नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली के मेयर उमेश गौतम हर छोटे-बड़े कार्यक्रम और सार्वजनिक मंचों से यह दावा करते नहीं थकते कि उन्होंने बरेली की तस्वीर बदल दी है। उनके मुताबिक शहर में जितना विकास उनके कार्यकाल में हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ। हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों की ओर से उन्हें ‘विकास पुरुष’ बताते हुए सैकड़ों पोस्ट भी देखने को मिलीं। लेकिन रविवार को हुई मूसलाधार बारिश ने इन दावों की ऐसी परीक्षा ली कि बरेली की सड़कों पर दिखाई दिया ‘विकास’ खुद कई सवाल खड़े कर गया।
बारिश के बाद शहर के तमाम इलाकों में जलभराव की तस्वीरें सामने आईं। कहीं सड़कें तालाब बन गईं तो कहीं वाहन पानी में फंसे नजर आए। कई जगह लोग घुटनों तक पानी में चलने को मजबूर हुए। सवाल यह है कि जिस शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के दावे किए जाते हैं, वहां बारिश के कुछ घंटों में ही सड़कें स्विमिंग पूल में तब्दील क्यों हो जाती हैं?
हैरानी की बात यह रही कि सोशल मीडिया पर उमेश गौतम को ‘विकास पुरुष’ बताने वाले उनके समर्थकों में से शायद ही किसी ने इस ‘विकास की गंगा’ की तस्वीरें साझा की हों। आखिर साझा करते भी कैसे? जिस विकास की तस्वीरें पोस्ट कर वे सोशल मीडिया पर वाहवाही बटोर रहे थे, रविवार को वही विकास पानी में डूबा नजर आया।
हजियापुर से लेकर सुभाष नगर और पुराने शहर से लेकर बिहारीपुर तक कई इलाकों में बारिश का पानी सड़कों पर जमा हो गया। कई जगह हालात ऐसे बने कि सड़क और नाले के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया। वाहन चालकों को पानी के बीच से गुजरना पड़ा। बच्चे और स्थानीय लोग भी जलभराव के बीच परेशान होते नजर आए।
यह तस्वीरें उस बरेली की हैं जिसे स्मार्ट सिटी के नाम पर आधुनिक सुविधाओं वाला शहर बनाने के दावे किए जाते हैं। सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि शहर का ड्रेनेज सिस्टम इतना मजबूत है तो सामान्य बारिश में ही सड़कों पर इतना पानी क्यों भर जाता है?
सबसे गंभीर तस्वीर बरेली कॉलेज के पास देखने को मिली, जहां एक मजबूत मानी जाने वाली सड़क का हिस्सा अचानक धंस गया। इससे लोगों की जान पर बन आई। सड़क धंसने की घटना ने निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और उनके रखरखाव पर भी सवाल खड़े कर दिए।
शहर में विकास कार्यों के नाम पर लगातार सड़कें बनाई और तोड़ी जाती हैं। ऐसे में जनता का सवाल है कि आखिर इन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी कौन करता है? सड़क बनने के कुछ समय बाद ही यदि वह धंसने लगे या बारिश में उसका ढांचा जवाब देने लगे तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
बारिश के बाद जलभराव की स्थिति का राजनीतिक रंग भी देखने को मिला। समाजवादी पार्टी की नेता और बरेली कैंट विधानसभा सीट से टिकट की दावेदार शम्यून खान ने कैंट विधानसभा क्षेत्र की जलमग्न सड़क से लाइव वीडियो बनाकर हालात को सोशल मीडिया पर सामने रखा। वीडियो में सड़क पर जमा पानी ने शहर के विकास के दावों पर सवाल खड़े कर दिए।
यह सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं है। जलभराव का सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है। दुकानदारों का कारोबार प्रभावित होता है, राहगीरों को परेशानी होती है, वाहन खराब होते हैं और कई बार गहरे पानी के कारण दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

बरेली में जलभराव कोई नई समस्या नहीं है। वर्षों से हर बरसात में शहर के तमाम इलाकों में यही तस्वीर दिखाई देती रही है। नगर निगम के चुनाव आते हैं, जलभराव खत्म करने के वादे होते हैं, नए मेयर आते हैं और विकास के दावे किए जाते हैं, लेकिन बारिश आते ही पुरानी तस्वीर फिर सामने आ जाती है।
बरेली को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों और परियोजनाओं की चर्चा होती रही है। इसके बावजूद यदि बारिश के बाद शहर की प्रमुख सड़कें जलमग्न हो जाएं, तो जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ जमीन पर कितना पहुंचा?
हाल ही में उमेश गौतम और उनके बेटे पार्थ गौतम की पार्थ फाउंडेशन की ओर से आयोजित रक्षाबंधन समारोह के दौरान हुई भगदड़ के बाद उमेश गौतम को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई थी। इसके बाद उनके समर्थकों की ओर से लगातार ऐसी पोस्ट सामने आईं जिनमें उन्हें ‘विकास पुरुष’ बताते हुए उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्यों की तारीफ की गई।
लेकिन अब जब बारिश ने शहर की सड़कों को पानी से भर दिया तो वही सोशल मीडिया ब्रिगेड खामोश नजर आई। सवाल यह है कि अगर यह वास्तव में उमेश गौतम के विकास की तस्वीर है तो उनके समर्थक इसे जनता के सामने रखने से क्यों बच रहे हैं?

बरेली की जनता को नेताओं के दावों और सोशल मीडिया की तारीफों से ज्यादा जरूरत जमीन पर दिखाई देने वाले विकास की है। जनता चाहती है कि सड़कें मजबूत हों, जलभराव की समस्या खत्म हो, नालियां और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त हों और बारिश के दौरान शहर ठप न हो।
अपने मुंह से अपनी तारीफ करना या समर्थकों से तारीफ करवाकर ‘विकास पुरुष’ जैसी उपाधियां हासिल करना किसी भी जनप्रतिनिधि की सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। असली पैमाना तो जनता की जिंदगी में आया बदलाव है।
रविवार की बारिश ने कम से कम इतना जरूर दिखा दिया कि बरेली में जलभराव की समस्या अभी भी गंभीर है। सड़क धंसने की घटना ने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए और पानी में डूबी सड़कें स्मार्ट सिटी के दावों की वास्तविकता पर सवालिया निशान लगा गईं।

अब सवाल बरेली की जनता पूछ रही है—अगर इतना विकास हुआ है तो बारिश आते ही शहर पानी-पानी क्यों हो जाता है? अगर ड्रेनेज सिस्टम बेहतर हुआ है तो सड़कें तालाब क्यों बनती हैं? और अगर निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण हैं तो सड़कें धंसती क्यों हैं?
इन सवालों का जवाब सोशल मीडिया की पोस्ट से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले काम से देना होगा।




