नीरज सिसौदिया, बरेली
इटावा में कुछ समय पहले कथावाचन पर यादव समाज के लोगों की पिटाई के बाद पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों के खिलाफ एक माहौल तैयार किया जा रहा है। चंद लोगों की लड़ाई को ब्राह्मण बनाम पिछड़ों का रूप दिया जा रहा है। जगह-जगह पीडीए पंचायतों में भी यह मुद्दा उठाया जा रहा है। ऐसा मान लिया गया है कि ब्राह्मण सिर्फ भाजपा का ही वोट बैंक हैं। किसी और दल से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। बरेली के संदर्भ में देखें तो यहां की सियासत में ब्राह्मणों का असर हमेशा से ही रहा है। चाहे कांग्रेस का दौर रहा हो या फिर किसी और पार्टी का, बरेली को हर दौर में एक ऐसा ब्राह्मण नेता मिला है जिसका दबदबा पूरे जिले में रहा है। वर्तमान में भी यहां दो बड़े नाम इसी समाज से हैं। इनमें एक को ‘जन नेता’ कहा जा रहा है तो दूसरे को ‘धन नेता’ की संज्ञा जी जाने लगी है। अब सवाल यह उठने लगा है कि बरेली का सबसे बड़ा ब्राह्मण नेता आखिर कौन है?
दरअसल, बरेली की सियासत में ब्राह्मण नेताओं के दबदबे की शुरूआत भूतपूर्व मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार पंडित धर्मदत्त शर्मा के साथ हुई। धर्मदत्त वैद्य के नाम से मशहूर भूतपूर्व मंत्री यूं तो मीरगंज(तत्कालीन कावर) विधानसभा सीट से विधायक थे लेकिन उनकी पहुंच पंडित जवाहर लाल नेहरू तक थी। पांच बार इसी सीट से विधानसभा का सफर तय करने वाले धर्मदत्त वैद्य का दबदबा पूरे जिले में था। वह वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में जीतकर विधायक बने थे और अंतिम बार वर्ष 1977 में जीते थे।

धर्मदत्त वैद्य के बाद रामेश्वर नाथ चौबे का नाम आता है। वह भी कई बार विधायक रहे। उनका निर्वाचन क्षेत्र सनहा विधानसभा सीट थी। इमरजेंसी के बाद जब चुनाव हुए तो कांग्रेस विरोधी लहर में भी रामेश्वर नाथ चौबे जनता दल के उम्मीदवार को शिकस्त देने में कामयाब रहे थे। वर्ष 1989 में कुंवर सर्वराज सिंह ने उन्हें पराजित कर दिया। साथ ही उनके पुत्र राजुल नाथ चौबे उर्फ मुन्ना चौबे ने मोर्चा संभाला और अपनी पकड़ बनाई। वर्ष 1988 में वह जिला परिषद अध्यक्ष चुने गए थे। 1991-92 में वह कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे। 2002 में कांग्रेस के टिकट पर सनहा विधानसभा सीट से मैदान में उतरे पर जीत नहीं सके। 2007 में आईएमसी के टिकट पर लड़े मगर विफल रहे।

इसी के साथ उनका दबदबा भी खत्म हो गया। इसके बाद से लगभग 15 साल तक कोई भी ब्राह्मण नेता बरेली की सियासत में वो दबदबा कायम नहीं कर सका जो इन नेताओं ने किया था।
वर्ष 2017 में एक ब्राह्मण चेहरा बिथरी विधानसभा सीट के रण में उतरा और पहले ही चुनाव में छा गया। यह चेहरा था राजेश कुमार मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल का। पहले ही चुनाव में जीत हासिल कर विधानसभा पहुंचे पप्पू भरतौल जितने दबंग थे उतने ही नरम दिल भी थे। जनता के लिए अफसरों की लगाम कसने से लेकर उनके सुख-दुख में शामिल होने तक हर काम में उन्हें महारथ हासिल थी। सेवा के जज्बे और सत्ता के साथ ने पप्पू भरतौल के कद में इतना इजाफा कर दिया कि उनका प्रभाव और दबदबा मुरादाबाद तक पहुंच गया था। जिस बिथरी विधानसभा में कभी गोली-बंदूक के बिना कोई काम नहीं होता था उस बिथरी विधानसभा में एक कहावत चल पड़ी, ‘न तमंचा, न पिस्तौल, बिथरी में पप्पू भरतौल’। पप्पू भरतौल का कद इतना बढ़ गया कि उन्हें लोकसभा के दावेदार के तौर पर देखा जाने लगा। लेकिन वह पहले से ही बरेली की सियासत में अपना सिक्का जमा चुके दिग्गज नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गए। वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में पप्पू भरतौल का टिकट काटकर डॉ. राघवेंद्र शर्मा को दे दिया गया। साफ-सुथरी छवि वाले राघवेंद्र शर्मा विधायक बन भी गए लेकिन पप्पू भरतौल का दबदबा कम नहीं हुआ। इसके विपरीत राघवेंद्र शर्मा की सुस्ती और सादगी ने पप्पू भरतौल के कद में और इजाफ कर दिया।

