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दो संगठनों की लड़ाई में बेवजह घसीटे गए अतुल कपूर, पार्षद चुनाव हारने वाले पाट्टा ने आरोप तो लगाए पर सबूत नहीं दे पाए, जब छत से नीचे ही जलाने थे पुतले तो क्यों मचाया बवाल, जानिये क्यों निशाने पर हैं अतुल कपूर?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
मॉडल टाउन के इंद्रा पार्क में आयोजित मेले की लड़ाई धर्म की सियासत का एक विकृत रूप थी। दो कथित समाजसेवी संगठनों की लड़ाई में पूर्व उपसभापति अतुल कपूर को बेवजह बलि का बकरा बनाया जा रहा था। अतुल कपूर पर आरोप तो बहुत गंभीर लगाए जा रहे हैं लेकिन आरोप लगाने वाला नवनीत सिंह पाट्टा इंडिया टाइम 24 के सवालों पर ऐसा कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाए जो यह साबित करते हों कि इस पूरे खेल में अतुल कपूर की कोई नकारात्मक भूमिका रही है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पार्क से सटी दुकानों की छत से नीचे उतारकर ही पुतले जलाने थे तो फिर नवनीत सिंह पाट्टा ने अपने साथियों के साथ मिलकर इतना बवाल क्यों मचाया?

पुतला जलाते पाट्टा और अन्य।

नवनीत सिंह खुद ही यह स्वीकार करते हैं कि इंद्रा पार्क में पुतला दहन के खिलाफ जो शिकायत की गई थी वो अतुल कपूर ने नहीं की बल्कि पंजाबी समाज विकास समिति के अध्यक्ष वीरेंद्र अरोड़ा की ओर से की गई है। नवनीत सिंह ने कहा कि अगर अतुल कपूर चाहते तो वीरेंद्र अरोड़ा को शिकायत वापस लेने पर मजबूर कर सकते थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अतुल कपूर ने ही प्रशासन को मौके पर भेजा ताकि रावण का पुतला दहन न किया जा सके। जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका कोई सबूत उनके पास है कि अतुल कपूर ने प्रशासन को भेजा या फिर अतुल कपूर इस आयोजन के खिलाफ हैं तो पाट्टा इसका कोई सबूत नहीं दे सके। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि पाट्टा के आरोप सिर्फ हवाबाजी और अतुल कपूर को बदनाम करने की साजिश के सिवाय कुछ नहीं हैं। अब सवाल यह उठता है कि पाट्टा ऐसे आरोप क्यों लगा रहे हैं? इससे पाट्टा को क्या लाभ मिलेगा? क्या पाट्टा किसी और नेता के हाथों में तो नहीं खेल रहे? तो इसके लिए फ्लैश बैक में जाना होगा।
दरअसल, पाट्टा और अतुल कपूर की सियासी अदावत का सिलसिला विगत नगर निगम चुनावों से शुरू हुआ था। नवनीत सिंह पाट्टा इसी वार्ड से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर पार्षद का चुनाव अपनी पत्नी को लड़वाना चाहते थे लेकिन अतुल कपूर की पत्नी सोनिया अतुल कपूर उनकी राह का रोड़ा बन गईं। पार्टी ने सोनिया अतुल कपूर को उम्मीदवार बनाया और पाट्टा की पत्नी को बेटिकट कर दिया। इसके बाद पाट्टा की पत्नी बतौर निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरीं और निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार वह लगभग एक हजार वोटों से चुनाव हार गईं। इस चुनाव में पाट्टा ने साम, दाम, दंड, भेद सारे हथकंडे अपनाए लेकिन पत्नी को जीत दिलाने में नाकाम साबित हुए। यहीं से दोनों के बीच तल्खी और बढ़ गई। सोनिया अतुल कपूर की जीत सिर्फ पाट्टा की ही नहीं बल्कि वार्ड के कुछ अन्य भाजपा नेताओं की भी आंखों की किरकिरी बन गई। उस दौरान शुरू हुआ साजिशों का सिलसिला आज तक जारी है। कहा तो यह भी जाता है कि पाट्टा ने चुनावों के दौरान अतुल कपूर और उनके परिवार को शारीरिक नुकसान पहुंचाने का भी प्रयास किया था। हालांकि, इसके पुख्ता प्रमाण इंडिया टाइम 24 के पास नहीं हैं।


