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पीडीए फार्मूला या पुराना भरोसा, यादवों का दबदबा या पिछड़ों का संतुलन? या मिलेगी दलित चेहरे को कमान, बरेली सपा अध्यक्ष को लेकर दिलचस्प हुआ सियासी घमासान, पढ़ें कौन-कौन है मैदान में?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

समाजवादी पार्टी में बरेली जिला अध्यक्ष पद को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। मंगलवार को पार्टी के जिला सचिव महेंद्र सिंह राजपूत लोधी ने लखनऊ पहुंचकर प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल से मुलाकात की और औपचारिक रूप से अपनी दावेदारी पेश की। यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि बरेली में जिला संगठन भंग होने के बाद पार्टी नए सामाजिक संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहती है और इसी क्रम में नए जिलाध्यक्ष का चयन बेहद अहम होने वाला है।
महेंद्र सिंह राजपूत लोधी पिछड़ा वर्ग से आते हैं और लोधी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और समाजवादी पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनकी दावेदारी का सबसे बड़ा आधार यही है कि अब तक लोधी समाज से किसी भी नेता को बरेली का जिला अध्यक्ष नहीं बनाया गया। उनका कहना है कि जब अन्य पिछड़ा वर्ग के कई समाजों को यह जिम्मेदारी दी जा चुकी है, तो लोधी समाज को इससे वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।
अगर बरेली सपा के इतिहास पर नजर डाली जाए तो यह बात सामने आती है कि अब तक यादव, मौर्य और कश्यप समाज के नेताओं को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। यादव समाज से तो दो-दो बार यह पद गया है। सबसे लंबा कार्यकाल वीरपाल सिंह यादव का रहा, जिन्होंने करीब दो दशक से भी अधिक समय तक बरेली की सपा संगठन की कमान संभाली। इसके बाद शुभलेश यादव भी जिला अध्यक्ष बने और अब एक बार फिर वह इस पद की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं।
यादव समाज से ही अरविंद यादव और संजीव यादव के नाम भी चर्चा में हैं। संजीव यादव को एक युवा और मिलनसार चेहरा माना जाता है। उन्होंने जिला महासचिव सहित पार्टी के कई अहम पदों पर काम किया है और संगठन के भीतर उनकी स्वीकार्यता भी अच्छी मानी जाती है। अगर पार्टी यादव समाज से ही किसी को अध्यक्ष बनाती है तो संजीव यादव को इस दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है।

संजीव यादव

हालांकि यादव समाज के भीतर सबसे मजबूत और प्रभावशाली नेता आज भी वीरपाल सिंह यादव माने जाते हैं। उनकी पकड़ न केवल यादव समाज में है बल्कि सर्वसमाज में भी उनकी पहचान रही है। लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा में एक बड़ा मोड़ तब आया जब अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच पारिवारिक और राजनीतिक मतभेद उभरे। उस दौर में वीरपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी छोड़कर शिवपाल यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) का दामन थाम लिया था। बाद में परिस्थितियां बदलीं और पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए बरेली और पीलीभीत जिले का एसआईआर प्रभारी भी बनाया। इन दोनों ही जगहों पर उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और अब उन्हें पीलीभीत के साथ लखीमपुर जिले की भी जिम्मेदारी सौंप दी गई है। वीरपाल सिंह यादव ने कुछ दिन पहले ही पार्टी हाईकमान को बरेली और पीलीभीत जिले के एसआईआर और बीएलए की रिपोर्ट सौंपी। उनके रिपोर्ट सौंपने के कुछ दिन बाद ही पार्टी ने जिला अध्यक्ष शिवरण कश्यप को पदमुक्त करते हुए पूरी जिला कार्यकारिणी भंग कर दी।

वीरपाल सिंह यादव

इसके बाद अटकलें लगाई जा रही हैं कि यह कार्रवाई वीरपाल सिंह यादव की रिपोर्ट के आधार पर ही हुई है। हालांकि, अन्य यादव नेता इस बात को नकारते हैं। वह कहते हैं कि शिवरचरण कश्यप की छुट्टी में वीरपाल सिंह यादव की कोई भूमिका नहीं रही है।
यादव समाज में एक नाम ऐसा भी है जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है और वह हैं अरविंद यादव। अरविंद यादव को पार्टी का सबसे वफादार सिपाही माना जाता है। पार्टी की स्थापना से लेकर आज तक उन्होंने कभी समाजवादी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है। हालांकि उनकी लोकप्रियता और जनाधार को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग राय है।

अरविंद यादव

सूत्रों की मानें तो इस बार समाजवादी पार्टी यादव समाज पर दोबारा भरोसा जताने के मूड में नहीं है। पार्टी नेतृत्व यह मान रहा है कि यदि सपा को बरेली में नए सिरे से मजबूती देनी है तो उसे गैर-यादव पिछड़ों और दलित वर्ग को आगे लाना होगा। यही वजह है कि महेंद्र सिंह लोधी जैसे नेताओं की दावेदारी को गंभीरता से लिया जा रहा है।
लोधी समाज की बात करें तो बरेली जिले में इस समाज की संख्या कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक मानी जाती है। इसके बावजूद अब तक संगठनात्मक नेतृत्व में इस समाज को शीर्ष स्थान नहीं मिला। महेंद्र सिंह लोधी इसी कमी को आधार बनाकर अपनी दावेदारी रख रहे हैं।

