नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी में कर्मठ कार्यकर्ताओं और लोकप्रिय नेताओं की कोई कमी नहीं है। संगठन की कमान भी मंझे हुए नेताओं के हाथों में है, इसके बावजूद बरेली महानगर की दोनों विधानसभा सीटों पर उसे लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। तमाम तैयारियों और माहौल बनाने के बावजूद जब भी चुनाव आते हैं तो सपा को महानगर की दोनों सीटों पर मुंह की खानी पड़ती है। लोकसभा चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हो या फिर नगर निगम चुनाव, समाजवादी पार्टी लगातार शिकस्त ही झेलती आ रही है। पार्टी नेता और कार्यकर्ता भले ही इस हार की वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बताते नहीं थकते लेकिन असल वजह पार्टी नेताओं के सरेंडर की मानसिकता और बड़े पैमाने पर गुटबाजी है।
सबसे पहले बात शहर विधानसभा सीट की। यह सीट समाजवादी पार्टी ने आज तक कभी नहीं जीती है लेकिन कांग्रेस के राम सिंह खन्ना यहां से जीते भी थे और मंत्री भी बने थे। समाजवादी पार्टी अब यह मान चुकी है कि वह अब कभी भी यह सीट नहीं जीत पाएगी। शायद यही वजह है कि वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर यहां के सपा नेता बिल्कुल भी सक्रिय नजर नहीं आ रहे। पीडीए पंचायत तो जैसे यहां महज सपना बनकर रह गई है। यहां से टिकट के दावेदारों में भी कोई उत्साह देखने को नहीं मिल रहा। एकमात्र हसीब खान को छोड़ दें तो यहां किसी भी दावेदार ने अब तक कोई भी बड़ा आयोजन नहीं कराया है। गौरव सक्सेना कभी-कभी कुछ हलचल पैदा करते दिखाई देते हैं लेकिन उनके प्रयास भी पौधा लगाने और नगर निगम तक ही सीमित रह जाते हैं। हालांकि उन्होंने कुछ पीडीए पंचायतों का आयोजन किया है। चुनावी बरसात में निकलने वाले सियासी मेढक मॉनसून सीजन में भी बाहर नहीं निकल सके हैं। उन्हें लगता है कि अभी तो चुनाव में काफी वक्त है। यहां के मौजूदा हालात देखकर फिलहाल ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी ने शहर विधानसभा सीट में चुनाव से पहले ही सरेंडर कर दिया है। पीडीए अभियान यहां पहुंचने से पहले ही दम तोड़ने लगा है। इसके विपरीत भाजपा का उत्साह यहां देखते ही बनता है। भाजपा के कायस्थ नेता इस बात से बहुत खुश हैं कि मौजूदा विधायक और मंत्री अरुण कुमार अब 75 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव आते-आते वो 77 के हो जाएंगे तो पार्टी नए लोगों को मौका देगी। ऐसे में सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा और अधीर सक्सेना जैसे नेता अपनी गोटियां सेट करने में लग गए हैं। वहीं, अतुल कपूर जैसे पंजाबी खत्री समाज के नेता अपनी दावेदारी को मजबूती देने में जुट गए हैं।
वहीं, कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी गुटबाजी की भेंट चढ़ती जा रही है। यहां गुटबाजी का सिलसिला उस वक्त शुरू हो गया था जब लोकसभा चुनाव के बाद लखनऊ में आयोजित समाजवादी पार्टी की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बरेली की समीक्षा की थी। इस बैठक में अखिलेश यादव ने अनौपचारिक तौर पर इंजीनियर अनीस अहमद खां को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। इसके बाद इंजीनियर अनीस अहमद खां के घर पर पार्टी नेताओं का जमावड़ा लगना शुरू हो