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बरेली कैंट नहीं शहर विधानसभा सीट से जीत सकता है सपा का मुस्लिम चेहरा, कैंट से ज्यादा शहर में हैं मुस्लिम मतदाता, 6000 से अधिक यादव और लगभग 50 हजार मतदाता आते हैं पीडीए से,  इसलिए सबसे मजबूत है शहर विधानसभा अध्यक्ष हसीब खान की दावेदारी, जानिये क्या कहते हैं शहर और कैंट विधानसभा सीटों के आंकड़े?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली की राजनीति में 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उन सीटों की है जहां सामाजिक समीकरण किसी खास दल की चुनावी रणनीति को नई दिशा दे सकते हैं। इनमें बरेली शहर और बरेली कैंट विधानसभा सीट खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बड़ी है, लेकिन एसआईआर के बाद उपलब्ध आंकड़ों को सामने रखकर देखें तो मुस्लिम उम्मीदवार के लिए शहर विधानसभा सीट में कैंट की तुलना में अधिक बड़ा संख्यात्मक आधार दिखाई देता है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के टिकट की दौड़ में बरेली शहर सीट से हसीब खान की दावेदारी राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय बनती जा रही है।


एसआईआर के बाद जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र में कुल 3,51,057 मतदाता हैं, जिनमें 1,40,300 मुस्लिम मतदाता बताए गए हैं। यानी मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी बैठती है। वहीं सितम्बर तक इन आंकड़ों में लगभग 5 हजार की बढ़ोतरी दर्ज की गई है जिसके बाद यह आंकड़ा लगभग 41.30 प्रतिशत हो जाता है।
दूसरी ओर, बरेली कैंट में एसआईआर के बाद वोटों का कुल आंकड़ा लगभग 2 लाख 83 हजार था जो सितम्बर माह तक बढ़कर 2.94 लाख बताया जा रहा है। इनमें मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 1.15 लाख बताई जा रही है, जो करीब 39 फीसदी बैठती है।
अब अगर दोनों का अंतर निकाला जाए तो शहर विधानसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का आंकड़ा कैंट विधानसभा सीट से लगभग दो प्रतिशत अधिक** है। संख्या में तस्वीर और बदल जाती है। शहर में मुस्लिम मतदाता कैंट के मुकाबले करीब 30 हजार अधिक** हैं। यही करीब 30 हजार का अंतर 2027 के चुनावी गणित में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर समाजवादी पार्टी शहर विधानसभा सीट से हसीब खान जैसे मुस्लिम नेता को मैदान में उतारती है जो दलितों और पिछड़ों में भी पैठ रखते हैं तो शहर सीट जीतना सपा के लिए आसान हो सकता है।

शहर का समीकरण सिर्फ मुस्लिम वोट तक सीमित नहीं
शहर सीट को मुस्लिम उम्मीदवार के लिए संभावित रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला दूसरा पहलू इसका सामाजिक गठजोड़ है। उपलब्ध जातिवार आंकड़ों में यहां करीब 6,670 यादव मतदाता भी बताए जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी की पारंपरिक राजनीति में मुस्लिम और यादव मतदाताओं का गठजोड़ महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में किसी मुस्लिम सपा उम्मीदवार के सामने चुनौती सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की नहीं होगी, बल्कि यादव और अन्य गैर-भाजपा मतदाताओं के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बनाने की होगी। इसके अलावा सपा के पीडीए फाॅर्मूले का लाभ भी यहां पार्टी उम्मीदवार को मिल सकता है। इस सीट पर लगभग 50 हजार मतदाता पिछड़े वर्ग से और लगभग 22 हजार मतदाता दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।
यही वह बिंदु है जहां शहर और कैंट के बीच राजनीतिक अंतर दिखाई देता है। शहर में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ज्यादा होने के साथ सपा के पारंपरिक यादव आधार और पीडीए का आंकड़ा भी सामने आता है। इसलिए सपा यदि शहर सीट से मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो उसके सामने एक संभावित सामाजिक समीकरण मौजूद होगा, जिसे पार्टी चुनावी रणनीति में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकती है जो कैंट में नहीं होगा।
हालांकि यह गणित अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। मतदाताओं का बूथवार वितरण, मतदान प्रतिशत, गैर-मुस्लिम मतदाताओं का रुझान, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय मुद्दे और भाजपा के प्रत्याशी समेत कई कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित करेंगे।

हसीब खान के लिए क्यों अहम है शहर सीट?

