यूपी

ये हैं छोटे शहर के बड़े दिलवाले, आप भी मिलिये…

नीरज सिसौदिया, बरेली
ऊपरवाला दौलत तो बहुतों को देता है मगर उस दौलत से गरीबों एवं जरूरतमंदों की मदद का जज्बा सबको नहीं देता. सुरमा, झुमका, बांस और जरी जरदोजी के लिए दुनियाभर में मशहूर बरेली में वैसे तो समाजसेवी हर गली, नुक्कड़ और चौराहे पर मिल जाते हैं लेकिन उनकी समाजसेवा कागजों से बाहर नहीं निकल पाती. लगभग 25 हजार से भी अधिक गैर सरकारी संगठन तो सरकारी रिकॉर्ड में ही दर्ज हैं. एक संगठन में चार लोग भी औसतन मान लिए जाएं तो यह आंकड़ा एक लाख तक पहुंच जाता है. इसके बावजूद बेबसी, बेरोजगारी, भुखमरी और लाचारी यहां की सड़कों पर घूमती नजर आती है. अब सवाल यह उठता है कि कि इतने सारे समाजसेवी मिलकर भी समाज का उद्धार क्यों नहीं कर पा रहे? जबकि इनमें कई समाजसेवी तो सरकार से लाखों रुपये का फंड भी समाज सेवा के नाम पर वसूल कर रहे हैं. दरअसल, बरेली में दो प्रकार की समाजसेवा हो रही है. पहली वह समाज सेवा है जिसमें 15-20 खूबसूरत सी महिलाएं आधुनिक ड्रेस पहनकर एक सौ या दो सौ रुपये का कपड़ा लेकर आती हैं और एक बेबस गरीब को बीच में खड़ा कर शान से फोटो खिंचवाती हैं. उसके बाद फेसबुक, वॉट्सग्रुप, ट्विटर जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर वाहवाही लूटती हैं. इसके बाद शानदार पार्टी आयोजित कर उन्हें समाजसेवा के लिए सम्मानित भी किया जाता है. अखबारों को एडवरटाइजमेंट देकर फोटो छपवाते हैं और रजिस्टर्ड समाजसेवी बन जाती हैं. ऐसा कुछ कथित पुरुष समाजसेवी भी करते हैं. वहीं, कुछ ऐसे समाजसेवी भी हैं जो हर महीने हजारों-लाखों रुपये की मदद जरूरतमंदों की कर देते हैं लेकिन उनका कहीं नामोनिशान तक नहीं दिखाई देता. ये समाजसेवी न तो समाजसेवा करते वक्त सेल्फी लेते हैं और न ही अखबारों या सोशल मीडिया पर अपनी समाजसेवा का शोर मचाते हैं. आज हम आपको बरेली शहर के ऐसे ही कुछ समाजसेवियों से मिलवाने जा रहे हैं. आइये जानते हैं इनके बारे में…
1- संजीव अग्रवाल

संजीव अग्रवाल

संजीव अग्रवाल व्यापार और सियासत की दुनिया का जाना पहचाना नाम हैं. वर्तमान में वह भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश सह कोषाध्यक्ष भी हैं. मोबाइल और सीमेंट के कारोबारी संजीव अग्रवाल एक लॉ कॉलेज भी संचालित करते हैं. भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा में उनकी सबसे अहम भूमिका रहती है. संजीव जरूरतमदों को रोटी, कपड़ा आदि मुहैया कराने के साथ ही युवाओं को स्वरोजगार के लिए मशीनरी भी उपलब्ध कराते हैं. गरीब बेटियों के विवाह में भी समय-समय पर योगदान करते हैं लेकिन कभी इसका शोर नहीं मचाते. वह कोरी पब्लिसिटी से दूर रहना ही बेहतर मानते हैं. मूलरूप से फरीदपुर के रहने वाले संजीव अग्रवाल ने सैकड़ों जरूरतमंदों की मदद की है लेकिन कभी उसका शोर मचाना जरूरी नहीं समझा. जाने कितने समाजसेवी संगठनों को सालाना लाखों रुपये का चंदा संजीव अग्रवाल की ओर से जाता है पर उनका नाम गुमनाम ही रह जाता है.

