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फरीदपुर में पूर्व विधायक का फ्लॉप शो: तीन बार हारे, अब भीड़ भी हार गई, न चेहरा चला, न दावत काम आई, नेताओं की फौज, जनता गायब, 10 हजार की भीड़ के दावे 600 में सिमटे, संत रविदास जयंती पर हो गया विजयपाल का सियासी पोस्टमॉर्टम, पढ़ें दावों का सच

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार चर्चा का कारण कोई राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि एक ऐसा आयोजन है जिसने पूर्व विधायक विजयपाल सिंह की जमीनी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संत रविदास जयंती के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम न सिर्फ़ भीड़ जुटाने में नाकाम रहा, बल्कि इसने विजयपाल सिंह के राजनीतिक भविष्य, उनकी स्वीकार्यता और उनके दावों की पोल भी खोल दी।

संत रविदास जयंती समारोह में खाली पड़ीं पीछे की कुर्सियां

फरीदपुर विधानसभा सीट पर संत रविदास जयंती के बहाने हुआ आयोजन दरअसल सिर्फ एक असफल कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस राजनीतिक सच्चाई का आईना बन गया है, जिसे समाजवादी पार्टी लंबे समय से नज़रअंदाज करती आ रही है। यह आयोजन साफ तौर पर बता गया कि विजयपाल सिंह अब जमीनी राजनीति के केंद्र में नहीं रहे और उनकी राजनीतिक उपयोगिता लगभग खत्म हो चुकी है।

विजयपाल सिंह

कार्यक्रम से पहले विजयपाल सिंह और उनके समर्थकों की ओर से दावा किया गया था कि इस आयोजन में दस हज़ार से अधिक लोगों की भीड़ जुटेगी। सोशल मीडिया से लेकर कार्यकर्ताओं तक, हर जगह यह प्रचार किया गया कि फरीदपुर में दलित समाज का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन देखने को मिलेगा। लेकिन जब कार्यक्रम का दिन आया, तो हालात बिल्कुल उलट नजर आए।
स्थानीय लोगों और मौजूद कार्यकर्ताओं के मुताबिक, आयोजन स्थल पर मुश्किल से 600 से 700 लोग ही जुट पाए। राजनीति में भीड़ सिर्फ संख्या नहीं होती, वह संदेश होती है। जब कोई नेता दस हजार की भीड़ का दावा करे और मौके पर मुश्किल से 600-700 लोग जुटें, तो यह महज संगठनात्मक चूक नहीं, बल्कि भरोसे की कमी का संकेत होता है। इससे यह साफ हो गया कि विजयपाल सिंह का नाम अब लोगों को घर से बाहर निकालने की क्षमता खो चुका है।
सबसे अहम बात यह है कि यह आयोजन दलित समाज के नाम पर किया गया था, लेकिन आधे से अधिक मुस्लिम समाज के लोगों की मौजूदगी रही। इसका सीधा राजनीतिक अर्थ है कि जिस सामाजिक आधार को विजयपाल सिंह अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते रहे, वही आधार अब खिसक चुका है। यानी जिस समाज को संदेश देने के लिए यह कार्यक्रम रखा गया था, वही समाज वहां नदारद दिखाई दिया।