गया। उधर, विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे राजेश अग्रवाल और डॉक्टर अनीस बेग जैसे नेताओं ने अपनी सक्रियता इतनी बढ़ा दी कि उसके आगे इंजीनियर अनीस अहमद खां की तैयारी फीकी पड़ने लगी। परसेप्शन के इस खेल में डॉक्टर अनीस बेग बहुत आगे निकल चुके थे। उन्होंने भाजपा के गढ़ में तमाम पीडीए पंचायतें आयोजित कर डाली जिससे भाजपाइयों में भी हलचल बढ़ गई। राजेश अग्रवाल नगर निगम के मुद्दों के माध्यम से जनता को अपने पक्ष में एकजुट करने में लगे रहे। पूरे महानगर में समाजवादी पार्टी के ये दो चेहरे सुर्खियों में आ गए। विरोधी दावेदारों को यह रास नहीं आया। फिर एंट्री हुई ब्राह्मण नेता समर्थ मिश्रा की। शायद समर्थ मिश्रा के लिए एंट्री का यह शुभ मुहूर्त नहीं था। जैसे ही समर्थ मिश्रा ने पीडीए पंचायत करवाई। अगले ही दिन उन्हीं की पार्टी के कैंट विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष रोहित राजपूत ने समर्थ मिश्रा पर आरोप लगाया कि उन्होंने शराब और अन्य सामान देकर अपने कार्यक्रम में भीड़ इकट्ठा की थी। रोहित राजपूत ने कथित तौर पर वो पर्चियां भी सोशल मीडिया पर वायरल कर दीं जिनका प्रयोग कथित तौर पर शराब और अन्य सामान बांटने के लिए किया गया था। इसके बाद कुछ अज्ञात बदमाश आए और रोहित राजपूत पर जमकर लात-घूंसे बरसाए। अचेत अवस्था में पड़े रोहित राजपूत को परिजन अस्पताल ले गए। रोहित राजपूत ने हमले के लिए सपा नेता समर्थ मिश्रा को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज करा दी। इसके बाद कहानी में नया ट्विस्ट आया। अचानक सोशल मीडिया पर रोहित राजपूत की कथित रिकॉर्डिंग वायरल होने लगी जिसमें रोहित राजपूत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक शब्द कहते सुनाई दे रहे हैं। इसके बाद एक मोदी-योगी का फैन सामने आता है और रोहित राजपूत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी जाती है। यह रिकॉर्डिंग पीडीए पंचायत की बताई जाती है और रोहित राजपूत इसे समर्थ मिश्रा की साजिश करार देते हैं क्योंकि समाजवादी समर्थ के पिता भाजपा नेता हैं।
इस तरह डॉक्टर अनीस बेग और राजेश अग्रवाल पार्टी को आगे बढ़ाने के जिस अभियान को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहे थे उस पर ब्रेक लग जाता है। कालीबाड़ी सहित भाजपा के प्रभाव वाले इलाकों में सपा की जो पैठ बन रही थी वह एक झटके में धूमिल हो जाती है। समाजवादी पार्टी की फिर वही गुंडागर्दी वाली छवि उभरकर सामने आ जाती है। पिछड़े दलित समाज के लोग कहने लगते हैं कि सत्ता में आने से पहले जब पार्टी नेता खुलेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं तो सत्ता में आने के बाद क्या होगा?
पार्टी में टिकट के दावेदारों के अलावा संगठन के पदाधिकारियों के विरोधी गुट भी हावी होने लगे हैं। भाजपा के पक्ष में फिर से माहौल बनने लगा है। रोहित राजपूत यहां तक कह रहे हैं कि अगर उन्हें इंसाफ नहीं मिला तो पार्टी छोड़ने से भी पीछे नहीं हटेंगे। गुटबाजी का यह बवंडर एक बार फिर समाजवादी पार्टी की पराजय के संकेत देने लगा है।

शहर में ‘सरेंडर’, कैंट में ‘गुटबाजी का बवंडर’, अबकी बार भी दोनों सीटें हारने की तैयारी कर रही समाजवादी पार्टी, सपा के लिए नामुमकिन सपना बनकर रह गया है महानगर, जानिये क्या कहते हैं सियासी हालात?