2- डा. अनीस बेग

डा. अनीस बेग

समाजसेवी और समाजवादी पार्टी के चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष डा. अनीस बेग हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की जीती जागती मिसाल हैं. लोगों की मदद करते वक्त डा. अनीस बेग ने कभी हिन्दू-मुसलमान का भेद नहीं किया. एक डॉक्टर होने के कारण उनके पास रोजाना सैकड़ों लोग बड़ी उम्मीद लेकर आते हैं और डा. बेग उनकी उम्मीदों से बढ़कर मदद करते हैं. आम तौर पर जहां डॉक्टरों की छवि सफेदपोश लुटेरों की होती जा रही है. मनमाने बिल की वजह से आए दिन अस्पतालों में तोड़फोड़ की खबरें आम हो गई हैं, वहीं डा. अनीस बेग मरीजों का हजारों रुपये तक का बिल माफ करने में तनिक भी नहीं झिझकते. इतना ही नहीं कई मरीजों का तो वह नि:शुल्क उपचार भी करते हैं. रोजगार की नई शुरुआत करने वाले युवाओं की मदद करने के साथ ही जरूरतमंदों को राशन, कपड़े आदि वितरित करने में भी वह कभी पीछे नहीं हटते लेकिन कभी अपनी समाजसेवा का शोर नहीं मचाते. उनकी यही खूबी उन्हें औरों से अलग बनाती है. उनके दर से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता. होली पर खुलकर जश्न मनाते हैं तो दीपावली पर बेबसों के घर को रोशन करने वाले अनीस बेग बेहद खुशमिजाज इंसान भी हैं. यही वजह है कि कुछ लोग उन्हें इंसानी फरिश्ता भी कहते हैं.
3- डा. प्रमेंद्र माहेश्वरी

डा. प्रमेंद्र माहेश्वरी

बरेली शहर के जाने माने आर्थो सर्जन डा. प्रमेंद्र माहेश्वरी का नाम भी उन समाजसेवियों की सूची में शामिल है जो मीडिया की सुर्खियां नहीं बटोर पाते. सरल और सहज स्वभाव के डा. प्रमेंद्र माहेश्वरी अपनी कोई सामाजिक संस्था तो नहीं चलाते पर विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं की मदद अक्सर करते रहते हैं. विभिन्न कार्यक्रमों में गेस्ट की भूमिका निभाने वाले डा. माहेश्वरी गंगाचरण अस्पताल में आने वाले जरूरतमंद मरीजों की हरसंभव मदद करते हैं. वह डाक्टरी को एक पेशे के नजरिये से कभी नहीं देखते बल्कि इसे समाजसेवा का एक जरिया मानते हैं. गरीबों को सर्द रातों में कंबल बांटने से लेकर उनका पेट भरने जैसे समाजसेवा के कार्य वह अक्सर किया करते हैं लेकिन उसका शोर नहीं मचाते.

4- सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा

सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा

सतीश चंद्र सक्सेना को लोग मम्मा कातिब के नाम से भी जानते हैं. मम्मा पेशे से कातिब हैं और एक सफल राजनेता भी हैं. जरूरतमंदों के मददगार मम्मा हर किसी की मदद को तत्पर रहते हैं. गरीबों की मदद करने के साथ ही वह अपने साथियों की मदद को भी हमेशा तत्पर रहते हैं. एक बार उनके एक पार्षद साथी को किन्हीं कारणों से अपना घर तक छोड़ना पड़ गया था. पत्नी और बच्चों के साथ घर छोड़ने को मजबूर हुए अपने साथी को मम्मा ने अपने घर में पनाह दी और जब तक उस साथी की व्यवस्था नहीं हो गई तब तक उसे कहीं जाने ही नहीं दिया. युवाओं को स्वरोजगार के लिए आगे बढ़ाने में मम्मा का प्रयास सराहनीय है. समाजसेवी संगठनों की मदद वह दिल खोलकर करते हैं लेकिन जब ये समाजसेवी संगठन गरीबों की मदद की नुमाइश करते हैं तो मम्मा उस तस्वीर में कहीं नजर नहीं आते. सिस्टम से उनकी लड़ाई हमेशा चलती रहती है.