महेंद्र सिंह लाेधी राजपूत

पार्टी के भीतर भी यह माना जा रहा है कि लोधी समाज से फिलहाल उनके कद का कोई दूसरा नेता सपा में सक्रिय नहीं है। यही बात उन्हें अन्य दावेदारों से अलग बनाती है।
गैर-यादव पिछड़ों में साहू समाज का नाम भी प्रमुखता से सामने आ रहा है। साहू समाज से अब तक किसी को बरेली जिला अध्यक्ष नहीं बनाया गया है। इस समाज से कमल साहू का नाम सबसे आगे चल रहा है। कमल साहू युवा हैं, सक्रिय हैं और अपने समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं। उन्होंने भी अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी जता दी है। साहू समाज के भीतर फिलहाल उनके बराबर कोई और चेहरा नहीं माना जा रहा, जिससे उनकी स्थिति मजबूत कही जा सकती है।

कमल साहू

इसके अलावा गंगवार और पटेल यानी कुर्मी समाज भी इस दौड़ में शामिल हैं। हालांकि इस समाज से भगवत सरन गंगवार को पहले ही जिला अध्यक्ष बनाया जा चुका है। भगवत सरन गंगवार पूर्व में सपा सरकार में मंत्री रह चुके हैं और उन्हें जिले की राजनीति का अनुभवी खिलाड़ी माना जाता है। वे न केवल अपने समाज बल्कि सर्वसमाज में स्वीकार्य नेता रहे हैं। संगठन पर उनकी पकड़ और गुटबाजी पर नियंत्रण रखने की क्षमता को आज भी याद किया जाता है। लेकिन चूंकि उनके समाज को पहले ही यह मौका मिल चुका है, इसलिए इस बार पार्टी किसी नए समाज को आगे बढ़ाने पर विचार कर सकती है।

भगवत सरन गंगवार

अगर समाजवादी पार्टी अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले को पूरी मजबूती से लागू करना चाहती है तो जिला अध्यक्ष पद पर किसी दलित चेहरे को लाना भी एक बड़ा संदेश हो सकता है। बरेली में दलित राजनीति की बात करें तो सबसे पहला नाम ब्रह्म स्वरूप सागर का सामने आता है। ब्रह्म स्वरूप सागर को संगठन का कुशल नेता माना जाता रहा है। लेकिन दुर्भाग्य से फरीदपुर विधानसभा सीट से टिकट न मिलने के कारण वे नाराज होकर पिछले विधानसभा चुनावों के बाद सपा छोड़कर बसपा में चले गए थे। बाद में उन्होंने बसपा को भी अलविदा कह दिया।

ब्रह्मस्वरूप सागर

अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ब्रह्म स्वरूप सागर एक बार फिर समाजवादी पार्टी में वापसी की तैयारी कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो सपा को बरेली मंडल में दलित समाज का एक बड़ा और प्रभावी चेहरा मिल सकता है, जिसकी फिलहाल पार्टी में कमी महसूस की जा रही है। उनकी वापसी न केवल संगठनात्मक मजबूती दे सकती है बल्कि पीडीए फार्मूले को भी जमीन पर उतारने में मददगार साबित हो सकती है।
दलित समाज से एक और नाम विजयपाल सिंह का है। विजयपाल सिंह पूर्व विधायक रह चुके हैं और कई बार फरीदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं, हालांकि उन्हें लगातार तीन बार से हार का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के भीतर यह भी चर्चा रही है कि उनकी हार में कहीं न कहीं उनकी ही पार्टी के कुछ नेताओं की भूमिका रही है। ऐसे में एक बार फिर उन्हें विधानसभा का टिकट देना कितना उचित होगा, इस पर सवाल उठते हैं।

विजयपाल सिंह

हालांकि कई नेताओं का मानना है कि विजयपाल सिंह के अनुभव का इस्तेमाल संगठन में किया जाना चाहिए। जिला अध्यक्ष जैसे पद पर उन्हें जिम्मेदारी देने से फरीदपुर क्षेत्र में चल रही गुटबाजी पर स्वतः लगाम लग सकती है। साथ ही इससे दलित समाज को भी एक मजबूत संदेश जाएगा कि सपा उन्हें केवल चुनावी मोहरे के रूप में नहीं, बल्कि संगठनात्मक नेतृत्व में भी हिस्सेदारी देना चाहती है। इनके अलावा दलित चेहरों में एक बड़ा नाम चंद्रसेन सागर का भी है लेकिन वह संगठन की बजाय चुनावी राजनीति को तरजीह देते हैं। वह फरीदपुर विधानसभा सीट से इस समय समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार भी माने जा रहे हैं।
कुल मिलाकर बरेली में समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष पद की लड़ाई अब केवल एक नाम या एक समाज तक सीमित नहीं रही है। यह लड़ाई पार्टी की भविष्य की रणनीति, सामाजिक संतुलन और संगठनात्मक मजबूती से जुड़ गई है। महेंद्र सिंह राजपूत लोधी की लखनऊ में प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात ने इस पूरी प्रक्रिया को और तेज कर दिया है।
अब देखना यह है कि समाजवादी पार्टी नेतृत्व किस दिशा में फैसला करता है। क्या पार्टी इस बार किसी नए समाज को मौका देकर बड़ा राजनीतिक संदेश देगी, या फिर पुराने और आजमाए हुए चेहरों पर ही भरोसा जताएगी? बरेली की राजनीति में यह फैसला आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

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