लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में मिली चुनावी जीत के बाद पार्टी की नजर अब विधानसभा चुनावों पर है। चुनाव में भले ही अभी दो साल से भी अधिक का समय शेष है लेकिन टिकट के ठेकेदार अभी से सक्रिय हो गए हैं। बरेली जिले में भी सपा का पूर्व मंत्री और मौजूदा विधायक विधानसभा के टिकट बुक करने में जुट गया है। आलम ये है कि कुछ छुटभैये नेता और पार्षद भी नेताजी के झांसे में आ गए हैं। नेता जी ने कुछ को शहर विधानसभा सीट से जबकि कुछ को कैंट विधानसभा सीट से टिकट का भरोसा दे डाला है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ दावेदारों को तो नेताजी ने दोनों ही सीटों से तैयारी करने को कह दिया है। यानी नेताजी को खुद भी नहीं मालूम कि वह संबंधित दावेदार को किस सीट से टिकट दिलवाएंगे। हैरानी की बात यह है कि इस सबके बावजूद छुटभैये नेता इन विधायक जी के झांसे में आ गए हैं। कुछ नेताओं ने तो गुपचुप तैयारी भी शुरू कर दी है तो वहीं कुछ नेता खुलकर दावा जता रहे हैं।
इस पूरे खेल का असली पहलू यह है कि नेताजी खुद महानगर में अपना सियासी भविष्य तलाश रहे हैं। दरअसल, नेताजी इस बार जिस विधानसभा सीट से जीते हैं वहां से अगले चुनाव में उन्हें जीत की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। इसकी बड़ी वजह यह है कि नेताजी के विधानसभा क्षेत्र के पार्टी के एक बड़े नेता ने पिछले विधानसभा चुनाव के बाद साइकिल को छोड़ हाथी की सवारी कर ली थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में हाथी की सवारी करने वाले इन्हीं नेताजी की वजह से मौजूदा विधायक जी को हार का सामना करना पड़ा था। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले नेताजी का सबसे बड़ा विरोधी सपा में शामिल हो गया था और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अपनी सूझबूझ से उसे नेता जी के संसदीय क्षेत्र से दूर रखा ताकि वह विधायक जी को चुनाव में कोई नुकसान न पहुंचा सके और हुआ भी ऐसा ही। नतीजतन नेताजी चुनाव जीत गए। लेकिन अब विधायक जी का वहीं धुर-विरोधी बसपा में शामिल हो गया है। ऐसे में अपने मौजूदा विधानसभा क्षेत्र से नेताजी का जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है। ऐसे में नेताजी बरेली महानगर की दोनों सीटों की खाक छान रहे हैं। वो यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शहर और कैंट में से कौन सी विधानसभा सीट उनके लिए मुफीद है। चूंकि नेताजी मुस्लिम समाज से आते हैं और कैंट एवं शहर दोनों ही विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों की अच्छी खासी तादाद है। अगर समाजवादी पार्टी को शहर विधानसभा सीट पर कायस्थों का थोड़ा भी साथ मिल गया तो सपा उम्मीदवार जीत जाएगा। इसी तरह अगर कैंट विधानसभा सीट पर अगर वैश्य वोटों का बंटवारा हो जाए तो वहां से भी सपा जीत सकती है। इसलिए नेताजी ने शहर से कायस्थ और कैंट से बनिया दावेदार के लिए टिकट की बुकिंग कर दी है। नेताजी जानते हैं कि पिछले लगभग डेढ़ दशक में इन दोनों ही सीटों पर बनिया कभी विपक्ष को रास नहीं आया। 2017 में सपा और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार प्रेम प्रकाश अग्रवाल को बरेली शहर सीट से शिकस्त झेलनी पड़ी। 2012 में कांग्रेस की सुप्रिया ऐरन को कैंट सीट से हार का सामना करना पड़ा था। वह चौथे नंबर पर खिसक गई थीं। 2022 में शहर और कैंट दोनों ही विधानसभा सीटों पर सपा ने बनिया उम्मीदवार उतारे। शहर से राजेश अग्रवाल तो कैंट से सुप्रिया ऐरन को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर वैश्य समाज पर भरोसा जताया और प्रवीण सिंह ऐरन को मैदान में उतारा लेकिन ऐरन भी चुनाव नहीं जीत पाए जबकि पूरे प्रदेश में सपा को शानदार जीत मिली थी। ऐरन को भाजपा के छत्रपाल गंगवार ने हराया जो विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाए थे।
यही वजह है कि अब नेताजी महानगर में सियासी जमीन तलाश रहे हैं और टिकटों की बुकिंग के बहाने अपनी पैठ बनाने में लगे हैं। लेकिन नेताजी ये भूल गए हैं कि अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में वो पार्टी में अभी से बगावत का बीज बो रहे हैं जो सपा की आसान राह को भविष्य में और भी मुश्किल बना सकते हैं।
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