मंच पर जुटी नेताओं की फौज

इस आयोजन को सफल दिखाने के लिए मंच पर नेताओं की लंबी फेहरिस्त सजाई गई थी। बरेली जिले के एसआईआर प्रभारी शशांक यादव, भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम, मीरगंज के पूर्व विधायक सुल्तान बेग, पूर्व जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव, पूर्व जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल, अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर अनीस अहमद खां, राजकुमार पाल जैसे कई चेहरे मंच पर मौजूद थे। मंच पर नेताओं की लंबी कतार यह दिखाने की कोशिश थी कि विजयपाल सिंह आज भी पार्टी के भीतर प्रासंगिक हैं। लेकिन राजनीति में मंच की तस्वीर से ज़्यादा अहम मैदान की हकीकत होती है। फरीदपुर में मैदान खाली था। इसका अर्थ यह है कि पार्टी नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ चुकी है।
यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी के बड़े चेहरे किसी स्थानीय नेता को जबरदस्ती प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि जनता उसे स्वीकार नहीं कर रही। लेकिन सवाल यह है कि जब इतने बड़े-बड़े नाम एक साथ मंच पर थे, तो भीड़ क्यों नहीं आई? राजनीति में आमतौर पर माना जाता है कि अगर नेता प्रभावशाली हो और जनता से जुड़ा हो, तो भीड़ अपने आप खिंची चली आती है। लेकिन फरीदपुर में ठीक इसका उलटा देखने को मिला। मंच भारी था, लेकिन मैदान खाली जो विजयपाल सिंह की नाकामी को दर्शा रहा था। भीड़ जुटाने के लिए आयोजन में भोजन का भी भरपूर इंतजाम किया गया था। बढ़िया खाने की व्यवस्था और सरकारी भवन का इस्तेमाल सब कुछ किया गया। इसके बावजूद लोग नहीं आए। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब लोग सिर्फ़ खाना खाने के लिए किसी नेता के कार्यक्रम में नहीं जाते। जनता अब सवाल पूछती है- नेता ने हमारे लिए किया क्या है?


दरअसल, विजयपाल सिंह जब से समाजवादी पार्टी में आए हैं, तब से फरीदपुर सीट पर पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया है। वह खुद फरीदपुर से तीन बार चुनाव लड़ चुके हैं और तीनों बार हार का सामना कर चुके हैं। एक बार बसपा से तो दो बार सपा से। विजयपाल सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या उनका ट्रैक रिकॉर्ड है। तीन बार चुनाव लड़ना और तीनों बार हारना किसी भी नेता को कमजोर स्थिति में खड़ा कर देता है। उससे भी बड़ा तथ्य यह है कि उनके आने से पहले फरीदपुर सीट समाजवादी पार्टी की मजबूत सीट मानी जाती थी। 12वीं, 13वीं और 14वीं विधानसभा में लगातार समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों ने यहां जीत दर्ज की थी। दो बार सियाराम सागर और एक बार नंदराम विधायक रहे। लेकिन विजयपाल सिंह के सपा में आते ही यह जीत की परंपरा टूट गई। गहराई से देखें तो यह “व्यक्ति बनाम पार्टी” का मामला बन चुका है। यानी पार्टी का संगठन मजबूत था, लेकिन व्यक्ति विशेष ने उसे कमजोर कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि पार्टी बार-बार उसी चेहरे पर दांव क्यों लगाती रही। जिस नेता के आने के बाद पार्टी लगातार कमजोर होती चली जाए, उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
फरीदपुर की राजनीति सामाजिक संतुलन पर टिकी रही है- दलित, यादव, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण। विजयपाल सिंह इस संतुलन को साधने में पूरी तरह असफल रहे। यादव समाज उनसे नाराज है। दलित समाज उनसे दूरी बना चुका है। जाटव समाज अंदरूनी खेमों में बंट चुका है। इस स्थिति में उनके पास कोई ठोस वोट बैंक बचता नहीं दिखता। राजनीतिक भाषा में कहें तो उनका “कोर वोट” ही खिसक गया है। विजयपाल सिंह के दौर में फरीदपुर में समाजवादी पार्टी गुटों में बंटती चली गई। कार्यकर्ता आपस में लड़ते दिखे, संगठन कमजोर हुआ और जनता से संवाद टूटता चला गया। फरीदपुर में लगभग 60 हजार मतदाता यादव समाज से ही आता है। आरोप है कि विधायक रहते हुए विजयपाल सिंह ने यादव समाज के लोगों पर झूठे मुकदमे दर्ज करवाए थे। यही वजह है कि आज 15 साल बाद भी यादव समाज उनसे दूरी बनाए हुए है।
जिस दलित समाज के नाम पर विजयपाल सिंह राजनीति करते रहे, वह समाज भी अब उनसे दूर होता जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दलित समाज अब पहले जैसा नहीं रहा। वह पढ़ा-लिखा है, जागरूक है और अपमानजनक भाषा व व्यवहार को स्वीकार नहीं करता। पिछले चुनाव के दौरान विजयपाल सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें वह पुलिसकर्मियों से कह रहे थे, “अगर हमारी सरकार होती तो तुम लोगों को पेशाब पिलाते।” इस बयान ने न सिर्फ पुलिस महकमे को नाराज किया, बल्कि आम जनता और दलित समाज में भी गहरा रोष पैदा किया। ऐसी भाषा अब किसी भी समाज को स्वीकार नहीं।
इतना ही नहीं, विजयपाल सिंह का अपना जाटव समाज भी अब एकजुट नहीं रहा। शालिनी सिंह और चंद्रसेन सागर जैसे नेताओं के बीच समाज बंट चुका है। ऐसे में विजयपाल सिंह का सामाजिक आधार लगातार कमजोर होता चला गया।

