नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ बरेली कैंट विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के भीतर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। इस सीट पर संभावित चेहरों को लेकर चर्चा के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता हर्षवर्धन का राजनीतिक सफर खास तौर पर ध्यान खींच रहा है। करीब 28 वर्षों तक संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालने के बाद अब हर्षवर्धन चुनावी राजनीति में सीधे पदार्पण की तैयारी में नजर आ रहे हैं। संगठन में लंबी पारी, बूथ से लेकर लोकसभा तक चुनावी प्रबंधन का अनुभव और बड़े नेताओं की रैलियों की कमान संभालने का अनुभव उनकी राजनीतिक प्रोफाइल को खास बनाता है।

हर्षवर्धन का राजनीतिक सफर वर्ष 1998 में युवा मोर्चा के मंडल मंत्री के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद वर्ष 2000 से 2010 तक उन्होंने महानगर में युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष और प्रदेश कार्यसमिति सदस्य की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2010 में उन्हें युवा मोर्चा का बरेली जिलाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2013 से 2016 तक वह पांचाल क्षेत्र में युवा मोर्चा के क्षेत्रीय अध्यक्ष रहे। संगठन में लगातार सक्रियता का ही परिणाम रहा कि वर्ष 2016 में उन्हें ब्रज क्षेत्र में भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया गया। इसी दौरान परिवर्तन यात्रा में ब्रज क्षेत्र के सह संयोजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी उन्हें मिली।
संगठन में जिम्मेदारियों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। हर्षवर्धन ने चुनावी प्रबंधन में भी अपनी उपयोगिता साबित की। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बिथरी चैनपुर विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी के तौर पर काम किया। उसी वर्ष हुए निकाय चुनाव में उन्हें पीलीभीत जिले की जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 2019 में वह बदायूं लोकसभा के प्रभारी रहे। इसी लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहराइच, आजमगढ़ और मऊ में आयोजित रैलियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली।

बड़े राजनीतिक आयोजनों और चुनावी अभियानों के प्रबंधन का अनुभव उनकी राजनीतिक यात्रा का अहम हिस्सा रहा है। वर्ष 2019 में वह ब्रज क्षेत्र के सदस्यता प्रमुख रहे। वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के पक्ष में चलाए गए अभियान में ब्रज क्षेत्र के संयोजक की भूमिका निभाई। इसी दौरान भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की आगरा रैली के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उनके पास रही।
वर्ष 2021 से 2023 तक उन्होंने कासगंज जिले के प्रभारी के तौर पर संगठन का काम संभाला। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कासगंज जिले में चुनावी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रबंधन का काम भी किया। वर्ष 2023 में उन्हें एटा जिले का प्रभारी बनाया गया। लोकसभा चुनाव के दौरान वह एटा लोकसभा क्षेत्र में प्रवासी के रूप में सक्रिय रहे। चुनाव के अंतिम चरण में वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में बूथ प्रबंधन और सेवापुरी विधानसभा में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई।
यानी हर्षवर्धन का संगठनात्मक अनुभव केवल पद संभालने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अलग-अलग चुनावों में मैदान पर उतरकर संगठन की रणनीति को अमल में लाने का काम किया। बरेली से लेकर पीलीभीत, बदायूं, कासगंज, एटा और वाराणसी तक अलग-अलग चुनावी परिस्थितियों में काम करने का अनुभव उनकी राजनीतिक पूंजी माना जा सकता है।

अब सवाल यह है कि करीब तीन दशक तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद हर्षवर्धन आर्य चुनावी राजनीति में क्यों कदम बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं? इसके संकेत उनके पुराने राजनीतिक सफर में भी मिलते हैं। वर्ष 2000 में उन्होंने वार्ड सभासद के टिकट के लिए प्रयास किया था, लेकिन टिकट नहीं मिला। वर्ष 2016 में बरेली महानगर अध्यक्ष पद के लिए उनका नाम चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने अनुसूचित जाति से अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया और उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं मिली। वर्ष 2022 में उन्होंने बरेली कैंट विधानसभा सीट से टिकट मांगा, लेकिन पार्टी ने उन्हें मौका नहीं दिया।
इसके बावजूद उन्होंने संगठन के प्रति अपनी सक्रियता बनाए रखी। वर्ष 2022 में बरेली-रामपुर स्थानीय निकाय सीट से भी टिकट का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। वर्ष 2023 में संगठनात्मक गठन के दौरान क्षेत्र अध्यक्ष पद के लिए इच्छा जताई, लेकिन पार्टी के निर्णय को स्वीकार किया। इसके बाद भी संगठन में उनकी सक्रियता बनी रही और वर्ष 2016 से 2025 तक लगातार तीन बार ब्रज क्षेत्र में उपाध्यक्ष के तौर पर काम करने का दावा उनकी लंबी संगठनात्मक भूमिका को दर्शाता है। वर्तमान में भी वह एटा जिले के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां 2027 की राजनीति में हर्षवर्धन का अगला कदम महत्वपूर्ण हो जाता है। लंबे समय तक संगठन में काम करने के बाद यदि वह विधानसभा चुनाव के जरिए सक्रिय चुनावी राजनीति में प्रवेश करते हैं तो यह उनके राजनीतिक सफर का स्वाभाविक विस्तार माना जाएगा।

कैंट विधानसभा सीट के सामाजिक समीकरण भी हर्षवर्धन आर्य के राजनीतिक प्रोफाइल को अलग महत्व देते हैं। वैश्य समाज से आने वाले हर्षवर्धन के लिए यह सामाजिक आधार एक महत्वपूर्ण पक्ष हो सकता है। भाजपा ने अतीत में इस सीट पर वैश्य समाज से आने वाले नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा है। ऐसे में यदि पार्टी 2027 में किसी नए चेहरे को मौका देने की रणनीति बनाती है तो हर्षवर्धन का संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक पृष्ठभूमि दोनों समीकरण उनके पक्ष में जा सकते हैं।
उनकी खासियत यह भी है कि वह केवल स्थानीय संगठन तक सीमित नेता नहीं रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों से लेकर जेपी नड्डा के बड़े कार्यक्रमों तक चुनावी और राजनीतिक आयोजनों के प्रबंधन का अनुभव उनके खाते में है। अलग-अलग जिलों के प्रभारी के रूप में काम करने से उन्हें विभिन्न क्षेत्रों की राजनीतिक परिस्थितियों और संगठनात्मक तंत्र को समझने का अवसर मिला है। बूथ प्रबंधन से लेकर लोकसभा स्तर के चुनाव संचालन तक उनकी भूमिका रही है।
भाजपा में टिकट का फैसला कई स्तरों पर होने वाले मंथन के बाद होता है और अभी 2027 के लिए किसी सीट पर उम्मीदवार को लेकर आधिकारिक तस्वीर सामने नहीं आई है। लेकिन कैंट में संभावित चेहरों की चर्चा के बीच हर्षवर्धन आर्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब पार्टी किसी ऐसे चेहरे की तलाश करे जो संगठन को गहराई से समझता हो और चुनावी प्रबंधन में भी अनुभवी हो।

हर्षवर्धन की कहानी फिलहाल संगठन से चुनावी राजनीति की ओर बढ़ते एक ऐसे नेता की कहानी है, जिसने करीब 28 साल तक पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर काम किया, कई बार टिकट और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए प्रयास किया, लेकिन हर बार पार्टी के फैसले को स्वीकार करते हुए संगठन में अपनी सक्रियता जारी रखी। अब 2027 का चुनाव उनके राजनीतिक सफर को एक नया मोड़ दे सकता है।