5- डा. मोहम्मद खालिद

डा. मोहम्मद खालिद

डा. मोहम्मद खालिद पेशे से डाक्टर हैं और जनसेवा अस्पताल के मालिक भी हैं. डा. खालिद डिप्टी मेयर भी रहे. हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए डा. खालिद होली, दीपावली जैसे त्योहारों पर गरीब बच्चों के साथ खुशियां बांटते नजर आते हैं. जरूरतमंदों को नि:शुल्क उपचार मुहैया कराने के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनका मार्गदर्शन भी करते हैं. साथ ही साधन भी उपलब्ध कराते हैं. गरीबों को कपड़े बांटना, भोजन कराना और उनके सुख दुःख का साथी बनना डा. खालिद को अच्छा लगता है. सबसे अहम बात यह है कि उनके पास जो भी आता है उसे एक अपनत्व का एहसास होता है. डा. खालिद कभी किसी गरीब को छोटा महसूस नहीं होने देते. इतना सब करने के बावजूद डा. खालिद ने कभी अपनी समाजसेवा का शोर नहीं मचाया.
6- अश्वनी ओबरॉय

अश्वनी ओबरॉय

पेशे से बिजनेसमैन अश्वनी ओबरॉय वह शख्सियत हैं जिसने समाजसेवा के लिए राजनीतिक करियर को दांव पर लगा दिया. वह भी उस वक्त जब खुद राजीव गांधी तक उनके व्यक्तित्व से परिचित हो चुके थे और उन्हें केंद्रीय राजनीति में ले जाना चाहते थे. अश्वनी ओबरॉय नि:स्वार्थ सेवा की जीती जागती मिसाल हैं. वह शहर की कई नामी सामाजिक संस्थाओं को सहायता राशि उपलब्ध कराते हैं लेकिन आज तक खुद की कोई संस्था नहीं बनाई. अश्वनी ओबरॉय अक्सर विभिन्न सामाजिक समारोहों में मुख्य अतिथि के रूप में नजर आते हैं लेकिन अपनी समाजसेवा का ढिंढोरा नहीं पीटते. सीता रसोई और समर्पण एक प्रयास जैसे गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर ओबरॉय समाजसेवा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं.
7- डा. विनोद पागरानी

डा. विनोद पागरानी

खुशलोक हॉस्पिटल के संचालक डा. विनोद पागरानी के जिक्र के बिना बरेली के बड़े दिलवालों की चर्चा पूरी नहीं हो सकती. वह खुशमिजाज और जिंदादिल शख्सियत के रूप में जाने जाते हैं. कहते हैं कि उनके दर पर जाने वाला कोई भी शख्स कभी खाली हाथ नहीं लौटता. फिर चाहे वह कोई जरूरतमंद हो या फिर चंदा मांगने वाला किसी सामाजिक संगठन का प्रतिनिधि. विनोद पागरानी हर किसी की मदद को हमेशा तत्पर रहते हैं. यही वजह है कि आज जहां अस्पतालों में अक्सर विवाद देखने को मिलते हैं वहीं खुशलोक अस्पताल इन विवादों से कोसों दूर है. डा. पागरानी न सिर्फ समाजसेवी संगठनों और गरीबों के मददगार हैं बल्कि उनके कार्यक्रमों का हिस्सा भी बनते रहते हैं. युवा समाजसेवी के तौर पर वह दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत भी हैं.
8- रजनीश सक्सेना

रजनीश सक्सेना

रजनीश सक्सेना मां गंगा बचाओ वेलफेयर सोसाइटी के नाम से खुद का एक सामाजिक संगठन चलाते हैं. संस्था के माध्यम से कभी दिव्यांग बच्चों में खुशियां बांटते हैं तो गरीबों की जिंदगी का अंधियारा दूर करने की कोशिश करते हैं. वह अपनी समाजसेवा को कैमरे में कैद जरूर करते हैं लेकिन उनकी समाजसेवा सिर्फ फोटो खिंचवाने की औपचारिकता तक ही सीमित नहीं है. हाल ही की बात है जब एक हादसे में रजनीश सक्सेना का हाथ टूट गया था लेकिन मानसिक मंदित बच्चों के लिए उन्होंने बसंत उत्सव का आयोजन किया. रजनीश न सिर्फ स्वयं समाजसेवा करते हैं बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र में काम कर रहे अन्य समाजसेवियों की हौसला अफजाई करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते. हालांकि रजनीश के इस सरल स्वभाव का लाभ कुछ फोटो खिंचवाने वाली समाजसेवी महिलाएं भी उठाती हैं लेकिन रजनीश कभी उस भीड़ का हिस्सा नहीं बने.

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