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आखिरकार सोनिया गांधी ने मानी डॉ. बत्तीलाल बैरवा की सलाह, आरएसएस को अब ऐसे पटखनी देगी कांग्रेस

नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
विगत लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस को दोबारा मजबूती से खड़ा करने की कवायद सोनिया गांधी ने तेज कर दी है. कांग्रेस के समक्ष वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है. अत: इससे निपटने के लिए सोनिया गांधी ने जेएनयू छात्र संघ के पहले दलित अध्यक्ष, राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश सचिव और दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. बत्तीलाल बैरवा की सलाह को मान लिया है. हालांकि, इस सलाह पर काम करने में कुछ देरी हुई है लेकिन कांग्रेस का यह कदम कारगर साबित हो सकता है.
बता दें कि विगत लोकसभा चुनाव से पहले डॉ. बत्तीलाल बैरवा ने इंडिया टाइम 24 को दिए गए साक्षात्कार में कहा था भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को आरएसएस जैसे एक संगठन की आवश्यकता है जिसके प्रतिनिधि जमीनी स्तर पर संगठन के लिए कार्य करें. वह आम जनता के पास जाएं और समाज को समाजवाद एवं नेहरूवाद के बारे में बताएं. उन्होंने सलाह दी थी कि कांग्रेस में आज ऐसे लोगों की जरूरत है तो पार्टी की विचारधारा को सामाजिक मंच तक ले जाएं. आज कोई एमएलए का उम्मीदवार हो या सांसद का, पार्टी की विचारधारा की बात कोई नहीं करता, नेहरूवाद और समाजवाद की बात कोई नहीं करता. अत: कांग्रेस को भी जमीनी स्तर पर निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है और यह तभी संभव हो सकता है जब कांग्रेस भी आरएसएस की तर्ज पर एक ऐसा संगठन विकसित करे जिसके प्रति कांग्रेस नेता जवाबदेह हों. उन्होंंने पार्टी स्तर पर भी यह सुझाव दिया था.

देखें डॉ. बत्तीलाल बैरवा का वह साक्षात्कार जिसमें उन्होंने कांग्रेस को आरएसएस की तर्ज पर काम करने की सलाह दी थी….

बता दें कि वीरवार को सोनिया गांधी के नेतृत्व में हुई कांग्रेस की एक बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि आरएसएस के प्रचारकों की तर्ज पर कांग्रेस प्रेरक या सहयोगी बनाएगी जिन्हें पार्टी की विचारधारा के बारे में पूरी जानकारी होगी और वह जमीनी स्तर पर इस विचारधारा के लिए कार्य करेंगे. हालांकि शुरुआती दौर में ये प्रेरक या सहयोगी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के बैनर तले ही कार्य करेंगे लेकिन संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में इस संगठन को भी पूरी तरह से कांग्रेस से मुक्त कर दिया जाएगा.
यहां पर उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने पहले भी एक ऐसा ही संगठन बनाया था लेकिन सियासी भंवर में वह संगठन डूब गया. कांग्रेस सेवा दल के नाम से बनाए गए इस संगठन का अस्तित्व आज ढूंढने से भी नहीं नजर आता. उपेक्षा के चलते सेवा दल के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता गया और वह इतिहास बन गया. अब अगर कांग्रेस एक बार फिर से सेवा दल को ही एक्टिव कर ले तो आरएसएस को पटखनी देना बहुत मुश्किल नहीं होगा. क्योंकि मौजूदा समय में आरएसएस से लड़ाई सियासी नहीं बल्कि वैचारिक और सैद्धांतिक है इसलिए सियासी हथकंडों की जगह विचारों से ही आरएसएस को मात दी जा सकती है. विचारों की पटरी से उतरी कांग्रेस की गाड़ी विचारों की पटरी पर ही आगे बढ़ सकती है, यह बात शायद सोनिया गांधी समझ चुकी हैं. कांग्रेस को इस नई लड़ाई में वैचारिक योद्धा उतारने होंगे. बिना बुद्धिजीवियों के यह लड़ाई कांग्रेस के लिए खिचड़ी भी साबित हो सकती है.
अत: स्वार्थ लेकर आने वालों के लिए इस संगठन में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. साथ ही संगठन में आने वालों को उनका बनता मान सम्मान भी देना होगा.

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