नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी में बरेली जिला अध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय तक चली खींचतान तो खत्म हो गई, लेकिन अब नई जिला कार्यकारिणी के गठन को लेकर पार्टी के भीतर नया सियासी संघर्ष शुरू हो गया है। जिला अध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाले शुभलेश यादव को संगठन की कमान संभाले हुए एक महीने से ज्यादा का समय होने जा रहा है, लेकिन अब तक कार्यकारिणी का एलान नहीं हो पाया है। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह जिला महासचिव पद को लेकर कई बड़े दावेदारों का सामने आना है।
समाजवादी पार्टी में जिला महासचिव का पद हमेशा से बेहद अहम माना जाता रहा है। संगठन की रोजमर्रा की गतिविधियों से लेकर चुनावी रणनीति, कार्यकर्ताओं के समन्वय और बड़े नेताओं से संपर्क बनाए रखने तक में महासचिव की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि इस पद के लिए कई नेता अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हुए हैं। खास बात यह है कि जिन नामों पर सबसे ज्यादा चर्चा चल रही है, वे सभी नेता अलग-अलग बड़े नेताओं के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में किसी एक को तरजीह देना और दूसरे को नाराज करना जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव के लिए आसान नहीं माना जा रहा।
बताया जाता है कि पार्टी के संविधान और परंपरा के अनुसार जिला अध्यक्ष बनने के बाद करीब 15 दिनों के भीतर प्रस्तावित जिला कार्यकारिणी की सूची हाईकमान को भेजनी होती है। शुभलेश यादव को 22 अप्रैल को बरेली का जिला अध्यक्ष घोषित किया गया था। उस समय माना जा रहा था कि जल्द ही नई टीम सामने आ जाएगी और पार्टी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में पूरी ताकत से जुट जाएगी। लेकिन जैसे-जैसे महासचिव पद को लेकर दावेदारों के नाम सामने आने लगे, वैसे-वैसे मामला उलझता चला गया।
सूत्रों के मुताबिक इस समय जिन नेताओं के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें प्रमोद बिष्ट, जितेंद्र मुंडे, राजकुमार पाल, मनोहर पटेल और शमीम अहमद शामिल हैं। इन सभी नेताओं की अपनी अलग राजनीतिक पहुंच मानी जाती है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व भी किसी फैसले पर जल्दबाजी में पहुंचने से बच रहा है।
प्रमोद बिष्ट को संगठन में एक अनुभवी चेहरे के तौर पर देखा जाता है। वह उत्तराखंड में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं और लंबे समय से संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय हैं। पार्टी के अंदर यह भी चर्चा रहती है कि उनके संबंध सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव से काफी अच्छे माने जाते हैं। यही कारण है कि संगठन में उनकी दावेदारी को हल्के में नहीं लिया जा रहा।

दूसरी ओर मनोहर पटेल भी लगातार सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं। उनका नाम जिला अध्यक्ष पद की दौड़ में भी शामिल था। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने भोजीपुरा सीट से टिकट की दावेदारी की थी और अब उन्हें मीरगंज विधानसभा सीट से संभावित दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। संगठन में उनकी पकड़ पिछड़े वर्ग के नेताओं और ग्रामीण कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक चाहते हैं कि उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर आगामी चुनावों में पार्टी को फायदा पहुंचाया जाए।

राजकुमार पाल का नाम भी पार्टी के भीतर लगातार चर्चा में बना हुआ है। जिला अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल रहने के कारण उनका राजनीतिक कद पहले ही बढ़ा हुआ माना जा रहा है। लेकिन वह बसपा से आए हैं इसलिए उनकी ताजपोशी से पार्टी में असंतोष पनप सकता है। उनके साथ एक विवाद भी जुड़ा हुआ है, उन्होंने फरीदपुर में एक सभा के दौरान विजयपाल सिंह को विधायक बनाने की अपील कर डाली थी जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। ऐसे में उनकी ताजपोशी का पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इन सबके बीच दलित समाज से आने वाले जितेंद्र मुंडे का नाम भी तेजी से उभरा है। हालांकि, वह भी बसपा से ही सपा में आए हैं लेकिन उन्हें पार्टी में एक सरल स्वभाव और जमीनी नेता के रूप में देखा जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कैंट विधानसभा सीट से टिकट के मजबूत दावेदार रहे इंजीनियर अनीस अहमद खां के साथ बसपा छोड़कर सपा में आए थे। उस समय पार्टी ने उन्हें बड़े सामाजिक समीकरण के तौर पर देखा था। पिछले कुछ महीनों में जितेंद्र मुंडे लगातार पार्टी के अलग-अलग कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई दिए हैं लेकिन उनकी आस्था भी एक विशेष नेता के प्रति होने की वजह से उनकी दावेदारी भी खटाई में पड़ सकती है। हालांकि उन्होंने डॉक्टर अनीस बेग और राजेश अग्रवाल जैसे नेताओं के कार्यक्रमों में भी सक्रिय भागीदारी निभाकर यह संकेत देने की कोशिश की है कि वह संगठन के कई धड़ों से तालमेल बनाकर चल रहे हैं।