इंडिया टाइम 24 से बातचीत में पाट्टा ने पहले कहा कि अतुल कपूर अगर संगठन के अध्यक्ष वीरेंद्र अरोड़ा को मना कर देंगे तो अरोड़ा अपनी शिकायत वापस ले लेंगे। जब उनसे पूछा गया कि ऐसा क्यों हो सकता है तो पहले उन्होंने कहा कि अतुल कपूर संगठन के संरक्षक हैं। लेकिन कुछ सेकंड में ही पाट्टा अपनी बात से पलट गए और बोले कि अतुल कपूर नहीं उनकी पत्नी संगठन की संरक्षक हैं। जब पाट्टा को बताया गया कि शिकायतकर्ता संरक्षक नहीं बल्कि अध्यक्ष हैं तो वो बोले कि संरक्षक बड़ा पद होता है, वो जो कहता है वही होता है। यहां बता दें कि पंजाबी समाज विकास समिति में सिर्फ सोनिया अतुल कपूर ही संरक्षक नहीं हैं। उनके अलावा तिलक राज, एसके अरोड़ा और सतीश लुनियाल को भी संरक्षक बनाया गया है। पाट्टा यहां एक बार फिर मात खा गए। जब उनसे पूछा गया कि क्या अतुल कपूर ने नगर निगम, प्रशासन या पुलिस, किसी से भी कोई लिखित शिकायत दी है तो पाट्टा ने साफ इनकार कर दिया। अगर पाट्टा के आरोपों को सही भी मान लिया जाए तो बड़ा सवाल यह उठता है कि एक शख्स जो न तो संगठन का पदाधिकारी है और न ही मौजूदा पार्षद है, वह इतना मजबूत है कि पंजाबी युवा मंच के अध्यक्ष की रावण दहन की प्लानिंग चौपट कर सकता है तो यह भी पाट्टा के सियासी भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। खास तौर पर तब जब खुद नगर निगम के उपसभापति सर्वेश रस्तोगी पाट्टा की ओर से आयोजित पुतला दहन कार्यक्रम का हिस्सा बने। यह स्पष्ट करता है कि पाट्टा सियासत के एक कमजोर खिलाड़ी हैं जो आम जनता से ही नहीं अपने पंजाबी समाज से भी अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। अतुल कपूर से लगातार उन्हें मुंह की खानी पड़ रही है जिससे उनका डर और बौखलाहट बढ़ता जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि पाट्टा ने रावण दहन को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था जिसके चलते वह कुछ भी करने को तैयार थे। इस सबके बावजूद पाट्टा उन दुकानों की छत पर पुतला दहन नहीं कर सके जो पार्क की दीवार से सटी हैं। उन्हें छत से नीचे उतारकर पुतले जलाने पड़े।

पुतला दहन कार्यक्रम के दौरान संबोधित करते विशाल मल्होत्रा और साथ हैं उपसभापति सर्वेश रस्तोगी।

अगर पाट्टा पहले ही मान जाते तो पुतला दहन विजयादशमी के दिन ही हो जाता और इतना बड़ा विवाद पनपता ही नहीं।
अब बात कागजों की करें तो पाट्टा ने अधिकारियों को अनुमति के लिए लिखे गए पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा था कि वह पार्क में सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करेंगे, पुतला दहन नहीं करेंगे। हालांकि पाट्टा अपनी बात पर कायम रहे और अंतत: पार्क के बाहर ही पुतला दहन किया गया। पुरानी कहावत है कि मरता क्या न करता, पाट्टा और कुछ अन्य लोगों ने अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अतुल कपूर को ही लपेटे में ले लिया।
इस संबंध में जब अतुल कपूर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि एक साल पहले ही पंजाबी विकास समिति को नगर निगम ने यह पार्क तीन साल के लिए गोद दे दिया था। मेरा इस समिति से कोई लेना-देना नहीं है। मैं समिति में कोई पदाधिकारी भी नहीं हूं। मेरी पत्नी समिति से जुड़ी हुई है। मैंने पुतला दहन रुकवाने के लिए किसी को कोई शिकायत नहीं दी थी। समिति की ओर से शिकायत की गई थी जिसमें मैं कोई दखल नहीं दे सकता। ये हमारे पंजाबी समाज का मामला है। हमारा समाज एक परिवार है और हर परिवार के सदस्यों में कुछ मतभेद होते हैं। पाट्टा और वीरेंद्र अरोड़ा दोनों ही मेरे परिवार के सदस्य हैं। मुझे खुशी है कि देर से सही यह विवाद खत्म हुआ और बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। रावण परिवार का पुतला दहन होने के साथ ही सच्चाई का भी पटाक्षेप हो गया। मैं एक हिंदू हूं और मैं चाहता था कि पुतला दहन किया जाना चाहिए। पार्क के बाहर पुतला दहन के लिए मैंने प्रशासन से भी बात की और सुरक्षित तरीके से पुतला दहन कराया गया। रही बात किसी एक पक्ष का साथ देने की तो जैसा कि मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि पाट्टा और वीरेंद्र अरोड़ा, दोनों ही मेरे पंजाबी परिवार के सदस्य हैं, ऐसे में किसी एक का पक्ष लेना क्या सही होता?
बहरहाल, अतुल कपूर ने जिस तरह पाट्टा और उनके कुछ साथियों के विरोध का सामना करना पड़ा उसे देखकर यह लगता है कि यह सारा विरोध सिर्फ इस धार्मिक मामले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास था जिसे अतुल कपूर ने अपनी सूझबूझ से नाकाम कर दिया।

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