यूपी

23 नवंबर के बाद बदले जाएंगे सपा, कांग्रेस और भाजपा अध्यक्ष, सपा और कांग्रेस को नए साल तक मिलेगा नया जिला अध्यक्ष तो भाजपा को मिलेगा नया महानगर अध्यक्ष, जानिये क्यों पदों से हटाए जा रहे हैं अध्यक्ष?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का पूरा फोकस उत्तर प्रदेश पर होगा। यहां तीनों पार्टियां अपने-अपने संगठन को मजबूती देने के लिए सांगठनिक स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी कर रही हैं। इसी कड़ी में विवादित और नाकाम जिला एवं महानगर अध्यक्षों को बदला जाएगा। बदलाव का ये नजारा बरेली में भी देखने को मिलेगा। यहां भाजपा के महानगर अध्यक्ष से लेकर सपा और कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बदले जाने हैं। यह पूरी कवायद आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर की जा रही है।
दरअसल, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावी नतीजों के साथ ही 23 नवंबर को यूपी की 9 विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उप चुनाव के भी नतीजे आने हैं। इन नतीजों के बाद तीनों दलों का पूरा फोकस संगठन पर रहेगा क्योंकि संगठन की मजबूती ही यूपी में तीनों दलों का राजनीतिक भविष्य तय करेगी।
बरेली जिले के समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष विभिन्न कारणों के चलते लगातार विवादों में चल रहे हैं। उनके कार्यकाल में पार्टी में गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। विधायकों से लेकर दिग्गज नेताओं के अलग-अलग गुट बन चुके हैं। हाल ही में पार्टी की एक महिला पदाधिकारी ने भी उन पर महिलाओं के अपमान के आरोप लगाए थे। लखनऊ में रंगरेलियां मनाने के आरोप भी उन पर लगते रहे हैं। यहां तक कि बरेली महानगर की टीम से भी उनका तालमेल अच्छा नहीं रहा है। यही वजह है कि पार्टी अब नया जिला अध्यक्ष चुनने जा रही है।

शिवचरण कश्यप, समाजवादी पार्टी

बता दें कि पूर्व जिला अध्यक्ष वीरपाल यादव ही सपा के एकमात्र ऐसे जिला अध्यक्ष रहे थे जिनके लगभग 25 वर्षों के कार्यकाल के दौरान संगठन एकजुट रहा और गुटबाजी इतने निम्न स्तर तक नहीं पहुंची थी। इसी गुटबाजी के चलते इंडिया गठबंधन को हरियाणा में हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी नहीं चाहती कि जो हरियाणा में कांग्रेस के साथ हुआ वो बरेली में सपा के साथ हो। इसलिए नए नेतृत्व पर मंथन तेज हो चुका है और 23 नवंबर को उपचुनाव के नतीजे आने के बाद बरेली सपा जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप की किस्मत का फैसला भी हो जाएगा और नए साल में पार्टी नए जिला अध्यक्ष के साथ एक नए सफर की शुरुआत करेगी।
इसी तरह कांग्रेस जिला अध्यक्ष मिर्जा अशफाक सकलैनी को भी बदलने की चर्चाएं तेज हो चुकी हैं। पार्टी बरेली में संगठन को मजबूत करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए नए नेतृत्व की तलाश की जा रही है। अशफाक सकलैनी पिछले कई साल से कांग्रेस के जिला अध्यक्ष हैं।

मिर्जा अशफाक सकलैनी, कांग्रेस

पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव भी अशफाक सकलैनी के नेतृत्व में ही लड़े थे लेकिन उनकी पार्टी बरेली में कोई बड़ा कारनामा नहीं कर सकी। कई सीटों पर तो कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। अब पार्टी नए नेतृत्व के साथ आगामी विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है।
वहीं, भाजपा में सांगठनिक चुनाव की कवायद पिछले दिनों ही शुरू हो चुकी है। इसके लिए के लक्ष्मण के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर एक कमेटी का भी गठन कर लिया गया है। कमेटी ने अपना काम शुरू कर दिया है। भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और उत्तर प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी भी बदले जाने हैं। साथ ही बरेली महानगर अध्यक्ष अधीर सक्सेना भी बदले जाएंगे।

अधीर सक्सेना, भाजपा

अधीर सक्सेना का कार्यकाल काफी विवादों भरा रहा है। उन पर पार्टी में गुटबाजी को बढ़ावा देने और एक नेता के इशारों पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं। कुछ स्थानीय दिग्गज भी अधीर सक्सेना की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं। वहीं, अधीर सक्सेना के कार्यकाल में भाजपा शहर और कैंट विधानसभा सीटों पर पहले से काफी कमजोर हुई है। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को पिछले लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में काफी कम वोटों के अंतर से जीत मिली है। कैंट विधानसभा सीट पर तो हार-जीत का अंतर महज 3200 वोटों का रह गया है। शहर विधानसभा सीट पर जहां पार्टी को आम तौर पर लोकसभा चुनाव में 30-40 हजार वोटों से जीत मिलती थी और पार्टी कभी 60-70 बूथ से अधिक बूथों पर नहीं हारी वहीं, इस बार पार्टी को यहां 157 बूथों पर हार का सामना करना पड़ा और जीत का अंतर सिमटकर लगभग 18000 वोटों पर आ गया। इसी तरह कैंट विधानसभा सीट पर पार्टी को 142 बूथों पर हार का सामना करना पड़ा है जबकि एक बूथ पर उसे समाजवादी पार्टी के बराबर वोट मिले हैं। कुल मिलाकर महानगर में लगभग दो सौ से भी अधिक बूथ ऐसे हैं जो समाजवादी पार्टी ने भाजपा के पंजे से छीन लिए हैं। इन बूथों पर सपा उम्मीदवार प्रवीन सिंह ऐरन ने जीत हासिल की है। ऐसे में अधीर सक्सेना की छवि खराब हुई है। वह केएम अरोड़ा से मिली विरासत को आगे बढ़ाना तो दूर उसे बरकरार रखने में भी नाकाम साबित हुए हैं। यही वजह है कि पार्टी अधीर सक्सेना की जगह नए नेतृत्व की तलाश कर रही है। नए साल से पहले ही पार्टी की यह तलाश पूरी होने की संभावना है और नए साल में महानगर में एक नई भाजपा देखने को मिल सकती है।

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