हरियाणा

छोटे-छोटे किरदारों ने बनाया मुकेश भट्ट को बड़ा अभिनेता

नरेश भारद्वाज, कैथल

किरदार कोई भी हो, डायलॉग कैसे भी हों, वह उसमें डूबना जानते हैं‌। उसमें ढलना जानते हैं। इसीलिए आज फिल्म इंडस्ट्रीज में मुकेश भट्ट किसी पहचान के मोहताज नहीं रह गए। फिल्म नगरी की चकाचौंध में बिना किसी गॉडफादर के उनके अभिनय का कारवां निरंतर गति पकड़ रहा है। उनका कहना है कि फिल्म नगरी की चकाचौंध देखकर कोई युवा भ्रमित ना हो। अगर उसमें टैलेंट नहीं है तो वह मुंबई की ओर कभी रुख न करें‌। अगर कला के प्रति समर्पण और लगन है तो फिर भाग्य भी साथ देता है, अन्यथा माया नगरी की चकाचौंध में पता नहीं कितने लोग गुमनाम ही गुम हो गए। मुकेश भट्ट अगर आज इस नगरी में अपनी पहचान बना पाया है तो यह उनकी लगन और अपने काम के प्रति निष्ठा का ही फल है। पहली बार फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें अनुराग कश्यप की फिल्म पांच में काम मिला‌। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक वह 50 से अधिक फिल्में कर चुके हैं। मुकेश भट्ट जब एमएस धोनी फिल्म में कमेंट्री करते हैं तो कमेंटेटर दिखने लगते हैं। जब अक्षय कुमार की चर्चित फिल्म स्पेशल 26 में मंत्री के पीए की भूमिका निभाते हैं तो असली पीए नजर आते हैं। जब उन्होंने नसीरुद्दीन शाह की फिल्म अ वेडनेस-डे में आतंकवादी का रोल किया तो पूर्णत: उसी किरदार में ढल गए। एमएस धोनी फिल्म में मुकेश क्रिकेट मैच की लाइव कमेंट्री करते हुए कहते हैं- यह लंबी रेस का घोड़ा है। वास्तव में वे आज खुद लंबी रेस का घोड़ा बन चुके हैं। वे अ वेडनेसडे में नसीरुद्दीन शाह के सहयोगी आतंकबादी हैं। स्क्रिप्ट देखने के बाद उन्होंने निर्देशक से पूछा- क्या मैं इस रोल में पान खा सकता हूं। हालांकि व्यक्तिगत जीवन में वे पान नहीं खाते हैं, परन्तु निर्देशक की हरी झंडी मिलते ही उन्होंने 40 खिल्ली पान चबाकर अपनी भाव-भंगिमा में मौलिकता लाई। उनके किरदार को खूब पसंद किया गया। भूतनाथ रिटर्नस में स्वर्ग लोक में भूत बने हैं, जहां भूतनाथ की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन से उनकी मुलाकात हुई। इस मुलाकात की शूटिंग मुम्बई में हुई। विशेष इजाजत पर जब अमिताभ बच्चन चुनाव लड़ने के लिए दोबारा धरती पर पहुंचते हैं तो उनके साथ मुकेश भट्ट भी पहुंचते हैं। बूथ पर मुकेश देखते हैं कि मौत के बावजूद उनका नाम वोटर लिस्ट में कायम है और एक व्यक्ति उनके नाम पर फर्जी मतदान करने जा रहा है। भूत मुकेश ने उस व्यक्ति से जबरन अपनी पसंद के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कराया। रणवीर कपूर की फिल्म रॉकेट सिंह में भी उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है।
मुकेश भट्ट हॉलीवुड की फिल्म निंजा शैडो आफ 8 ईयर में काम कर चुके हैं। वे इस फिल्म में एकमात्र भारतीय कलाकार हैं। इसके अलावा वे वेब सीरीज मिर्जापुर में हिजड़े का चर्चित किरदार निभा चुके हैं। आजकल वे एक अन्य वेब सीरीज रक्ताचंल-2 में भी काम कर रहे हैं। जिसकी शूटिंग बनारस में हो रही है.
अकुशल लोगों के लिए फिल्म इंडस्ट्री में स्थान नहीं