पहले भी हो चुके हैं विजयपाल के फ्लॉप शो
यह पहला मौका नहीं है जब विजयपाल सिंह का कोई आयोजन फ्लॉप हुआ हो। इससे पहले उनके कार्यालय पर आयोजित बीएलए सम्मेलन में भी नाममात्र के लोग पहुंचे थे। उस वक्त मंच पर तत्कालीन एसआईआर प्रभारी वीरपाल सिंह यादव मौजूद थे और उसी बैठक में विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष और विजयपाल सिंह के बीच खींचतान खुलकर सामने आ गई थी। दोनों नेता बीएलए को अपना-अपना बीएलओ बताने लगे थे। यानी संगठन की हालत खुद नेताओं के सामने उजागर हो गई थी।

सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप
इस बार के आयोजन में एक और गंभीर मामला सामने आया- सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का। बताया जा रहा है कि खाने-पीने का इंतज़ाम सरकारी भवन में किया गया था। रविवार के कार्यक्रम से पहले शनिवार को सरकारी सफाई कर्मी वहां सफाई करते नजर आए। इससे स्थानीय बीडीओ सुखदेव सिंह की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि भाजपा सरकार में रहते हुए वह समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम के लिए सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करा रहे हैं। इस संबंध में जब बीडीओ से बात की गई तो उन्होंने मामले की जानकारी होने से अनभिज्ञता जताई। जब उन्हें मामले से अवगत कराया गया तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

सियासत का बुझता चिराग
इन तमाम घटनाओं के बाद अब फरीदपुर में यह चर्चा आम है कि विजयपाल सिंह की सियासत अब गुज़रे जमाने की बात हो चुकी है। उनके आसपास टिकट के दलालों की एक फौज ज़रूर है, जो उन्हें लगातार बड़ा नेता दिखाने की कोशिश करती रहती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। संत रविदास जयंती का आयोजन इन दलालों के झूठे दावों की भी पोल खोल गया।
फरीदपुर विधानसभा सीट पर जल्द ही उपचुनाव होने हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किसे मैदान में उतारे। अगर पार्टी ने फिर से पुराने और हारे हुए चेहरों पर भरोसा किया, तो न सिर्फ़ विजयपाल सिंह की हार की हैट्रिक याद की जाएगी, बल्कि समाजवादी पार्टी की भी हार की हैट्रिक बन सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि विजयपाल सिंह कितने दावे करते हैं, बल्कि सवाल यह है कि फरीदपुर की जनता किस पर भरोसा करती है। और रविदास जयंती का यह आयोजन साफ संकेत दे गया है कि जनता का मूड बदल चुका है। फरीदपुर अब सिर्फ़ भाषण नहीं, ठोस नेतृत्व चाहता है।

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