नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के रोजगार को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षक बनने के लिए अनिवार्य माने जाने वाले डीएलएड (डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन) पाठ्यक्रम में इस बार आधे से अधिक सीटें खाली रह गई हैं। स्थिति यह है कि प्रवेश प्रक्रिया की अंतिम तिथि बीत जाने के बाद भी सरकार को पंजीकरण की अवधि बढ़ाने पर विचार करना पड़ रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण वर्ष 2018 के बाद से परिषदीय विद्यालयों में सहायक अध्यापकों की नियमित भर्ती न होना है। जब प्रशिक्षण के बाद सरकारी नौकरी की कोई उम्मीद नहीं दिखती, तो युवाओं का इस कोर्स से दूरी बनाना स्वाभाविक है।
डीएलएड-2026 के लिए पहले चरण की ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 8 जुलाई को समाप्त हुई। परीक्षा नियामक प्राधिकारी के अनुसार, करीब 10.12 लाख अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया, लेकिन सिर्फ 98,404 अभ्यर्थियों ने आवेदन शुल्क जमा किया। राज्य में डीएलएड की कुल सीटें लगभग 2.39 लाख हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की आशंका है। इसी वजह से शासन को आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा गया है।
उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों के लिए आखिरी बड़ी सहायक अध्यापक भर्ती वर्ष 2018 में हुई थी। उसके बाद नई नियमित भर्ती नहीं निकली। इस बीच हर साल हजारों छात्र डीएलएड और यूपीटीईटी जैसी परीक्षाएं पास करते रहे, लेकिन नियुक्ति का इंतजार लंबा होता गया। कई छात्र तो इन पदों के लिए निर्धारित आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। यही वजह है कि डीएलएड अब युवाओं के लिए रोजगार का भरोसेमंद माध्यम नहीं रह गया है। कई अभ्यर्थी अब बीएड, प्रतियोगी परीक्षाओं या निजी क्षेत्र की ओर रुख कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की शिकायत लगातार सामने आती रही है, तब नई भर्ती क्यों नहीं हो रही?
उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि प्राथमिक विद्यालयों में 45,256 शिक्षक पद रिक्त हैं। दूसरी ओर, विभिन्न जिलों में शिक्षक की कमी के कारण एक ही शिक्षक द्वारा कई कक्षाओं को पढ़ाने की स्थिति भी सामने आती रही है। यानी एक तरफ हजारों प्रशिक्षित बेरोजगार युवा नौकरी का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षक रिक्त पदों का बोझ बना हुआ है।
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने कम छात्र संख्या वाले हजारों परिषदीय विद्यालयों के विलय (मर्जर) की प्रक्रिया भी शुरू की है। सरकार का तर्क है कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, लेकिन शिक्षक संगठनों और अभ्यर्थियों का कहना है कि इससे नई भर्तियों की संभावना और कम हो जाएगी।
युवाओं में यह धारणा मजबूत हुई है कि जब स्कूलों का विलय हो रहा है और नई नियुक्तियां नहीं निकल रही हैं, तो डीएलएड करने का लाभ सीमित रह गया है।
डीएलएड केवल एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के लिए सरकारी शिक्षक बनने का पहला कदम माना जाता रहा है। लेकिन लगातार आठ वर्षों तक भर्ती न होने से हजारों प्रशिक्षित अभ्यर्थी बेरोजगार बैठे हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय-समय पर नियमित भर्ती होती रहती तो न केवल सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर होती, बल्कि डीएलएड पाठ्यक्रम की उपयोगिता भी बनी रहती।
सरकार के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, डीएलएड जैसी शिक्षक प्रशिक्षण व्यवस्था में युवाओं का भरोसा वापस लाना और दूसरी, सरकारी स्कूलों में रिक्त पदों पर पारदर्शी तरीके से नियुक्तियां करना।
यदि समय रहते भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं होती तो आने वाले वर्षों में डीएलएड में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या और घट सकती है। इसका असर भविष्य में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
आंकड़े बयां कर रहे पूरी कहानी
डीएलएड की कुल सीटें: लगभग 2.39 लाख
ऑनलाइन पंजीकरण: 10.12 लाख
शुल्क जमा करने वाले अभ्यर्थी: 98,404
आखिरी बड़ी सहायक शिक्षक भर्ती: वर्ष 2018
प्राथमिक विद्यालयों में रिक्त शिक्षक पद: 45,256 (सरकार द्वारा विधानसभा में दी गई जानकारी)
आवेदन की तिथि बढ़ाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।