मुकेश भट्ट बताते हैं कि अकुशल लोगों के लिए फिल्म इंडस्ट्री में कोई स्थान नहीं है। यहां अपने काम के प्रति समर्पण ही व्यक्ति को सफलता दिलाता है। बचपन में जब वे गांव में मदारी का तमाशा देखते और नौटंकी में नाचते गाते कलाकारों को देखते तो उनके मन में भी कुछ इसी तरह करने की इच्छा जोर मारने लगी। जो उन्हें पढ़ाई के बाद दिल्ली के श्रीराम सेंटर तक ले आई। यहां एक साल अभिनय की शिक्षा लेने के बाद वे श्री राम रिपेरटॉरी में व्यवसायिक कलाकार के तौर पर काम करने लगे। जहां उन्हें अच्छा वेतन मिलता था।
नाटक में अभिनय कर हासिल की शोहरत
इसके बाद वे मुंबई आ गए। उन्हें मुंबई की बोलचाल भाषा कुछ भी समझ में नहीं आता था। जिसको देखो वह बस भागदौड़ में लगा है। ऐसे में यह पृथ्वी थिएटर पहुंचे। जिसके बाहर प्लेटफार्म परफॉर्मेंस में उन्होंने आधे घंटे का नुक्कड़ नाटक पेश किया। जिसे उन्होंने खुद ही डायरेक्ट किया था। जिसे कई एक्टर और डायरेक्टर ने सराहा। इसके बाद वे नोटिस में आ गए। इसी दौरान पृथ्वी थिएटर में सालाना फेस्टिवल चल रहा था और उसमें मुंशी प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब पर नाटक पेश होना था। नाटक के एक कलाकार बीमार हो गए। डायरेक्टर प्रशांत नारायणन ने उनसे नाटक में रोल करने के लिए कहा तो उन्होंने तुरंत हां कर दी। प्रशांत नारायणन ने कहा कि दिन कम है मुकेश क्या तुम इस किरदार के साथ इंसाफ कर पाओगे। इस पर मुकेश बोले 4 दिन तो बहुत होते हैं साहब। इसके बाद उन्होंने नाटक में बड़े भाई का रोल किया जिसके बाद वह किसी पहचान के मोहताज नहीं रहे। यहां से पहचान मिलने के बाद उन्हें फिल्में भी मिलने लगी।
अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं मुकेश भट्ट
मुकेश का कहना है कि वे मुजफ्फर पुर जिले के भरथुआ गांव में भट्ट परिवार में पैदा हुए उनके पिता शिवशंकर प्रसाद राय सेना में नौकरी करते थे। 1972 के युद्ध में उनकी टांग में गोली लगने के बाद वे रिटायर होकर वापस गांव लौट आए। सैनिक परिवार में जन्मे मुकेश तीन बच्चों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही वह अभिनय की तरफ आकर्षित होने लगे थे। तब उन्हें नहीं पता था कि यह डगर कटीले पत्थरों से होकर गुजरती है। जब स्कूल में नाटक करने वाले बच्चों को पुरस्कार मिलते तो उनकी भी इच्छा होती कि उन्हें भी इसी तरह के इनाम मिले। यह इच्छा बलवती होती गई और उन्हें अभिनय के क्षेत्र में खींच ले आई। मुजफ्फरपुर में पढ़ाई के दौरान नाट्य संस्था कायाकल्प ने उनकी इस इच्छा को ओर बल दिया।
अभिनय से संतुष्ट, मंजिल के लिए जारी है संघर्ष
मुकेश भट्ट अपने अभिनय से पूरी तरह से संतुष्ट हैं लेकिन वे यह भी मानते हैं कि संतुष्टि कई बार मनुष्य के रास्ते में रुकावट पैदा कर देती है। इसलिए अभिनय और नए किरदारों की भूख हर रोज जन्म लेती है। एक किरदार निभाने के बाद वे उससे भी अगली श्रेणी के अभिनय के लिए जद्दोजहद शुरू कर देते हैं। उनका कहना है कि मंजिल अभी दूर है। अभिनय एक अच्छी विधा है। जिसे ढंग से किया जाना चाहिए। जिसको इस क्षेत्र में पहचान बनानी है। वह जी जान से लग जाए, कभी भी उसका विश्वास नहीं हिलना चाहिए अन्यथा सफलता दूर चले जाती है। युवा फिल्मों की चकाचौंध से प्रभावित होकर इस क्षेत्र में नहीं आए बल्कि फिल्मों की बारीकियां सीख कर ही अभिनय के क्षेत्र में आने से उन्हें फायदा मिलेगा।

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