यूपी

जिला पंचायत चुनाव : टिकट मैनेजमेंट में नाकाम रही भाजपा, सपा जिला अध्यक्ष भी चूके, निशाने पर अगम मौर्या

नीरज सिसौदिया, बरेली
विधानसभा चुनाव के सेमिफाइनल में बरेली में भारतीय जनता पार्टी टिकट मैनेजमेंट में पूरी तरह नाकाम साबित हुई. वहीं, समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष अगम मौर्या भी चहेतों के प्रेम में कुछ सीटों पर पार्टी का नुकसान करा बैठे. भाजपा के खराब टिकट मैनेजमेंट ने जहां पार्टी को सत्ता में होते हुए भी हार का मुंह देखने पर मजबूर कर दिया वहीं, सपा जिला अध्यक्ष अगम मौर्या के अहम के चलते पार्टी यहां जीतकर भी हार गई है. इतना ही नहीं अगम मौर्या के खिलाफ टिकट पाने में नाकाम और टिकट पाकर भी हार का सामना करने वाले कुछ पार्टी नेताओं ने शिकायतों का एक पुलिंदा तैयार कर बरेली के एक दिग्गज सपा नेता को सौंपकर उनकी बात पार्टी हाईकमान के सामनेे मजबूती से रखने और अगम मौर्या के कारण पार्टी को हुए नुकसान के बारे में बताने की गुहार लगाई है.
दरअसल, भाजपा का सत्ता में होना ही उसके लिए मुसीबत का सबब बन गया. पार्टी का हर नेता यह सोचने लगा कि जिसे भाजपा का टिकट मिलेगा वही जीतेगा. यही वजह रही की पार्टी में बगावत चरम पर आ गई और उसी बगावत ने पार्टी की नैया डुबो दी. बरेली में बगावत का आलम यह था कि पार्टी के आला नेताओं के सामने भी लोगों ने विरोध दर्ज कराया था. पार्टी नेता मौके की नजाकत को नहीं भांप पाए और टिकट का बंटवारा करने के बाद बागियों को मैनेज नहीं कर पाए.

पवन शर्मा

जिन्हें मैनेज करने का दावा किया भी गया वे भी अंदरखाने विरोधियों की मदद करते नजर आए. भाजपा जिला अध्यक्ष पवन शर्मा इन परिस्थितियों को सही तरीके से हैंडल नहीं कर सके. नतीजतन कहीं सपा जीत गई तो कहीं निर्दलीय. पार्टी को यहां मुंह की खानी पड़ी और निर्दलीय प्रत्याशी जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए निर्णायक भूमिका में आ गए.
कुछ ऐसा ही समाजवादी पार्टी के साथ भी हुआ. समाजवादी पार्टी ने भाजपा से ज्यादा सीटें जरूर हासिल कीं मगर अगम मौर्या के खराब टिकट मैनेजमेंट ने पार्टी को बहुमत का आंकड़ा छूने से रोक दिया. वहीं, कुछ सीटें ऐसी भी रहीं जहां सपा के प्रत्याशियों ने अगम मौर्या पर पार्टी उम्मीदवार का अंदरखाने विरोध करने का आरोप लगाया है.

