इंटरव्यू

थैलेसीमिक को खून और 138 बेबस बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा रही बरेली की दीक्षा, पढ़ें युवा समाजसेवी दीक्षा सक्सेना का स्पेशल इंटरव्यू…

दुनिया बदलने का सफर लाखों मीलों का होता है. अगर हम चंद कदमों का फासला भी तय कर लें तो हजारों बेबसों की तकदीर संवर सकती है. समाज को कुछ ऐसा ही संदेश दे रही हैं बरेली की युवा समाजसेवी दीक्षा सक्सेना. दीक्षा अपनी कमाई का बीस फीसदी हिस्सा हर महीने बेबस जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करती हैं. लगभग पांच साल पहले 15 बेबस बच्चों की उम्मीद की किरण बनकर निकली दीक्षा आज 138 बच्चों के भविष्य को रोशन कर रही हैं. कोरोना काल में घर-घर जाकर राशन और सैनेटाइजर बांटने वाली दीक्षा थैलेसीमिक बच्चों के लिए ब्लड डोनेशन कैंप भी लगाती हैं. दीक्षा को सेवा की प्रेरणा कहां से मिली? वर्किंग एंड सोशल वूमन होने के साथ ही दीक्षा एक मां भी हैं. इतनी सारी जिम्मेदारियां वह कैसे निभा पाती हैं? दीक्षा सृजन वेलफेयर सोसाइटी के नाम से खुद का एक एनजीओ भी चलाती हैं लेकिन इसके लिए वह किसी बाहरी व्यक्ति या सरकार से कोई मदद नहीं लेतीं. इसकी क्या वजह है? उनकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं? थोड़े ही समय में उन्होंने राज्य स्तरीय पुरस्कार भी हासिल कर लिया है. ऐसे में युवा समाजसेवियों को वह क्या सलाह देना चाहती हैं? समाजसेवा में उनका साथ कौन-कौन दे रहा है? जानते हैं दीक्षा की कहानी उन्हीं की जुबानी नीरज सिसौदिया के साथ इस खास मुलाकात में…
सवाल : आपका बचपन कहां बीता, समाजसेवा के क्षेत्र में कब और कैसे आना हुआ?
जवाब : मैं मूल रूप से बरेली के बड़ा बाजार की रहने वाली हूं. मेरे पापा लेक्चरर थे और मां कुसुम कुमारी इंटर कॉलेज पुराना शहर में प्रिंसिपल थीं. दोनों संघ परिवार से जुड़े हुए थे इसलिए बचपन से ही संघ कार्यालय आना-जाना होता था. संघ से जुड़े लोग घर पर भी आते थे. इसी पारिवारिक माहौल ने दूसरों की मदद करने की भावना को जन्म दिया.
सवाल : आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई?
जवाब : मेरी स्कूलिंग सेंट मारिया से हुई. चूंकि हम एकल परिवार का हिस्सा थे और मम्मी-पापा दोनों जॉब करते थे, इसलिए आठवीं के बाद मैं अपनी मौसी के पास आगरा चली गई. नौवीं से 12 वीं तक की पढ़ाई मैंने वहीं आगरा पब्लिक स्कूल से की. इसके बाद वहीं से बीएससी की. फिर दिल्ली से एमएससी डायटीशियन में की. फिर रुहेलखंड विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म किया और फिर इनवर्टिस यूनिवर्सिटी से एमबीए किया.

समाजसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर दीक्षा सक्सेना को सम्मानित करते यूपी के स्वास्थ्य मंत्री.

सवाल : फिर समाजसेवा में कब सक्रिय हुईं?
जवाब : जर्नलिज्म का कोर्स करने के बाद मैंने बरेली के ही एक नामी समाचार पत्र में नौकरी कर ली. मुझे वहां शिक्षा संवाददाता की जिम्मेदारी मिली. इसी दौरान मैंने देखा कि बच्चों की हालत इतनी खराब है कि उनकी जिंदगी नर्क से भी बदतर हो सकती है. फिर मुझे लगा कि इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए. मैंने न्यूज चैनल में भी काम किया. वर्ष 2004 में मेरी शादी हो गई. मेरे पति राजीव सक्सेना कोका कोला कंपनी में जीएम हैं. शादी के बाद समय के अभाव के कारण मैंने मीडिया लाइन छोड़ दी. फिर मैं अपना बिजनेस रन करने लगी. इस बीच हम पांच फ्रेंड मिलकर लोगों की हेल्प करते रहते थे. फिर कुछ लोगों ने हमें एक एनजीओ बनाकर व्यवस्थित तरीके से समाजसेवा करने की सलाह दी. मेरे पति ने इसमें मेरी मदद की. 9 अक्टूबर 2015 को हमारे एनजीओ सृजन वेलफेयर सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन हुआ और पांच लोगों ने प्रॉपर वे में समाजसेवा का काम शुरू किया.

सहेलियों के साथ दीक्षा सक्सेना.

