ जाटव वोट भाजपा के हिस्से में भी गए। यही कारण रहा कि एकतरफा मुस्लिम और यादव वोट मिलने के बाद भी विजयपाल सिंह लगभग तीन हजार वोटों से चुनाव हार गए। अब इस बार विजयपाल सिंह की स्थिति और खराब हो चुकी है। पिछली बार जिन मुस्लिम और यादवों ने विजयपाल सिंह को वोट दिया था इस बार उन्होंने विजयपाल सिंह के खिलाफ अभी से मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि अगर विजयपाल सिंह को टिकट मिलता है तो उनका वोट सपा की जगह भाजपा को जाएगा। ये विरोध करने वाले कोई मामूली ग्रामीण नहीं हैं बल्कि बीडीसी मेंबर जैसे प्रतिष्ठित पद के नेताओं ने भी अपना विरोध जाहिर कर दिया है। ऐसे में विजयपाल सिंह को अपनी नैया डूबती नजर आ रही है और वह अपनी जाति को जोड़ने की कवायद शुरू कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने 27 जून को अपनी ही जाति का सम्मेलन रखा है। इस सम्मेलन की सफलता पर अभी से प्रश्नचिह्न लगने शुरू हो गए हैं। पूरा क्षेत्र विजयपाल की इस रणनीति का माखौल उड़ा रहा है। लोग यहां तक कह रहे हैं कि विजयपाल बरेली जिले में समाजवादी पार्टी के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें अपनी ही जाति के लोगों को जोड़ने के लिए सम्मेलन का सहारा लेना पड़ रहा है।

जाटव सम्मेलन की तैयारियों को लेकर आयोजित बैठक में उपस्थित नेता।

विजयपाल के अलावा पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर, शालिनी सिंह, कल्पना सागर और हरीश लाखा जैसे जाटव नेता भी फरीदपुर विधानसभा सीट पर हैं और सपा के टिकट के दावेदार भी हैं लेकिन किसी को भी अपनी जाति के लोगों को जोड़ने के लिए सम्मेलन कराने की जरूरत नहीं पड़ रही है। सिर्फ फरीदपुर ही नहीं बरेली जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसे अपनी जाति के लोगों को जोड़ने के लिए अपनी ही जाति का सम्मेलन आयोजित करना पड़ रहा हो। उदाहरण के तौर पर कैंट विधानसभा सीट से संजीव सक्सेना और राजेश अग्रवाल को कायस्थ और वैश्य सम्मेलन करने की कोई जरूरत नहीं पड़ी। आंवला विधानसभा सीट से डॉक्टर जीराज सिंह यादव और पीयूष वर्मा को यादव और लोधी सम्मेलन का आयोजन करने की जरूरत नहीं पड़ी।मीरगंज में मनोहर पटेल और नवाबगंज में पूर्व विधायक भगवत सरन गंगवार को कुर्मी सम्मेलन करने की जरूरत नहीं पड़ी और बहेड़ी में मौजूदा विधायक अता उर रहमान व भोजीपुरा में शहजिल इस्लाम को एवं शहर विधानसभा सीट पर हसीव खान को क्रमश: बंजारा, अंसारी और पठान सम्मेलन के आयोजन की जरूरत नहीं पड़ी। एकमात्र विजयपाल को ही इसकी जरूरत क्यों पड़ी? यह बताता है कि विजयपाल सिंह की राजनैतिक जमीन कितनी कमजोर हो चुकी है। बता दें कि फरीदपुर विधानसभा सीट पर सबसे अधिक मतदाता जाटव समाज से ही आते हैं।

विजयपाल किसी भी कीमत पर इस सम्मेलन को सफल बनाना चाहते हैं लेकिन जाटवों की नाराजगी के चलते ऐसा संभव नहीं है। इसलिए सूत्र बताते हैं कि इस सम्मेलन में पैसे देकर और नाश्ते-भोजन आदि की व्यवस्था का लालच देकर भीड़ जुटाने की कोशिश की जा रही है। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हुई हैं कि 27 जून को होने वाले इस सम्मेलन में फरीदपुर विधानसभा सीट के कितने जाटव जुटते हैं और बाहर से कितने बुलाए जाते हैं।


समाजवादी पार्टी में टिकट का अंतिम निर्णय संगठन और नेतृत्व स्तर पर होता है। ऐसे में हर दावेदार अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करता है। माना जा रहा है कि 27 जून का सम्मेलन भी उसी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन केवल भीड़ जुटाना और वास्तविक जनसमर्थन होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि सम्मेलन में अपेक्षित संख्या में स्थानीय जाटव समाज के लोग नहीं पहुंचे तो इसका राजनीतिक संदेश उल्टा भी जा सकता है।

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