यूपी

भाजपा का स्थाई वोट बैंक है कायस्थ और वैश्य समाज पर प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो बिदक सकता है खत्री-पंजाबी समाज, जानिये कैसे?

नीरज सिसौदिया, बरेली
शहर विधानसभा सीट का सियासी घमासान इस बार भाजपा के लिए इतना आसान नहीं होगा. इसके कई कारण हैं जिनमें सबसे बड़ा कारण खत्री-पंजाबी समाज की ओर से विधानसभा चुनाव में प्रतिनिधित्व की मांग उठना बताया जा रहा है.
सियासी जानकारों का मानना है कि जिस मजबूती से इस बार भाजपा में खत्री-पंजाबी समाज को टिकट देने की मांग की जा रही है उस पुरजोर तरीके से पहले कभी ऐसा नहीं किया गया. खत्री-पंजाबी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व उप सभापति अतुल कपूर तो इतनी जोर-शोर से तैयारियां कर रहे हैं कि अब जिलेभर की सीटों पर रहने वाले खत्री-पंजाबी समाज के वोटरों की नजर जिला मुख्यालय में समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर टिकी हुई हैं.
दरअसल, जिले की नौ विधानसभा सीटों में से किसी भी सीट पर भाजपा ने कभी खत्री-पंजाबी समाज को प्रतिनिधित्व नहीं दिया. कांग्रेस ने जरूर स्व. राम सिंह खन्ना को मैदान में उतारा था और उसके नतीजे भी कांग्रेस के पक्ष में आए थे. राम सिंह खन्ना के निधन के बाद से यह समाज हाशिए पर डाल दिया गया और भाजपा ने तो कभी उक्त समाज के नेता को विधानसभा का टिकट देना भी मुनासिब नहीं समझा. यहां से डा. दिनेश जौहरी और डा. अरुण कुमार जैसे कायस्थ बिरादरी के नेताओं को मौका दिया गया. उस वक्त खत्री-पंजाबी समाज को अपनी ताकत का अहसास नहीं था और उनकी तादाद भी इतनी नहीं थी कि वे किसी भी सियासी दल का चुनावी गणित बिगाड़ सकें मगर वर्तमान में खत्री-पंजाबी समाज इस स्थिति में आकर खड़ा हो गया है कि वह किसी भी राजनीतिक दल का सियासी खेल बिगाड़ने की क्षमता रखता है. खास तौर पर शहर विधानसभा सीट में. इसकी एक वजह यह भी है कि इस बार शहर विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या लगभग पौने दो लाख पहुंच चुकी है. अगर इस मुस्लिम वोट में खत्री-पंजाबी समाज का वोट मिल गया तो समाजवादी पार्टी यह सीट आसानी से जीत सकती है. भाजपा नेताओं का तर्क है कि इस सीट पर कायस्थ समाज निर्णायक भूमिका में है. अगर उसे टिकट नहीं दिया गया तो काफी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कायस्थ और वैश्य समाज उसी तरह भाजपा का वोट बैंक है जिस तरह मुस्लिम और यादव समाज समाजवादी पार्टी का वोट बैंक हैं जो कभी नहीं बदलने वाला. इसका उदाहरण उस वक्त देखने को मिला था जब डा. अरुण कुमार समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़े थे लेकिन कायस्थ समाज ने भाजपा को वोट किया था और डा. अरुण कुमार को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी. लेकिन खत्री-पंजाबी समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं. ऐसे में भाजपा को नुकसान हो सकता है क्योंकि खत्री-पंजाबी समाज भी शहर विस सीट पर निर्णायक भूमिका में है. शहर सीट पर खत्री-पंजाबी समाज की अनदेखी का असर जिले की अन्य सीटों पर भी पड़ेगा क्योंकि किसान आंदोलन के चलते सीमावर्ती पंजाबी समाज के किसानों में भी सरकार के खिलाफ गुस्सा है. उन वोटरों को साधने के लिए जिले की कम से कम एक सीट पर तो उन्हें प्रतिनिधित्व देना ही होगा. चूंकि बरेली सिर्फ जिले का ही नहीं मंडल का भी मुख्यालय है ऐसे में यहां की राजनीति कई जिलों को भी प्रभावित करेगी.

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