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बैंक फंड की हेराफेरी, फर्जी लेखांकन, मनी लॉन्ड्रिंग और बेनामी संपत्तियां, वरिष्ठ भाजपा नेता महेश पांडेय ने बीएल एग्रो समूह को घेरा, पीएमओ से लेकर कैबिनेट सचिव तक पहुंचा मामला, पढ़ें क्या है पूरा खेल?

नीरज सिसौदिया, बरेली
खाद्य तेल और कृषि क्षेत्र की देश की प्रमुख कंपनियों में गिनी जाने वाली बीएल एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। बरेली के वरिष्ठ भाजपा नेता और जिला सहकारी संघ के पूर्व चेयरमैन महेश पांडेय ने कंपनी और उससे जुड़ी समूह इकाइयों के खिलाफ गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और कैबिनेट सचिव को विस्तृत शिकायत भेजी है। इस शिकायत में बैंक फंड के कथित दुरुपयोग, खातों में हेराफेरी, फर्जी लेनदेन, मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्तियों और बैंकिंग नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
महेश पांडेय ने अपनी शिकायत में मांग की है कि बीएल एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उससे जुड़ी कंपनियों का स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए, ताकि कंपनी के वित्तीय लेनदेन और बैंकिंग गतिविधियों की सच्चाई सामने आ सके।
महेश पांडेय की ओर से भेजे गए शिकायत पत्र में दावा किया गया है कि कंपनी ने बैंकों से कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) और अन्य वित्तीय सुविधाएं प्राप्त करने के लिए अपने स्टॉक, कारोबार और देनदारियों के आंकड़ों को वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया हो सकता है।
शिकायत के अनुसार, कंपनी द्वारा बैंकों को प्रस्तुत किए गए स्टॉक विवरण, उत्पादन क्षमता, बिजली और ईंधन की खपत तथा वास्तविक औद्योगिक क्षमता के बीच गंभीर विसंगतियां दिखाई देती हैं। आरोप है कि कंपनी की घोषित बिक्री और कारोबार का स्तर उसकी वास्तविक उत्पादन क्षमता से मेल नहीं खाता।
महेश पांडेय का कहना है कि यदि इन आरोपों की जांच होती है तो यह पता लगाया जा सकता है कि कहीं बैंकों को प्रस्तुत किए गए वित्तीय दस्तावेज कृत्रिम रूप से मजबूत वित्तीय स्थिति दिखाने के लिए तैयार तो नहीं किए गए।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने कारोबार और स्टॉक का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए फर्जी या गैर-वास्तविक खरीद-बिक्री के लेनदेन दर्ज किए हो सकते हैं।
महेश पांडेय का दावा है कि ऐसी प्रविष्टियों के जरिए कंपनी ने अपने टर्नओवर और स्टॉक वैल्यू को बढ़ाकर प्रस्तुत किया, जिससे बैंकों से अधिक वित्तीय सुविधाएं हासिल करने में मदद मिली हो सकती है। उन्होंने कहा कि इन सभी लेनदेन की स्वतंत्र फोरेंसिक जांच आवश्यक है।
शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि कंपनी के लेखा अभिलेखों में असामान्य जर्नल एंट्री, बैकडेटेड रिकॉर्ड, बिना पर्याप्त दस्तावेजों वाले समायोजन और कृत्रिम लेखांकन प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया गया हो सकता है।
महेश पांडेय ने कहा कि कंपनी के वित्तीय विवरणों में स्टॉक वैल्यूएशन, देनदारियों, संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन, राजस्व मान्यता और कार्यशील पूंजी चक्र से जुड़े कई ऐसे बिंदु हैं जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि कंपनी के जीएसटी रिटर्न, ई-वे बिल, टैक्स रिकॉर्ड और ऑडिटेड वित्तीय विवरणों के बीच कई जगह कथित विसंगतियां दिखाई देती हैं।
महेश पांडेय का आरोप है कि यदि इन आंकड़ों का गहन मिलान किया जाए तो कृत्रिम टर्नओवर, फर्जी इनवॉइसिंग, इनपुट-आउटपुट रिकॉर्ड में हेराफेरी और कर कानूनों के संभावित उल्लंघन सामने आ सकते हैं।