इसी पूरे समीकरण के बीच हसीब खान का नाम खास महत्व हासिल करता है। बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जुड़े हसीब खान को 2027 के लिए टिकट के प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है। वह शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं और संगठन में 15 साल से भी अधिक समय से उनकी सक्रियता उन्हें दूसरे दावेदारों से अलग आधार देती है।


हसीब खान की दावेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शहर सीट पर पार्टी के सामने केवल मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का सवाल नहीं है, बल्कि ऐसा चेहरा चुनने का सवाल है जो मुस्लिम मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता के साथ पार्टी के अन्य सामाजिक आधार को भी जोड़ सके। यानी हसीब खान के लिए चुनौती और अवसर दोनों एक साथ हैं। यदि सपा उन्हें उम्मीदवार बनाती है तो उन्हें मुस्लिम मतदाताओं के बड़े आधार को अपने पक्ष में लामबंद करने के साथ यादव और अन्य सामाजिक समूहों में भी पैठ बनानी होगी। यही चुनावी रणनीति उनके लिए टिकट मिलने की स्थिति में सबसे बड़ी कसौटी होगी।
शहर में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या बड़ी होने के बावजूद 2022 में भाजपा ने स्पष्ट बढ़त हासिल की थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि शहर सीट का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाताओं की संख्या से तय नहीं होता। भाजपा का अपना सामाजिक आधार और संगठन यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन 2027 में यदि सपा मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबले का सामाजिक समीकरण 2022 से अलग हो सकता है। खासकर तब, जब सपा अपने मुस्लिम आधार को यादव और अन्य विपक्षी मतदाताओं के साथ जोड़ने में सफल होती है।
अब सवाल यह है कि किस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या, सामाजिक गठजोड़ और उम्मीदवार की राजनीतिक जमीन एक-दूसरे के ज्यादा करीब बैठती है। इसी कसौटी पर शहर सीट फिलहाल सपा के मुस्लिम उम्मीदवार के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देती है। यहीं हसीब खान की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। संगठन में सक्रिय रहने के कारण उनके सामने पार्टी के पारंपरिक मतदाता आधार को उम्मीदवार के पीछे जोड़ने की चुनौती होगी।

शहर बनाम कैंट: आंकड़े क्या कहते हैं?

बरेली शहर और कैंट के आंकड़ों के लिहाज से शहर में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30,000 बैठती है। यही अंतर सपा की टिकट रणनीति में महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि पार्टी का लक्ष्य मुस्लिम उम्मीदवार के जरिए मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से को एकजुट करना है तो संख्या के लिहाज से शहर का आधार कैंट से काफी बड़ा है। और यदि इसके साथ यादव तथा अन्य गैर-भाजपा मतदाताओं का समर्थन जुड़ता है तो शहर में एक व्यापक सामाजिक समीकरण बनाने की संभावना मौजूद है। फिर भी इसे सीधे तौर पर जीत की संभावना के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, बूथ प्रबंधन, मतदान प्रतिशत, स्थानीय मुद्दे और विरोधी उम्मीदवार की ताकत जैसे कारक निर्णायक हो सकते हैं।

2027 में टिकट का फैसला बनेगा बड़ा संदेश
इस समय सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि समाजवादी पार्टी शहर और कैंट में अपनी रणनीति किस तरह तय करती है। कैंट में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा आधार मौजूद है, लेकिन शहर में संख्या उससे आगे है। शहर में यादव मतदाताओं का आंकड़ा भी सपा के पारंपरिक सामाजिक समीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
ऐसे में शहर सीट से हसीब खान की दावेदारी सिर्फ एक संभावित मुस्लिम उम्मीदवार की दावेदारी नहीं रह जाती, बल्कि सपा के सामने मुस्लिम और यादव सामाजिक आधार को एक साथ साधने की रणनीति का सवाल बन जाती है।

फिलहाल एसआईआर के बाद उपलब्ध आंकड़ों ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि बरेली शहर और कैंट के बीच मुस्लिम मतदाताओं की संख्या का अंतर अब राजनीतिक चर्चा का महत्वपूर्ण विषय है। कैंट में करीब 1.15 लाख मुस्लिम मतदाताओं के मुकाबले शहर में 1.45 लाख मुस्लिम मतदाता बताए जा रहे हैं। ऐसे में यदि सपा मुस्लिम उम्मीदवार के जरिए चुनावी समीकरण साधने की रणनीति अपनाती है तो शहर सीट उसके लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आती है।
अब देखना यह है कि सपा नेतृत्व इस संख्या को केवल आंकड़ा मानता है या इसे 2027 की टिकट रणनीति का आधार बनाता है। शहर सीट पर हसीब खान की सक्रियता और दावेदारी ने इस सवाल को और दिलचस्प बना दिया है।

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