यूपी

राजेश अग्रवाल के कार्यकाल में पास हुआ था प्रोजेक्ट, संजीव अग्रवाल ने बजट दिलवाया, मंत्री और विधायक की ‘सियासी रोटियां’ खा गए मेयर, आखिर रात के अंधेरे में क्यों किया गया अटल सेतु का उद्घाटन? पढ़िये महानगर भाजपा में बढ़ती गुटबाजी की एक और कहानी?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
महानगर में इन दिनों चौपुला पुल के उद्घाटन का मामला सुर्खियां बटोर रहा है। इस पुल के निर्माण के लिए बरेली वासियों को लंबा इंतजार करना पड़ा लेकिन इतने बड़े पुल का उद्घाटन अप्रत्याशित तौर पर रात के अंधेरे में चोरी -छुपे कर दिया जाएगा यह किसी ने सोचा भी नहीं था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका उद्घाटन मेयर उमेश गौतम ने पार्टी के किसी भी दिग्गज को भरोसे में लिए बिना ही कर दिया। जिस प्रोजेक्ट की चर्चा भाजपा की उपलब्धियों के तौर पर होनी थी, अब उसकी चर्चा पार्टी की गुटबाजी के लिए हो रही है। हर जुबां पर बस एक ही सवाल है कि आखिर इतने बड़े प्रोजेक्ट का उद्घाटन रात के अंधेरे में ‘चोरी छिपे’ क्यों कर दिया गया जबकि 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी पुल के एक चरण का उद्घाटन तत्कालीन विधायक और मौजूदा समय में भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने बड़ी धूमधाम से कराया था। उस उद्घाटन समारोह में पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल सिंह यादव की मौजूदगी ने समूचे विपक्ष में हलचल मचा दी थी। तब भाजपा ने अपनी इस उपलब्धि को चुनावों में खूब भुनाया और कैंट विधानसभा सीट एक बार फिर भाजपा के हिस्से में आ गई। इस बार भी पार्टी की रणनीति कुछ ऐसी ही थी जिस पर उमेश गौतम की हड़बड़ी ने पानी फेर दिया।

चौपुला पुल के उद्घाटन के मौके पर पूजा-अर्चना करते पूर्व मंत्री राजेश अग्रवाल। (फाइल फोटो)

दरअसल, यह पूरा प्रोजेक्ट कैंट के पूर्व विधायक राजेश अग्रवाल के कार्यकाल में पास हुआ था। 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव के बाद जब संजीव अग्रवाल कैंट के विधायक बने और जितिन प्रसाद विभागीय मंत्री बने तो इस पुल को ज्वाइंट करने के लिए बजट की डिमांड शासन के पास भेजी गई लेकिन किन्हीं कारणों से बजट पास नहीं हो पा रहा था। कई बार जब बजट पास नहीं हुआ तो संजीव अग्रवाल ने मंत्री जितिन प्रसाद से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात कर इसके लिए बजट पास करवाया। इसके बाद निर्माण फिर से शुरू हुआ। लगभग दो माह पहले संजीव अग्रवाल ने पुल का निरीक्षण कर सेतु निगम के अधिकारियों को जल्द से जल्द इस पुल को पूरा करने के निर्देश भी दिए थे। तब अधिकारियों ने सितम्बर तक निर्माण पूरा होने का भरोसा भी दिलाया था। अब दो-तीन दिन पहले ही पुल बनकर तैयार हुआ और दीपावली के अवसर पर इसके उद्घाटन की तैयारी की जा रही थी।

सेतु निगम के अधिकारियों को निर्देश देते कैंट विधायक संजीव अग्रवाल। (फाइल फोटो)

बताया जाता है कि उमेश गौतम ने जिस अटल सेतु को विगत 25 नवंबर की रात जेसीबी से पत्थर हटवाकर जनता की परेशानियों को देखते हुए खुलवाने का दावा किया है उस अटल सेतु का उद्घाटन कैबिनेट मंत्री से करवाने की तैयारी थी। अगर किन्हीं कारणवश मंत्री उद्घाटन नहीं कर पाते तो झारखंड के राज्यपाल और बरेली के पूर्व सांसद संतोष गंगवार या स्थानीय विधायक संजीव अग्रवाल इसका उद्घाटन करते। अब जो पुल पहले से ही चालू होकर विवादों में आ गया है उसका उद्घाटन मंत्री जी तो करने से रहे।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चूंकि इस अटल सेतु के पूरे प्रोजेक्ट में मेयर उमेश गौतम की कोई अहम भूमिका नहीं रही है इसलिए इसका क्रेडिट भी उन्हें नहीं मिलने वाला था। इस पुल का निर्माण भी सेतु निगम ने किया है। ऐसे में क्रेडिट वार में पिछड़ रहे मेयर उमेश गौतम को कुछ नहीं सूझा तो रात के अंधेरे में पार्टी से बगावत कर निर्दलीय पार्षद का चुनाव लड़ने वाले अजय चौहान, राजू मिश्रा और बंटू यादव जैसे कुछ पूर्व पार्षदों और अपने गुट के कुछ नेताओं के साथ जाकर खुद ही पत्थर हटवा दिए और पुल से आवागमन शुरू करवा दिया। पुरानी कहावत है, ‘खिसियानी बिल्ली, खंभा नोचे’। इस प्रोजेक्ट को लेकर मेयर की हालत भी कुछ ऐसी ही नजर आ रही थी। उन्हें डर था कि इस पुल का पूरा क्रेडिट कहीं कैंट विधायक संजीव अग्रवाल न ले जाएं, इसलिए उन्होंने रात के अंधेरे में पार्टी के किसी भी दिग्गज नेता को भरोसे में लिए बिना उनकी गैर मौजूदगी में इसे आवागमन के लिए खोल दिया। उन्हें जनता की परेशानियों की कोई फिक्र नहीं थी बल्कि अपने सियासी रसूख की चिंता थी। जिसके चलते वह दिन के उजाले में सीना ठोककर इस पुल के विधिवत उद्घाटन की हिम्मत नहीं जुटा पाए और चोरी-छिपे रात के अंधेरे में यह काम कर डाला। लेकिन ऐसा करते वक्त मेयर यह भूल गए कि भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी इस तरह के कार्यों को कभी स्वीकार नहीं करती है। याद कीजिए वो दिन जब बिथरी विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल ने शहामतगंज पुल का भी इसी तरह उद्घाटन कर दिया था और आज वही पप्पू भरतौल भाजपा में किस तरह से किनारे लगा दिए गए हैं। कहीं उमेश गौतम की ये नादानियां उनके राजनीतिक भविष्य के लिए भी ग्रहण न बन जाएं।
बहरहाल, मेयर उमेश गौतम के इस कृत्य से पूर्व मंत्री राजेश अग्रवाल और कैंट विधायक संजीव अग्रवाल के समर्थकों में आक्रोश व्याप्त हो गया है। मेयर के इस कारनामे ने पार्टी में सुलग रही गुटबाजी की चिंगारी को और भड़का दिया है। कहीं, ये चिंगारी शोला बनकर महानगर भाजपा को ही लपेटे में न ले ले जिसका खामियाजा पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना न पड़ जाए।

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