नीरज सिसौदिया, बरेली
राजनीति में चुनावी टिकट की दावेदारी केवल संगठन में पकड़, जनसंपर्क और राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होती। दावेदार का सार्वजनिक आचरण और मुश्किल वक्त में उसकी भूमिका भी कसौटी पर होनी चाहिए। बरेली शहर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट की दावेदारी कर रहे वरिष्ठ नेता अनुपम कपूर के सामने भी अब यही सवाल खड़ा हो रहा है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान उनके विनायक अस्पताल में मरीजों से कथित तौर पर शासन की निर्धारित दरों से अधिक रकम वसूलने के आरोप लगे थे। उस समय मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतें सामने आई थीं। अब जब अनुपम कपूर विधायक बनने की दावेदारी कर रहे हैं तो उन आरोपों पर जवाबदेही का सवाल फिर उठना स्वाभाविक है।
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश में स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव था। अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और इलाज के लिए लोग परेशान थे। इसी दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अस्पतालों से मरीजों के प्रति संवेदनशील रहने की अपील की थी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कोविड मरीजों के इलाज तथा अस्पतालों की व्यवस्थाओं की लगातार समीक्षा की थी। सरकार ने निजी अस्पतालों में इलाज के लिए दरें भी निर्धारित की थीं, ताकि महामारी के दौरान मरीजों से मनमानी वसूली न हो। लेकिन विनायक अस्पताल के दो मामलों में सामने आए आरोपों ने सरकारी निर्देशों के पालन पर सवाल खड़े किए थे।
पहला मामला सेवानिवृत्त बैंककर्मी मुकेश अग्रवाल का था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्हें दो मई 2021 को बुखार आया था। एंटीजन जांच में कोरोना संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन उनका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिर रहा था। परिजनों ने चार मई को उन्हें विनायक अस्पताल में भर्ती कराया। उन्हें जनरल वार्ड में रखा गया। सात मई को उनकी कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें आईसीयू में शिफ्ट करने की सलाह दी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने बेड खाली न होने की बात कहकर दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया।
तीन दिन के इलाज के बाद अस्पताल ने परिजनों को करीब 96,540 रुपये का बिल थमा दिया। उस समय शासन की ओर से बिना ऑक्सीजन वाले आइसोलेशन बेड का शुल्क आठ हजार रुपये प्रतिदिन निर्धारित था, जबकि अस्पताल के बिल में 15 हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से बेड चार्ज लगाए जाने की बात सामने आई थी। इसके अलावा 10 हजार रुपये क्रिटिकल केयर और ऑक्सीजन के लिए प्रतिदिन 4,500 रुपये अलग से लेने का आरोप भी लगा था। तत्कालीन मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एसके गर्ग का कहना था कि ऑक्सीजन का अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जा सकता।
इस मामले को सपा के तत्कालीन महानगर महासचिव गौरव सक्सेना ने उठाया था लेकिन बाद में वह पीछे हट गए थे। इसके बाद सपा के पूर्व जिला महासचिव महेश पांडेय की ओर से सीएमओ को लिखित शिकायत दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। बताया गया कि विवाद बढ़ने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने मरीज के परिजनों को कुछ रकम वापस की। हालांकि, इस पूरे मामले में अस्पताल के खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी। बाद में मुकेश अग्रवाल की मौत हो गई थी।
दूसरा मामला पीलीभीत के अनूप अग्रवाल की शिकायत से जुड़ा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि 27 अप्रैल 2021 को अपने 48 वर्षीय भाई नवनीत अग्रवाल को कोरोना संक्रमण के बाद विनायक अस्पताल में भर्ती कराया था। अस्पताल में दाखिले के समय ही तीन हजार रुपये रजिस्ट्रेशन शुल्क और प्रतिदिन 13 हजार रुपये बेड चार्ज लिया गया। जबकि उस समय शासन की निर्धारित दरें नॉन-एनएबीएच अस्पतालों के लिए आठ हजार और एनएबीएच अस्पतालों के लिए 10 हजार रुपये प्रतिदिन थीं। सरकारी निर्देशों के मुताबिक बेड शुल्क में ऑक्सीजन का खर्च भी शामिल था। इसके बावजूद अतिरिक्त रकम वसूले जाने का आरोप लगा। यह मामला भी सुर्खियों में आया, लेकिन बाद में समझौते की बात सामने आई और कार्रवाई का कोई स्पष्ट नतीजा सार्वजनिक नहीं हुआ।
इन दोनों मामलों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि आरोप महामारी जैसे असाधारण संकट के समय लगे थे। उस वक्त मरीजों के परिवार अपने परिजनों की जान बचाने के लिए अस्पतालों के सामने मजबूर थे। ऐसे में निर्धारित दरों से अधिक शुल्क लेने के आरोप केवल बिलिंग का विवाद नहीं थे, बल्कि निजी अस्पतालों की जवाबदेही और मरीजों के अधिकारों से जुड़े सवाल थे। हालांकि, इन आरोपों को अंतिम रूप से साबित हुआ तथ्य मानने से पहले संबंधित शिकायतों, बिलों और प्रशासनिक जांच के निष्कर्षों को देखना भी जरूरी है। अनुपम कपूर और अस्पताल प्रबंधन का इन आरोपों पर पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
अब सवाल यह है कि भाजपा शहर विधानसभा सीट के लिए उम्मीदवार तय करते समय इन पुराने विवादों को किस नजर से देखेगी? क्या केवल राजनीतिक सक्रियता, संगठन में प्रभाव और चुनावी समीकरण ही टिकट का आधार होंगे, या सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और संकट के समय का आचरण भी कसौटी बनेगा? किसी भी दावेदार को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
अनुपम कपूर के सामने भी मौका है कि वे कोरोना काल के इन मामलों पर अपना पक्ष सार्वजनिक करें और बताएं कि मरीजों के बिलों में कथित अनियमितताओं की क्या वजह थी, कितनी रकम वापस की गई और प्रशासनिक स्तर पर क्या हुआ। भाजपा नेतृत्व के सामने भी यह सवाल रहेगा कि टिकट की दौड़ में शामिल व्यक्ति के पुराने सार्वजनिक रिकॉर्ड की पड़ताल किस स्तर पर की जाती है।
विधायक का पद केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का दायित्व भी है। इसलिए शहर विधानसभा सीट पर अनुपम कपूर की दावेदारी के साथ कोरोना काल के ये मामले भी चर्चा में रहेंगे। असली कसौटी यही होगी कि आरोपों पर स्पष्ट जवाब और तथ्यों की जांच के बाद ही उनकी राजनीतिक दावेदारी का मूल्यांकन किया जाए।