अगम मौर्या

नवाबगंज विधानसभा सीट पर टिकट बंटवारे में अगम मौर्या द्वारा भेदभाव की नीति अपनाने का बड़ा उदाहरण देखने को मिला. बताया जाता है कि यहां टिकट बंटवारे में पूर्व विधायक छोटेलाल गंगवार की पूरी तरह अनदेखी की गई. छोटेलाल गंगवार अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे मगर अगम मौर्या ने उनका पत्ता साफ करवा दिया. इस विधानसभा हलके में कुल आठ सीटें थीं जिनमें से छह सीटों पर उन उम्मीदवारों को उतारा गया जिन पर पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार और अगम मौर्या दोनों सहमत थे लेकिन एक सीट पर अगम मौर्या सहमत नहीं हुए तो भगवत सरन ने अपने चहेते को निर्दलीय मैदान में उतार दिया और सपा प्रत्याशी को मुंह की खानी पड़ी. इसी तरह जिस सीट से छोटेलाल गंगवार अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे थे उस सीट पर भी सपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा और निर्दलीय उम्मीदवार जीत गया. हैरानी की बात तो यह है कि एक पूर्व विधायक को जिला अध्यक्ष ने सात सीटें बांट दीं और दूसरे पूर्व विधायक को इस कदर उपेक्षित रखा कि उसके बेटे तक को टिकट नहीं दिया. अगर छोटेलाल गंगवार के बेटे को टिकट दे दिया जाता तो पार्टी शायद सीट जीत भी सकती थी. अगर पार्टी सीट नहीं भी जीतती तो भी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए छोटेलाल गंगवार को यह कहकर भी मैनेज किया जा सकता था कि उनके बेटे को जिला पंचायत का टिकट दिया गया था लेकिन अगम मौर्या ने ऐसा नहीं किया और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए बगावत का बीज अभी से बो दिया. अब आगामी विधानसभा चुनाव में छोटेलाल फिर से टिकट के लिए दावा ठोकेंगे और टिकट न मिलने पर संभवत: पार्टी प्रत्याशी को अंदरखाने नुकसान भी पहुंचा सकते हैं जैसे कि जिला पंचायत चुनाव में पहुंचाया. बहरहाल, यहां पर छोटेलाल की उपेक्षा से पार्टी को दोहरा नुकसान हुआ और अगम मौर्या की अदूरदर्शी सोच भी सामने आ गई. ऐसा पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का भी मानना है.
इसी तरह अगम मौर्या के न चाहते हुए भी कमल साहू को ऊंची पहुंच के चलते पार्टी ने टिकट तो दे दिया लेकिन अगम मौर्या का पूरी तरह सपोर्ट न मिलने के कारण कमल साहू को हार का सामना करना पड़ा. कमल साहू ने अगम मौर्या पर विरोधी उम्मीदवार का समर्थन करने और पार्टी उम्मीदवार को हराने में अहम भूमिका निभाने का आरोप लगाया है.
अब जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव होना है. ऐसे में दोनों पार्टियां अपना-अपना अध्यक्ष बनाने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं. सपा के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर टिकट बंटवारे में अगम मौर्या का अहम आड़े नहीं आता तो निर्दलीय प्रत्याशी कभी भी किंगमेकर की भूमिका में नहीं आते. अब आलम यह है कि निर्दलीय और बसपा के जिला पंचायत सदस्य जिसके पाले में जाएंगे उसी पार्टी का अध्यक्ष होगा. दिलचस्प पहलू यह है कि सपा के जितने उम्मीदवार जीते हैं उनमें से आधे तो अकेले भगवत सरन गंगवार और महिपाल सिंह यादव खेमे के हैं. ऐसे में अगम मौर्या अपनी कितनी उपयोगिता साबित कर पाए हैं इसका अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है. अगम मौर्या की अदूरदर्शी सोच और कथित अहम के कारण पार्टी आज जीत कर भी हारी हुई नजर आ रही है.
इसी तरह कुछ और उम्मीदवार भी अगम मौर्या के खिलाफ पार्टी हाईकमान से शिकायत की तैयारी कर रहे हैं. इन सभी का आरोप है कि अगम मौर्या ने पार्टी द्वारा प्रत्याशी बनाए जाने के बावजूद उनका अंदरखाने विरोध किया है. इनमें से कई नेताओं ने पार्टी के पूर्व महासचिव और पूर्व प्रवक्ता महेश पांडेय से शिकायत करके उनकी आवाज पार्टी हाईकमान तक पहुंचाने का अनुरोध किया है.

महेश पांडेय, पूर्व महासचिव सपा

बता दें कि महेश पांडेय लगातार 25 साल तक पार्टी के महासचिव रहे और मुलायम सिंह के करीबियों में गिने जाते हैं. वीरपाल सिंह यादव के प्रसपा में जाने के बाद महेश पांडेय ही पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में रह गए हैं. कुछ समय पहले उन्हें झूठे मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया गया था. अब महेश पांडेय जेल से लौट आए हैं और दोबारा से न सिर्फ राजनीति में सक्रिय हो गए हैं बल्कि जिन अधिकारियों ने उन्हें झूठे मामलों में फंसाया था उनके खिलाफ कोर्ट में मोर्चा भी खोल चुके हैं. हाईकमान में मजबूत पकड़ रखने वाले महेश पांडेय का कद राजनीतिक रंजिश में जेल भेजे जाने के बाद हाईकमान की नजरों में और भी बढ़ गया है. ऐसे में अगर महेश पांडेय हाईकमान को सही तरीके से फीडबैक पहुंचाते हैं तो अगम मौर्या की कुर्सी संकट में पड़ सकती है.

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