इन सबके अलावा पीडीए फॉर्मूले में अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले शमीम अहमद का नाम भी महासचिव पद की चर्चा में लगातार बना हुआ है। वर्तमान में वह मौजूदा पार्षद हैं और महानगर इकाई में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनकी पहचान सिर्फ नगर राजनीति तक सीमित नहीं मानी जाती। दरगाह आला हजरत से जुड़े होने के कारण मुस्लिम समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ बताई जाती है। बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका में हैं।

जिला अध्यक्ष पिछड़े यानि यादव समाज से होने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि महासचिव पद पर अल्पसंख्यक को जगह देकर मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि पूर्व मंत्री अता उर रहमान से लेकर भगवत सरन गंगवार और शहजिल इस्लाम तक लगभग हर बड़े नेता से उनके अच्छे संबंध हैं। ऐसे में सपा की अंदरूनी कलह को कम करने में शमीम अहमद निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान शमीम अहमद पूरे जिले की अलग-अलग सीटों पर सक्रिय नजर आए थे। खास तौर पर बहेड़ी और भाेजीपुरा सीट पर वह लगातार चुनाव प्रचार करते नजर आए थे और अंतत: इन दोनों ही सीटों पर सपा को जीत मिली थी। संगठन के कई लोग मानते हैं कि चुनावी समय में वह कार्यकर्ताओं को जोड़ने और बूथ स्तर तक नेटवर्क बनाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं। यही वजह है कि उनकी दावेदारी भी लगातार मजबूत बनी हुई है।

सूत्र बताते हैं कि शुभलेश यादव की सबसे बड़ी चिंता यही है कि इन नेताओं में से किसी को भी नाराज न किया जाए। समाजवादी पार्टी इस समय विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई है और पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि संगठन के भीतर असंतोष का माहौल बने। बरेली की राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। ऐसे में अगर किसी बड़े दावेदार को जिम्मेदारी नहीं मिली तो उसका असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
पार्टी के जानकारों का कहना है कि जिला कार्यकारिणी का गठन केवल संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव का शुरुआती राजनीतिक संदेश भी माना जाएगा। जिस नेता को जितनी बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, उसका प्रभाव टिकट वितरण और चुनावी रणनीति तक में दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि हर दावेदार अपने स्तर पर बड़े नेताओं से संपर्क साधे हुए है।
सपा के भीतर यह भी चर्चा है कि इस बार जिला कार्यकारिणी में सामाजिक और जातीय संतुलन साधने की कोशिश की जाएगी। पार्टी नेतृत्व यादव, मुस्लिम, पिछड़ा, दलित और सवर्ण समाज के नेताओं को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में महासचिव जैसे अहम पद पर नियुक्ति को लेकर मंथन और भी बढ़ गया है।
वहीं, इस संबंध में जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव का कहना है कि कार्यकारिणी लगभग तय हो चुकी है और केवल अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। उनका कहना है कि जल्द ही नई टीम की घोषणा कर दी जाएगी। हालांकि पार्टी सूत्रों की मानें तो अभी भी कई पदों पर सहमति नहीं बन पाई है और इसी वजह से सूची रोकी गई है।
बताया जा रहा है कि अगले 15 से 20 दिनों के भीतर नई जिला कार्यकारिणी की घोषणा हो सकती है। सामान्य तौर पर जिला कार्यकारिणी में पदाधिकारियों सहित 51 सदस्य होते हैं। इनमें पदाधिकारियों की संख्या सीमित होती है लेकिन इस बार चुनावी साल होने के कारण पार्टी अधिक से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को साधने के लिए पदाधिकारियों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार कर रही है।
फिलहाल बरेली सपा की राजनीति पूरी तरह जिला कार्यकारिणी के गठन पर टिक गई है। पार्टी कार्यकर्ताओं की नजर इस बात पर है कि शुभलेश यादव किन नेताओं को अपनी टीम में जगह देते हैं और किसे इंतजार करना पड़ता है। आने वाले दिनों में यह फैसला न सिर्फ संगठन की दिशा तय करेगा बल्कि विधानसभा चुनाव से पहले बरेली में समाजवादी पार्टी की अंदरूनी राजनीति का भी बड़ा संकेत माना जाएगा।