शिकायत में सबसे गंभीर आरोपों में से एक मनी लॉन्ड्रिंग और बैंक फंड के कथित डायवर्जन का है। महेश पांडेय का दावा है कि कंपनी और उससे जुड़ी विभिन्न समूह इकाइयों के बीच बड़ी मात्रा में धन का आवागमन हुआ है।
उन्होंने आशंका जताई है कि समूह कंपनियों के माध्यम से धन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाकर वास्तविक उपयोग को छिपाने की कोशिश की गई हो सकती है। शिकायत में इन लेनदेन को “लेयर्ड ट्रांजेक्शन”, “सर्कुलर फंड मूवमेंट” और “अकॉमोडेशन एंट्री” जैसे शब्दों से वर्णित किया गया है।
महेश पांडेय ने शिकायत में यह भी कहा है कि कंपनी, उसके प्रमोटरों और संबद्ध व्यक्तियों के नाम पर मौजूद कुछ चल और अचल संपत्तियों की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने मांग की है कि यह पता लगाया जाए कि इन संपत्तियों को खरीदने में इस्तेमाल धन का स्रोत क्या था और कहीं ये संपत्तियां बेनामी संपत्ति कानून के दायरे में तो नहीं आतीं। शिकायत में बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम के तहत जांच कराने की मांग की गई है।
शिकायत केवल कंपनी तक सीमित नहीं है। महेश पांडेय ने उन बैंकों और बैंक अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है जिन्होंने कंपनी को वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध कराईं। उन्होंने कहा है कि यदि कंपनी के वित्तीय दस्तावेजों में इतनी बड़ी विसंगतियां थीं तो फिर बैंकिंग संस्थानों ने उन्हें समय रहते क्यों नहीं पकड़ा। शिकायत में रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के पालन, स्टॉक सत्यापन, ड्रॉइंग पावर के आकलन और फंड के वास्तविक उपयोग की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
महेश पांडेय ने अपनी शिकायत में मांग की है कि बीएल एग्रो और उससे जुड़ी कंपनियों के खातों, बैंकिंग लेनदेन, स्टॉक रिकॉर्ड, उत्पादन रिकॉर्ड, जीएसटी रिटर्न, कर विवरणों और संबंधित पक्षों के साथ हुए लेनदेन का विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए।
उन्होंने यह भी मांग की है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो कंपनी अधिनियम 2013, आयकर अधिनियम 1961, जीएसटी कानून, धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) और भारतीय दंड कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए।
फिलहाल यह ध्यान देने योग्य है कि महेश पांडेय द्वारा लगाए गए ये सभी आरोप शिकायत पत्र में दर्ज दावे हैं। इन आरोपों की किसी सक्षम सरकारी एजेंसी या न्यायिक मंच द्वारा अभी पुष्टि नहीं हुई है। बीएल एग्रो इंडस्ट्रीज की ओर से भी इस शिकायत पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह मामला राजनीतिक और कारोबारी दोनों हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार, पीएमओ, वित्तीय नियामक संस्थाएं और जांच एजेंसियां इस शिकायत पर क्या रुख अपनाती हैं और क्या किसी प्रकार की प्रारंभिक जांच या फोरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया जाता है। यदि शिकायत में उठाए गए मुद्दों की जांच होती है, तो यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बैंकिंग निगरानी, कॉरपोरेट गवर्नेंस और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े बड़े सवालों को भी केंद्र में ला सकता है। इस संबंध में जब बीएल एग्रो के मालिक घनश्याम खंडेलवाल का पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उनसे संपर्क नहीं हो सका। अगर वह चाहें तो मोबाइल नंबर 6284370451 पर वॉट्सऐप या ईमेल एड्रेस indiatime24x7@gmail.com पर अपना पक्ष लिखित रूप से भेज सकते हैं, हम उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे।

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