नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति में समाजवादी पार्टी आज जिस सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, वह विपक्ष की ताकत नहीं बल्कि उसकी अपनी अंदरूनी गुटबाजी है। कभी मजबूत संगठन मानी जाने वाली सपा आज जिले में कई खेमों में बंटी हुई नजर आती है। मुस्लिम और यादव नेतृत्व के अलग-अलग गुट, महानगर और जिला इकाइयों के बीच टकराव और कार्यकर्ताओं की बढ़ती नाराज़गी ने पार्टी की जड़ों को कमजोर कर दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बरेली में समाजवादी पार्टी को अब ऐसा जिला अध्यक्ष चाहिए जो किसी गुट का नहीं, बल्कि पूरे संगठन का चेहरा हो।
पिछले कुछ वर्षों में बरेली में सपा की राजनीति गुटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। एक ओर मुस्लिम नेतृत्व के अलग-अलग खेमे हैं तो दूसरी ओर यादव राजनीति की अपनी खींचतान। बड़े नेताओं की यह आपसी प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे कार्यकर्ताओं तक पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि बूथ स्तर पर संगठन कमजोर पड़ता चला गया। कार्यकर्ता यह तय ही नहीं कर पा रहे कि वे किसके निर्देश मानें। चुनाव आते ही यह गुटबाजी खुलकर सामने आ जाती है और पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है।
इस गुटबाजी को और गहरा किया महानगर और जिला इकाइयों के बीच लगातार चलता टकराव। पहले जिला अध्यक्ष की पकड़ महानगर तक मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ महानगर इकाई ने खुद को अलग और स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। कई बार ऐसा देखा गया कि जिला और महानगर नेतृत्व के बीच तालमेल की जगह टकराव हावी रहा। कार्यक्रमों से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक में खींचतान साफ दिखाई दी। इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं पर पड़ा, जो खुद को उपेक्षित और भ्रमित महसूस करने लगे।
कार्यकर्ताओं की नाराज़गी अब खुलकर सामने आने लगी है। उनका कहना है कि पार्टी में मेहनत करने वालों की सुनवाई नहीं होती, बल्कि गुटों के हिसाब से फैसले लिए जाते हैं। टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक पदों तक में योग्यता से ज्यादा गुटबाजी हावी रहती है। यही वजह है कि कई पुराने और सक्रिय कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हो गए हैं या चुपचाप किनारे बैठ गए हैं। सपा के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक मानी जा रही है, खासकर तब जब आने वाले चुनावों में मुकाबला और कड़ा होने वाला है।
ऐसे हालात में पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि अब बरेली को गुटों से ऊपर उठकर सोचने वाला जिला अध्यक्ष चाहिए। ऐसा नेता जो किसी एक वर्ग या गुट का प्रतिनिधि न होकर पूरे संगठन को साथ लेकर चले। इसी संदर्भ में सपा के महानगर सचिव और लोधी समाज के नेता महेंद्र सिंह लोधी राजपूत का नाम लगातार चर्चा में आ रहा है।
महेंद्र सिंह लोधी की सबसे बड़ी ताकत यही मानी जा रही है कि वे किसी भी मुस्लिम या यादव गुट का हिस्सा नहीं हैं। लोधी समाज से आने के कारण उनकी छवि अपेक्षाकृत संतुलित और तटस्थ नेता की है। यही तटस्थता आज सपा के लिए सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर जिला अध्यक्ष ऐसा हो जो गुटों की राजनीति से दूर रहकर केवल संगठन को प्राथमिकता दे, तो बरेली में सपा को फिर से मजबूती मिल सकती है।
महेंद्र लोधी महानगर संगठन से जुड़े होने के बावजूद अब तक संतुलित भूमिका निभाते आए हैं। वे न तो किसी गुट की खुली राजनीति करते नजर आते हैं और न ही सार्वजनिक मंचों पर विवादित बयानबाजी करते हैं। संगठनात्मक कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उन्हें एक स्वीकार्य चेहरा बनाता है। यही वजह है कि महानगर और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में उनकी पहचान धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।
सपा के अंदरखाने में यह भी चर्चा है कि लोधी समाज का प्रतिनिधित्व पार्टी को एक नया सामाजिक संतुलन दे सकता है। अब तक बरेली में सपा की पहचान मुख्य रूप से मुस्लिम-यादव समीकरण तक सिमटी रही है, लेकिन बदलती राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्गों को साथ लेना जरूरी हो गया है। महेंद्र सिंह लोधी जैसे नेता इस दिशा में पार्टी के लिए सेतु का काम कर सकते हैं।
कुल मिलाकर बरेली में समाजवादी पार्टी के सामने आज असली चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी गुटबाजी है। अगर पार्टी इस गुटबाजी से ऊपर उठकर संगठन को प्राथमिकता देती है और ऐसा जिला अध्यक्ष चुनती है जो सभी को साथ लेकर चल सके, तो हालात बदल सकते हैं। ऐसे में महेंद्र सिंह लोधी राजपूत जैसे नाम पर हो रही चर्चा यह संकेत देती है कि सपा अब गुटों से बाहर निकलकर संगठन को बचाने की सोच रही है। बरेली की सियासत में आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने वाली है कि क्या पार्टी सचमुच गुटबाजी से ऊपर का नेतृत्व चुनने का साहस दिखा पाएगी।

गुटों में बिखरी सपा को बरेली में चाहिए गुटों से ऊपर का जिला अध्यक्ष, महेंद्र सिंह लोधी हो सकते हैं सपा का नया चेहरा, जानिये क्यों?