राघवेंद्र शर्मा विधायक होने के बावजूद खुद को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर स्थापित करने में नाकाम रहे। साथ ही विधायक के तौर पर भी वह जनता का दिल नहीं जीत सके। इसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बिथरी विधानसभा से राघवेंद्र शर्मा भाजपा के प्रत्याशी को नहीं जिता सके। यहां से भाजपा उम्मीदवार धर्मेंद्र कश्यप को 111774 वोट मिले जबकि समाजवादी पार्टी को 113585 वोट मिले। भाजपा उम्मीदवार इस सीट से 1811 वोटों से हार गए। यह स्थिति तब रही जबकि इस सीट से तीन मुस्लिम उम्मीदवार बसपा के आबिद अली, पीईसीपी की कौशर खान और भारत जोड़ो पार्टी के मोहम्मद आमिर खान मैदान में उतरे थे। इनमें आबिद अली को 15 हजार 284, कौशर खान को 894 और आमिर खान को 544 वोट मिले थे। लगभग 17 हजार वोट मुस्लिम उम्मीदवारों ने काटे। निश्चित तौर पर इन उम्मीदवारों ने समाजवादी पार्टी के ही वोट काटे। अगर इतने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं होते तो भाजपा उम्मीदवार की हार का आंकड़ा कम से कम दस हजार से अधिक तो होता ही। वहीं, इस सीट से चार हिन्दू उम्मीदवार भी मैदान में उतारे गए थे लेकिन ये चारों मिलकर भी दो हजार वोटों का आंकड़ा तक नहीं छू सके। इनमें निर्मोद कुमार सिंह को 278, प्रेम पाल सागर को 576, राजकुमार पटेल को 493 और मक्खन लाल को 574 वोट मिले थे। ये आंकड़े राघवेंद्र शर्मा के गिरते ग्राफ को दर्शाते हैं और उन्हें एक नाकाम विधायक के तौर पर भी पेश करते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर पप्पू भरतौल राघवेंद्र शर्मा की जगह विधायक होते तो स्थिति कुछ और होती जैसी कि वर्ष 2019 के चुनाव में थी क्योंकि पप्पू भरतौल एक जन नेता माने जाते हैं।

पप्पू भरतौल और राघवेंद्र शर्मा के अलावा एक और ब्राह्मण चेहरा बरेली के मेयर उमेश गौतम का है। वह बसपा से भाजपा में आए थे। मेयर बनने के बाद उन्होंने पहले लोगों को जोड़ने की कोशिश की लेकिन खुद को ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित नहीं कर पाए। बरेली के लोग उन्हें एक ‘धन नेता’ के तौर पर देखते हैं। अखबारों में उनके विज्ञापन, सोशल मीडिया पर उनके प्रचार और पोस्टर-बैनर के साथ ही उनके द्वारा किए जाने वाले काम इसकी गवाही भी देते हैं। लोगों का मानना है कि वह अपने धन के बल पर ही टिकट ले आते हैं और उसी के बल पर चुनाव भी जीत जाते हैं। उनकी ब्राह्मण नेता की पहचान सिर्फ सभा कराने और समाजसेवी संगठनों को चंदा देने तक ही सीमित बताई जाती है। दरअसल, लोगों का मानना है कि उमेश गौतम की पूरी राजनीति ही धन के दम पर टिकी है। ब्राह्मणों से व्यक्तिगत जुड़ाव वह आज तक नहीं बना सके हैं। बीच-बीच में उनका मुस्लिम प्रेम भी जाग जाता है और वह इस्लाम का प्रचार करते भी दिखाई देते हैं। जैसे- हाल ही में उन्होंने मौलाना शहाबुद्दीन की पुस्तक तारीख ए इस्लाम का विमोचन कर इस्लाम को जानने की अपील की थी। इससे ब्राह्मण समाज में उनके प्रति नाराजगी और बढ़ गई है। इसके उलट पप्पू भरतौल की छवि हिन्दूवादी नेता की है। उन पर यह आरोप है कि जब मुस्लिमों ने अपने इलाके से कांवड़ यात्रा निकालने का विरोध किया था तो पप्पू भरतौल ने मुस्लिमों को ताजिया नहीं निकालने दिया था। ऐसे में उमेश गौतम की छवि एक ‘धन नेता’ की बनकर रह गई है।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों और ब्राह्मण नेताओं की अहम भूमिका होने वाली है। सिर्फ वही ब्राह्मण नेता जीत हासिल कर सकता है जो हिन्दूवादी हो और जन नेता हो, न कि धन नेता।





