नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली नगर निगम इन दिनों कानूनी और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण है नगर निगम की अनिवार्य बैठकों का न होना। उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 के अनुसार हर नगर निगम की कम से कम छह सामान्य बैठकें और कार्यकारिणी की 12 बैठकें प्रति वर्ष आयोजित होनी जरूरी है। लेकिन बरेली नगर निगम में वर्ष 2024 में एक सामान्य बैठक आयोजित हुई और उसके बाद अगली बैठक करीब 11 महीने बाद अगस्त 2025 में बुलाई गई। दिलचस्प बात यह भी है कि नियमानुसार सभी पार्षदों को बैठक खत्म होने के बाद उसी दिन कार्य वृत्त दे देना होता है लेकिन अगस्त में हुई बैठक का कार्यवृत्त अभी तक नहीं दिया गया है। हालांकि, इस 11 माह के बीच कुछ विशेष बैठकों का आयोजन किया गया लेकिन उनको मिलाकर भी आंकड़ा अनिवार्य बैठकों के अनुरूप नहीं होता है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन बताती है। वहीं, कार्यवृत्त उपलब्ध कराना नगर आयुक्त की जिम्मेदारी होती है। बता दें कि उमेश गौतम से पहले डॉक्टर आईएस तोमर और सुप्रिया एरन मेयर रहे तो उन्होंने नियमानुसार बैठकें बुलाई थीं।
इस घटनाक्रम ने न सिर्फ निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि महापौर डॉ. उमेश गौतम की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
बता दें कि बरेली नगर निगम प्रदेश के बड़े निगमों में गिना जाता है। यहां की राजनीति का असर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ता है। महापौर पद पर भाजपा का कब्जा है और निगम में भी भाजपा का बहुमत है। इसके बावजूद अगर बैठकें समय पर नहीं हो रही हैं, तो यह सवाल सिर्फ महापौर पर ही नहीं बल्कि पूरी पार्टी की छवि पर असर डाल सकता है।
कानूनविदों का कहना है कि धारा 88 का पालन न करना महज तकनीकी गलती नहीं बल्कि गंभीर उल्लंघन है। अधिनियम में यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि निगम में पारदर्शिता बनी रहे और जनता से जुड़ी समस्याएं नियमित रूप से उठाई जा सकें।
बरेली कॉलेज के राजनीति शास्त्र विभाग के एक प्रोफेसर का कहना है, “अगर बैठकों का आयोजन नहीं होगा तो निगम की जवाबदेही खत्म हो जाएगी। अधिकारियों पर पार्षदों की निगरानी कमजोर होगी और जनता को नुकसान उठाना पड़ेगा।”
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार और शहरी विकास विभाग इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या महापौर से जवाब मांगा जाएगा? क्या कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी? या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा?
कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, यह मामला गंभीर है और विपक्ष तथा नागरिक समूहों के पास इसे अदालत तक ले जाने का विकल्प खुला है। यदि ऐसा होता है तो यह प्रदेश के अन्य नगर निगमों के लिए भी नजीर बन सकता है।
बहरहाल, बरेली नगर निगम में बैठकें समय पर न होने का मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 के अनिवार्य उपबंध का सीधा उल्लंघन है। महापौर पर जिम्मेदारी तय होती है और राज्य सरकार चाहे तो इस मामले में कठोर कार्रवाई कर सकती है।
यह विवाद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या बरेली नगर निगम वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह हैं या फिर वे सिर्फ औपचारिक संस्थान बनकर रह गए हैं?
अधिनियम क्या कहता है?
उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 के इस अनिवार्य उपबंध में साफ लिखा गया है कि हर नगर निगम की कम से कम छह बैठकें सालाना होना आवश्यक है। बैठकें बुलाने की जिम्मेदारी महापौर की होती है। यदि महापौर बैठक बुलाने में असमर्थ हों तो स्थाई समिति के अध्यक्ष बैठक बुला सकते हैं। बैठक की सूचना और कार्यसूची (एजेंडा) कम से कम तीन दिन पहले सभी पार्षदों को भेजना अनिवार्य है। धारा 90 के अनुसार, बैठक की कार्यवाही तभी वैध होगी जब उसमें कम से कम एक-तिहाई (1/3) पार्षदों की उपस्थिति हो। वहीं, धारा 91 और 92 में बैठकों के नोटिस, एजेंडा और कार्यवाही दर्ज करने के नियम दिए गए हैं।
इन प्रावधानों से यह साफ है कि अधिनियम ने नगर निगम की बैठकों को सिर्फ औपचारिकता नहीं बल्कि कानूनी दायित्व माना है।
बरेली में स्थिति क्या रही?
नगर निगम बरेली में 2024 में एक सामान्य बैठक आयोजित की गई। इसके बाद लगभग 11 महीने तक कोई बैठक नहीं हुई और अगस्त 2025 में जाकर अगली बैठक बुलाई गई। इस अवधि में कई अहम मुद्दे- जैसे सफाई व्यवस्था, बजट पर चर्चा, सीवर और जलापूर्ति के कार्य, कूड़ा निस्तारण परियोजना, सड़क निर्माण और पार्कों का रख-रखाव आदि पर चर्चा ही नहीं हो सकी। पार्षदों का कहना है कि जब बैठकें समय पर नहीं होतीं, तो नगर निगम का कामकाज प्रभावित होता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया ठप पड़ जाती है और अधिकारियों पर निगरानी कमजोर हो जाती है।
महापौर की भूमिका पर सवाल
बैठकें बुलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी महापौर की होती है। बरेली में महापौर पद पर भाजपा के डॉ. उमेश गौतम बैठे हैं। आरोप है कि उन्होंने जान-बूझकर बैठकें नहीं बुलाईं ताकि निगम के कार्यों पर सवाल न उठ सकें। विपक्ष का कहना है कि यह “कर्तव्य में लापरवाही” का मामला है। यदि महापौर बैठकों का आयोजन नहीं करते हैं, तो उनकी जवाबदेही तय होती है और यह मामला सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है।
कानूनी पहलू: क्या कार्रवाई संभव है?
यदि कोई नगर निगम अनिवार्य बैठकों का आयोजन नहीं करता है तो इसे अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा। इसके लिए कई स्तरों पर कार्रवाई संभव है। धारा 579 और 580 के तहत यदि कोई नगर निगम अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तो राज्य सरकार उसे नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांग सकती है। जरूरत पड़ने पर निगम को भंग या निलंबित भी किया जा सकता है। चूंकि बैठक बुलाने की जिम्मेदारी महापौर की है, इसलिए यह सीधी उनकी लापरवाही मानी जाएगी। सरकार महापौर को कारण बताओ नोटिस भेज सकती है और गंभीर स्थिति में पद से हटाने तक की कार्रवाई की जा सकती है। चूंकि प्रदेश में सरकार भी भाजपा की ही है, इसलिए कार्रवाई होना संभव नहीं लगता है।
न्यायालय में चुनौती
किसी भी पार्षद या नागरिक के पास यह अधिकार है कि वह हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल करे और नगर निगम को अधिनियम का पालन कराने का आदेश दिलवाए। विपक्षी पार्षदों ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कुठाराघात बताया है। उनका कहना है कि बैठकों में शहर से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा होती है। यदि बैठकें ही न हों तो पार्षदों को जनता की समस्याएं रखने का अवसर नहीं मिलता। उन्होंने भी महापौर पर सवाल उठाए हैं। एक पार्षद का कहना है, “नगर निगम की बैठकें सिर्फ औपचारिकता नहीं होतीं। इन बैठकों में शहर के बजट पर चर्चा, सफाई व्यवस्था की समीक्षा और विकास कार्यों की प्रगति तय होती है। एक साल तक बैठक न होना जनता के साथ धोखा है।”