सवाल : जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा देने का विचार मन में कब आया?
जवाब : स्कूल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही हम जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई के लिए मदद करते रहते थे. फिर जब एनजीओ बना तो 15 बच्चों की पढ़ाई का खर्च हम पांच सहेलियों ने मिलकर उठाना शुरू किया. मेरी सहेलियों में रीमा अग्रवाल, चित्रा जौहरी, एकता सक्सेना और कविता अरोड़ा शामिल हैं. हम पांचों सहेलियों ने मिलकर ये सफर शुरू किया था और आज हमारे एनजीओ से 60 से भी अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं.
सवाल : महंगाई के इस दौर में एक बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल है और आप 138 बच्चों को एजुकेशनली अडॉप्ट कर चुकी हैं? इतना खर्च कैसे उठा पाती हैं? क्या सरकार या उद्योगपति मदद करते हैं?
जवाब : नहीं, हम पांच सहेलियां मिलकर ही खर्च उठाती हैं. हम सभी आत्मनिर्भर हैं और अपनी कमाई का बीस प्रतिशत हिस्सा हर माह इन बच्चों के लिए निकाल लेते हैं. इसके अलावा हमारे एनजीओ से जुड़ी महिलाएं भी स्वेच्छा से मदद कर देती हैं लेकिन हम उनकी मदद पर निर्भर नहीं रहते.

इन्हीं बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च दीक्षा सक्सेना का एनजीओ वहन कर रहा है.

सवाल : जिन बच्चों को आप पढ़ा रही हैं वे कहां के रहने वाले हैं और किन स्कूलों में पढ़ रहे हैं?
जवाब : हमने जिन बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया है उनमें 82 लड़कियां और बाकी लड़के हैं. इनमें कुछ बच्चे संजय नगर के हैं, कुछ डेलापीर के आगे स्थित झुग्गियों के हैं और कुछ इंद्रा नगर के हैं. ये सभी बच्चे नजदीकी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. इनकी 12वीं तक की पढ़ाई से लेकर ट्यूशन तक का सारा खर्च हम स्वयं उठाते हैं. अगर कोई आगे भी पढ़ना चाहता है तो उसे भी हेल्प करते हैं. कुछ बच्चे अब ग्रेजुएशन भी कर रहे हैं. वहीं एक बच्चे ने आईटीआई पास किया था तो उसे मोबाइल शॉप खुलवाई है जिससे वह आत्मनिर्भर हो चुका है.
सवाल : अपनी इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए आप क्या प्रयास कर रही हैं?
जवाब : मेरे दो बच्चे बेटी अविषी और बेटा साईनी अभी छोटे हैं. बिजनेस और घर की जिम्मेदारियों के बीच इतना समय नहीं मिल पाता कि समाजसेवा के क्षेत्र में पूरी तरह इनवॉल्व हो सकूं पर जितना कर सकती हूं उतना जरूर करती हूं. बच्चों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना मेरा पैशन है प्रोफेशन नहीं. फिर भी धीरे-धीरे हम दायरा बढ़ा रहे हैं. हमने 15 बच्चों से शुरुआत की थी और आज 138 बच्चों को शिक्षित करवा रहे हैं. मेरे बच्चे जब बड़े हो जाएंगे तब पूरी तरह इनवॉल्व होकर यही काम करना है.
सवाल : बेबस बच्चों को शिक्षा दिलाने के अलावा भी कुछ समाजसेवा का कार्य करती है आपकी सोसाइटी?
जवाब : जी बिल्कुल! हम थैलेसीमिक बच्चों के लिए साल में दो-तीन बार ब्लड डोनेशन कैंप लगाते हैं. इसके अलावा हर साल सर्दियों में अलाल जलवाने से लेकर कंबल एवं गर्म कपड़े बांटने तक का कार्य करते हैं. कोरोना काल में शहरभर में राशन,मास्क और सैनेटाइजर वितरित करने का काम किया. इस बार तो कई बार गर्म कपड़े और कंबल वितरित किए हैं.

जरूरतमंदों को कंबल वितरित करतीं दीक्षा सक्सेना और अन्य.

सवाल : कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो समाजसेवा करना चाहते हैं लेकिन सही दिशा नहीं मिल पाती. उन्हें क्या सलाह देना चाहेंगी?
जवाब : मेरे पास कई फोन आते हैं जिनमें महिलाएं कहती हैं कि हम भी समाजसेवा करना चाहते हैं कैसे करें तो मैं उनसे बस एक ही बात कहती हूं कि समाजसेवा की शुरुआत आप अपने घर से ही कर सकते हैं. आपके घर में जो काम वाली आती है उसके बच्चों की मदद करो. वह जरूरतमंद है तभी तो आपके घर में काम करने को मजबूर है. अपने गली-मोहल्ले से शुरू करो. जरूरतमंद हर जगह हैं बस सेवा का जज्बा होना चाहिए.

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