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शिवसेना का बंटाधार, मजबूत हुए पवार, भाजपा का बढ़ेगा जनाधार कांग्रेस को करना होगा इंतजार

नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली

महाराष्ट्र की सियासी लड़ाई में शिवसेना का बंटाधार कर दिया है| शिवसेना के राजकुमार आदित्य ठाकरे सीएम इन वेटिंग ही रह गए| उस पर भाजपा के साथ 30 साल पुराना नाता टूटा सो अलग| जनता के सामने भी शिवसेना का लालच बेनकाब हो गया| इस सियासी लड़ाई में सबसे अधिक फायदा एनसीपी के शरद पवार उठा ले गए| वह एक तरफ तो शिवसेना के जख्मों पर मरहम लगाते रहे और दूसरी तरफ उसे आंखें भी दिखाते रहे| सबसे अहम भूमिका निभाई कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने| सोनिया ने बेहद समझदारी से काम लिया और सिर्फ महाराष्ट्र के लिए पूरे देश में अपनी छवि को खराब होने से रोका| नतीजा यह हुआ कि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है और शिवसेना अब अदालत में जाकर अपनी फजीहत करवाने के लिए लगी हुई है| दरअसल महाराष्ट्र में सरकार बनाना इसलिए भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि विपरीत विचारधारा वाले दलों को एक साथ आना है| कांग्रेस इस गठबंधन के फायदे और नुकसान राष्ट्रीय स्तर पर देख रही है| अगर कांग्रेस शिवसेना को खुलकर समर्थन दे देती है तो उसकी धर्मनिरपेक्षता वाली छवि प्रभावित हो सकती है क्योंकि शिवसेना हिंदूवादी विचारधारा पर ही चली आ रही है| अगर शिवसेना इस विचारधारा को त्याग देती है तो उसका वजूद ही पूरी तरह से खत्म हो सकता है क्योंकि महाराष्ट्र में उसका जो जनाधार है वह या तो गुंडागर्दी की बदौलत है या फिर हिंदूवादी विचारधारा के चलते| अगर शिवसेना हिंदूवादी विचारधारा को अलविदा कह देती है तो इसका सीधा सा फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा| शिवसेना से दूरी बनाए रखने का एक और सबसे बड़ा कारण उत्तर भारतीयों के प्रति शिवसेना का नजरिया भी है जो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकता है| भाजपा चौकी क्योंकि केंद्र की सत्ता पर काबिज थी इसलिए शिवसेना की लगाम पूरी तरह से भाजपा के हाथों में थी| यही वजह रही कि उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलने वाली शिवसेना पर दबाव बनाने के लिए उत्तर भारती भगत सिंह कोशियारी को राज्यपाल की कुर्सी सौंपी गई| इस पूरी लड़ाई में सबसे मजबूत चेहरा बनकर एनसीपी के शरद पवार उभरे| पवार ने शिवसेना को खुला समर्थन देने का ऐलान करके उसे भाजपा से अलग करने का जो गेम खेला उसमें पूरी तरह से कामयाब भी हो गए| शिवसेना ने भी जल्दबाजी दिखाई और वह पवार के झांसे में आ गई| कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि कुछ ऐसा ही शिवसेना के साथ भी हुआ| शिवसेना को भारतीय जनता पार्टी से खुली बगावत जरूर करनी चाहिए थी लेकिन उस वक्त तक खामोश रहना चाहिए था जब तक उसके पास कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन का पत्र ना आ जाए| दोनों दलों का समर्थन पत्र लेने के बाद ही वह भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ खुली बगावत करते तू इतनी फजीहत नहीं झेलनी पड़ती| शिवसेना की हालत अब उस धोबी के गधे जैसी हो गई है जो घर का रहा ना घाट का| भाजपा तो उसके हाथों से निकल ही गई साथ ही एनसीपी और कांग्रेस नेवी उसे मीठी गोली दे दी| निश्चित तौर पर शिवसेना के लिए यह संकट का समय है| यह संकट सिर्फ सत्ता का ही नहीं बल्कि शिवसेना के भविष्य पर भी सवाल खड़े करता है| महाराष्ट्र में शिवसेना अब पूरी तरह से अलग-थलग पड़ चुकी है| महाराष्ट्र में शिवसेना का अपना इतना बड़ा वजूद फिलहाल नहीं है कि वह अकेले दम पर सत्ता हासिल कर ले| सत्ता में आने के लिए यकीनन उसे किसी ना किसी दल का साथ चाहिए| ऐसे में अगर कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन उसे समर्थन देता भी है तो भी सीएम पद की उसकी लालसा पूरी नहीं होने वाली| क्योंकि यह स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा अब शिवसेना के साथ नहीं है और भविष्य साथ आएगी भी तो भी अपनी शर्तों पर न कि शिवसेना की शर्तों पर.

राज्य में अगर दोबारा चुनाव होते हैं तो इसका सीधा सा फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा| क्योंकि कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद शिवसेना की हिंदूवादी छवि पूरी तरह से धूमिल हो जाएगी| और भाजपा के लिए रास्ता साफ हो जाएगा. कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए थोड़ा इंतजार करनी पड़ सकता है लेकिन भाजपा और शिवसेना के सियासी ड्रामे के बाद उसकी राह काफी आसान हो गई है. उसे भाजपा के खिलाफ तो बड़ा हथियार मिल ही गया है, साथ ही शिवसेना के कमजोर होने का लाभ भी मिल सकता है. अब गेंद एनसीपी के पाले में है. शिवसेना को एनसीपी के बिना कांग्रेस का साथ नहीं मिलने वाला. और एनसीपी बिना शर्त के शिवसेना का साथ नहीं देने वाली. शिवसेना को जितना महाराष्ट्र में नुकसान होगा उतना ही एनसीपी को फायदा होगा. यही वजह रही कि इस सियासी ड्रामे में भी पूरी गेम एनसीपी के हाथों में ही रही.

ज्योतिषाचार्य नरेश नाथ ने पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू होगा. उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई. अब ग्रहों की चाल के आधार पर वह दावा करते हैं कि अगर दोबारा विधानसभा चुनाव होते हैं और इन चुनावों में कांग्रेस महाराष्ट्र में प्रियंका गांधी को मैदान में उतारकर उनकी ताबड़तोड़ रैलियां कराती है तो कांग्रेस को इसका लाभ होगा और वह सत्ता में वापसी भी कर सकती है.

बहरहाल, महाराष्ट्र की सियासत एक दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि महाराष्ट्र में शिवसेना का सूरज कब उदय होगा.

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